दो कवितायेँ

 शहीद 


मैं, नहीं जानता 
 कल क्या होगा...
 कल मैं नहीं रहूंगा
 समय हो जाऊँगा
 लेकिन,
 मैं इतना जानता हूँ
 आज अगर नाक में दम रहा, तो
 जिन्दा रहते हुए भी
 मिटने के लिए/तरसता रहूंगा...
 मैं नहीं जानता/ कल क्या होगा
 मैं पंक्ति में खड़ा हूँ!
 समय हो जाऊँगा!!!
                
               ¨¨¨
  
    एक सैनिक की आवाज
 
 जब, हकलाने लगती है कविता
 नींद में झूलने लगती है सियासत
 जनता
 आवारा मवेशियों की तरह
 भटकने लगती है
 कवि का मरना/
      इसी को कहते हैं
 एक शहीद का प्राण
 नेता नहीं 
 कवि होता है
 एक सैनिक की आवाज
 एक मुकम्मल/कविता होती है!!