पंचातयी चुनाव 2019
 


पंचायती चुनाव वर्ष 2019 उत्तराखंड के लिए एक नई सोच नई दिशा व दसा लेकर आएगा। जहां कोंग्रेश के पास अगले विधानसभा की तैयारी है वहीं bjp के पास यह मौका दुबारा सत्ता पर काबिज़ होने का है। bjp इस पंचायती चुनाव के परिणामों से केंद्र को यह भी विस्वास दिलाने की नाकाम कोशिश करेगा कि पहाड़ों में सब कुछ ठीक ठाक है। bjp के लिए डगर इतनी आसान भी नही है यह bjp आलाकमान भलीभांति जानती है। बिगत वर्ष के पंचायती चुनाव में अब्बल रही कोंग्रेश फिर से प्रदेश में ही नही देश में भी विश्वास वापस लाना चाहेगी। अपने कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकने के लिए अब कोंग्रेश के पास पंचायती चुनाव ही एक मात्र विकल्प है। 

सत्ता के गलियारों में टहलने वाने वाली अनेकों क्षेत्रीय पार्टियों को भी इस वर्ष पंचायती चुनाव में एकजुट एकमुठ होकर लड़ने का मौका है मगर ऐसा होगा नही क्यों कि ukd की कमर टूटी हुई है और अन्य किसी पार्टी को लोग जानते नही। ukd एक मात्र विकल्प हो सकता था मगर यह अब सपनों की बात हो गई। कोंग्रेश भी अब उसी रणनीति से चल रही है जिस रणनीति से संजय गाँधी चले थे। कोंग्रेश को अब समझ आगया की आसमान में उड़ के भला नही होने वाला अब 1977 का जमाना नही है। जीवित रहना है तो धरातल मजबूत करना होगा। कुछ हलचल धरातल पर दिख रहा है। सूबे में विगत वर्ष कोंग्रेश ने पंचायती चुनाव में बहुत अच्छा प्रदशन किया था बावजूद इस के विधानसभा लोकसभा में सूपड़ा साफ हो गया। विगत पंचायती चुनाव में 13 जिला पंचायत अध्यक्षों में से 11 पर कोंग्रेश के प्रत्याशी जीते जब कि 1 सीट पर निर्दलीय व 1 सीट पर bjp काबिज हुई। वहीं 95 ब्लॉक प्रमुखों में से 75 ब्लॉक प्रमुख कोंग्रेश के रहे। 3 निर्दलीय रहे जो बाद में bjp में सामिल हुए। 

यह भी नजारा प्रदेश ने देखा कि नगर निगम व नगर पालिका में bjp अच्छे बढ़त के साथ काविज रही मगर चिंता का विषय यह है कि निर्दलीय पार्षदों का प्रतिशत ज्यादा रहा। जनता ने किसी पार्टी पर नही ब्यक्ति विशेष पर विश्वास किया और यही हाल इस वर्ष पंचायती चुनाव में भी रहने वाला है।

इस वर्ष मंचायती चुनाव खास इस लिए भी है कि राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओ को अनेकों विज्ञापनों के माध्यम से जन जन तक पंहुचाने में प्रत्याक्षियों ने कोई कोरकसर नही छोड़ी है। भले यह चुनाव किसी सिम्बल पर नही लड़ा जाएगा मगर राजनीति से ग्रस्त पहाड़ों में बिना सिंबल का भी सब चलता है।

एक महत्वपूर्ण निर्णय राज्य सरकार की शिक्षा के गुणवत्ता में सुधाव व जनसंख्या नियंत्रण की ओर एक कदम को इस वर्ष पंचायती चुनाव में लागू किया गया है। जिस प्रत्याशी के 2 से अधिक बच्चे हो वह चुनाव नही लड़ सकता है। और जो ब्यक्ति 10 पास सामान्य वर्ग 8 पास obc और 5 पास sc/st हो वही चुनाव लड़ेंगे। हालांकि इस फैसले का स्वागत सभी ने किया मगर इस में अनेकों त्रुटियां भी निकल आई। bjp के ही प्रत्याशी इस बार एक कानून के चलते दौड़ से बाहर हो गए। इस मे मुख्य त्रुटि जैसे शिक्षा की कोई समय सीमा व उम्र निर्धारित नही थी। आज भी उत्तराखंड के दुरस्त क्षेत्र में स्कूलों का न होना इस योजना को ठेंगा दिखाता है। शिक्षित ब्यक्ति पहाड़ छोड़ चुका है। और जो इस नियम में  पास हो गया वह 2 बच्चों के कानून में फेल हो गया। 2 बच्चों के नियम में एक कमी और रही कि जुड़वा बच्चों को भी इस नियम में प्राथमिकता नही दिया गया। यानी 2 बार गर्भधारण कानून नही बना। प्रकृति के नियम के आगे किस का जोर चलता है मगर वर्तमान राज्य सरकार ने इस को भी दरकिनार कर दिया। पहाड़ों में आज भी परिवार नियोजन जागरूकता की कमी है। हॉस्पिटल व गर्भनिरोधक समाग्री हर गाँव तक नही पँहुच पाती है। छोटे छोटे बिखरे गाँव में बड़े परिवार होने की धारणा आज भी बनी हुई है। सरकार को पहले समाज को शिक्षित व जगरूक करना चाहिए था फिर कानून बनाना चाहिए था। या इन दोनों कानूनों में संसोधन कर के उम्र निर्धारण करना चाहिए था। 

इस से पहाड़ों में प्रत्याक्षियों का टोटा हो गया। मूलनिवासी चुनाव लड़ने से दूर हो गए और शिक्षित शहरों से चुनाव लड़ने गाँव आएंगे तो विकास शहरों का ही होगा। गरीब ब्यक्ति गरीब ही रह जायेगा अमीर सामाज को सिर्फ मैला कुचल जीवन देगा। काश्तकारों का उत्तराखंड मनरेगा व जवाहर रोजगार तक सीमित हो चुका है। नीतिनियताओं ने हर योजना पर अध्यादेश थोप दिया है। इस में कमी विपक्ष की भी रही जिन के घर के झगड़े खत्म नही होते। संसद से सड़क तक चिल्लाने वाला विपक्ष कानून बनते वक्त फिसड्डी रहती है। वर्तमान में विपक्ष सक्षम नेतृत्वकर्ता नही रहा। अपने निजी श्वार्थ में लीन विपक्ष सिर्फ सड़न फैलाने के लिए है। यह पंचायती चुनाव इस लिए भी खास होगा कि सरकार ने आरक्षण कार्ड फेंका है 46% मतदाता आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। 46% सीट आरक्षित है जिन में sc/st/obc/ महिला आरक्षण है। कुछ गाँव पंचायत ऐसे भी है जहाँ प्रत्याक्षी नही है। पिछड़ा समाज देश के सभी क्षेत्रों में अशिक्षित रहा और उत्तराखंड इस से अछूता नही है। इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि उत्तराखंड में महिलाओं की शिक्षा का स्तर आज भी उतना सही नही कि इस कानून में फिट बैठें। 18 वर्ष पहले उत्तराखंड में शिक्षित महिलाओं का प्रतिशत कम था जो शिक्षित थी वे पलायन कर चुकी है। जो कुछ गाँव में है वे 2 बच्चों के फेर में फंसे है। 

बार बार चुनाव तरीकों में देरी से सरकार पर अनेकों सवाल भी उठते ही मगर यह सब नए नियमों को उतारने के कारण भी हो सकता है। मानवाधिकारों का पूरा ख्याल रखा गया है। मौलिक अधिकारों और पूरा ध्यान दिया गया मगर यह सिर्फ दिखावे के लिए है। आपत्तियों के लिए सरकार ने मात्र 24 घण्टे का समय दिया है जो खानापूर्ति के सिवाय कुछ नही है। 

अब सरकार के पास मौजूदा पंचायती चुनाव कराने की बड़ी चुनोती है। कर्मचारियों का टोटा ओर बेलगाम अधिकारियों के साथ सामंजस्य बिठाना बड़ी चुनोती है। अपने ही लोगों से बिरोध झेल रही सरकार बार बार दिल्ली का दौरा कर रही है।

 

देवेश आदमी