पाकिस्तानी हिन्दू और मानवाधिकार


मात्र तीन दिन के अपने बेटे को उसके दादा-दादी के पास छोड़कर पाकिस्तान से तीर्थयात्रा वीजा पर भारत आने वाली 30 वर्षीय भारती रोती हुई अपनी व्यथा बताते हुए कहती है कि “अगर मैं अपने बेटे का वीजा बनने का इंतजार करती तो कभी भी भारत न आ पाती.” 15 वर्षीय युवती माला का कहना है कि पाकिस्तान मे उनके लिये अपनी अस्मिता को बचाये रखना मुश्किल है, तो 76 वर्षीय शोभाराम कहते हैं कि वे भारत मे हर तरह की सजा भुगत लेंगे परंतु अपने वतन पाकिस्तान वापस नहीं जायेंगे क्योंकि हमारा कसूर यह है कि हमने हिन्दू-धर्म मे पाकिस्तान की धरती पर जन्म लिया है। मैं अपनी आँखों के सामने अपने घर की महिलाओं की अस्मिता लुटते नहीं देख सकता, कहते हुए 80 वर्षीय बुजुर्ग वैशाखी लाल की आँखे नम हो गयीं। दरअसल यह दिल्ली स्थित बिजवासन गाँव के एक सामजिक कार्यकर्ता नाहर सिँह के द्वारा की गई आवास व्यवस्था मंे रह रहे 479 पाकिस्तानी हिन्दुआंे की कहानी है (कुल 200 परिवारांे में 480 लोग हैं, परंतु एक 6 माह की बच्ची का पिछले दिनो स्वर्गवास हो गया)। एक माह की अवधि पर तीर्थयात्रा पर भारत आये पाकिस्तानी -हिन्दू अपने वतन वापस लौटने के लिये तैयार नहीं हंै, साथ ही भारत-सरकार के लिये चिंता की बात यह है कि इन पाकिस्तानी हिन्दुओं की वीजा-अवधि समाप्त हो चुकी है।
इतिहास के पन्नो मे दर्ज 15 अगस्त 1947 वह तारीख है, जिस तारीख को भारत न केवल भौगोलिक दृष्टि से दो टुकडो मे बँटा, अपितु लोगों के दिल भी टुकडों मे बँट गये। पाकिस्तान के प्रणेता मुहमद अली जिन्ना को पाकिस्तान में हिन्दुओं के रहने पर कोई आपत्ति नहीं थी ऐसा उन्होंने अपने भाषण में भी कहा था  कि “क्योंकि पाकिस्तानी-संविधान के अनुसार, पाकिस्तान कोई मजहबी इस्लामी देश नहीं है, तथा विचार अभिव्यक्ति से लेकर धार्मिक स्वतंत्रता को वहां के संविधान के मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया है.”  विभाजन की त्रासदी से लेकर अब तक गंगा-यमुना में बहुत पानी बह चुका है। जख्मांे को भरने के लिये दोनांे देशों के बीच आगरा जैसी कई वार्ताएँ हुई, टी.वी चैनलों पर कार्यक्रम किये गये, बस व रेलगाडी चलाई गयीं, क्रिकेट खेला गया परंतु  जख्म तो नहीं भरा, इसके उलट विभाजन का यह जख्म एक नासूर बन गया। स्वाधीन भारत की प्रथम सरकार मे उद्योग मंत्री डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के पुरजोर विरोध के उपरांत भी अप्रैल 1950 मे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और लियाकत अली के साथ एक समझौता किया जिसके तहत भारत सरकार को पाकिस्तान मे रह रहे हिन्दुओं और सिखों के कल्याण हेतु प्रयास करने का अधिकार है। परन्तु वह समझौता मात्र कागजी ही सिद्ध हुआ। पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुआंे ने हिन्दुस्तान में शरण लेने के लिए ज्यांे ही पलायन शुरू किया, विभाजन के घाव फिर से हरे हो गये। पर कोई अपनी मातृभूमि व जन्मभूमि से पलायन क्यों करता है यह अपने आप में एक गंभीर चिंतन का विषय है। क्योंकि मनुष्य का घर-जमीन मात्र एक भूमि का टुकड़ा न होकर उसके भाव-बंधन से जुड़ा होता है। समाचारो से पता चलता है कि पाकिस्तान में आये दिन हिन्दूआंे पर जबरन धर्मांतरण, महिलाओं का अपहरण, उनका शोषण, इत्यादि जैसी घटनाएँ आम हो गयी हंै।
प्रकृति कभी भी किसी से कोई भेदभाव नहीं करती और इसने सदैव ही इस धरा पर मानव-योनि  में जन्मे सभी मानव को एक नजर से देखा है, हालाँकि मानव ने समय-समय पर अपनी सुविधानुसार दास -प्रथा, रंगभेद-नीति, सामंतवादी इत्यादि जैसी व्यवस्थाओं के आधार पर मानव-शोषण की ऐसी कालिमा पोती है जो इतिहास के पन्नो से शायद ही कभी धुले। समय बदला, लोगों ने ऐसी अत्याचारी व्यवस्थाओं के विरुद्ध आवाज उठाई, विश्व के मानस पटल पर सभी मुनष्यों को मानवता का अधिकार देने की बात उठी परिणामतः विश्व मानवाधिकार का गठन हुआ। मानवाधिकार के घोषणा-पत्र में साफ शब्दों में कहा गया कि मानवाधिकार हर व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है, जो प्रशासकों द्वारा जनता को दिया गया कोई उपहार नहीं है तथा इसके मुख्य विषय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, संस्कृति, खाद्यान्न व मनोरंजन इत्यादि से जुड़ी मानव की बुनियादी मांगों से संबंधित होंगे। इसके साथ-साथ अभी हाल में ही पिछले वर्ष मई के महीने में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी  द्वारा मानवाधिकार कानून पर हस्ताक्षर करने से वहाँ एक राष्ट्रीय मानवा धिकार आयोग कार्यरत है।
ध्यान देने योग्य है कि अभी कुछ दिन पहले ही  पाकिस्तान  हिंदू काउंसिल के अध्यक्ष जेठानंद डूंगर मल कोहिस्तानी के अनुसार पिछले कुछ महीनों में बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों से 11 हिंदू व्यापारियों सिंध प्रांत के और जैकोबाबाद से एक नाबालिग लड़की मनीषा कुमारी के अपहरण से हिंदुओं में डर पैदा हो गया है। वहां के  कुछ टीवी चैनलों के साथ-साथ पाकिस्तानी अखबार डॉन ने  भी 11 अगस्त के अपने संपादकीय में लिखा कि 'हिंदू समुदाय के अंदर असुरक्षा की भावना बढ़ रही है'  जिसके चलते जैकोबाबाद के कुछ हिंदू परिवारों ने धर्मांतरण, फिरौती और अपहरण के डर से भारत जाने का निर्णय किया है। पाकिस्तान हिन्दू काउंसिल के अनुसार  वहां हर मास लगभग  20-25 लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराकर शादियां कराई जा रही हैं। यह संकट तो पहले केवल बलूचिस्तान तक ही सीमित था, लेकिन अब इसने पूरे पाकिस्तान को अपनी चपेट में ले लिया है। रिम्पल कुमारी का मसला अभी ज्यादा पुराना नहीं है कि उसने साहस कर न्यायालय का दरवाजा तो खटखटाया, परन्तु वहाँ की उच्चतम न्यायालय भी उसकी मदद नहीं कर सका और अंततः उसने अपना हिन्दू धर्म बदल लिया। हिन्दू पंचायत के प्रमुख बाबू महेश लखानी ने दावा किया कि कई हिंदू परिवारों ने भारत जाकर बसने का फैसला किया है क्योंकि यहाँ की  पुलिस अपराधियों द्वारा फिरौती और अपहरण के लिए निशाना बनाए जा रहे हिंदुओं की मदद नहीं करती है। इतना ही नहीं पाकिस्तान से भारत आने के लिए 300 हिंदू और सिखों के समूह  को पाकिस्तान ने  अटारी-वाघा बॉर्डर पर रोक कर सभी से वापस लौटने का लिखित वादा लिया गया। इसके बाद ही इनमें से 150 को भारत आने दिया गया। अभी पिछले दिनो  पाकिस्तान द्वारा हिन्दुआंे पर हो रही ज्यादतियों पर भारत की संसद में भी सभी दलों के नेताओं ने एक सुर में पाकिस्तान की आलोचना की जिस पर भारत के विदेश मंत्री ने सदन को यह कहकर धीरज बंधाया कि वे इस  मुद्दे पर पाकिस्तान से बात करेंगे परन्तु पाकिस्तान से बात करना अथवा संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को उठाना तो दूर यूपीए सरकार ने इस मसले को ही ठन्डे बस्ते में डाल दिया और आज तक एक भी शब्द नहीं कहा। पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुआंे पर की जा रही बर्बरता को देखते हुए हम मान सकते है कि विश्व-मानवाधिकार पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं के लिए नहीं है, यह सौ प्रतिशत सच होता हुआ ऐसा प्रतीत होता है। भारत के कुछ हिन्दु संगठनो के लोगों के अनुसार इन पाकिस्तानी हिन्दुआंे द्वारा इस सम्बन्ध में पिछले माह (मार्च) में ही भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, विदेश मंत्री, कानून मंत्री, दिल्ली के उपराज्यपाल व मुख्यमंत्री के साथ सभी संबन्धित सरकारी विभागों सहित भारत व संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोगों को भी पत्र भेजा जा चुका है किन्तु आज तक किसी के पास न तो इन पाक पीडितों का दर्द सुनने की फुर्सत है और न ही किसी ऐसी कार्यवाही की जो पाकिस्तानी दरिंदगी पर अंकुश लगा सके। तो क्या यह मान लिया जाय कि पाकिस्तान के 76 वर्षीय शोभाराम का कहना सही ही है कि पाकिस्तानी हिन्दू अपने हिन्दू होने की सजा भुगत रहे हंै और उनके लिए मानवा    धिकार की बात करना मात्र एक छलावा है? ऐसी वीभत्स परिस्थिति मे यदि समय पर विश्व मानवाधिकार ने इस गंभीर समस्या पर कोई संज्ञान नहीं लिया यह अपने आप में विश्व मानवाधिकार की कार्यप्रणाली और उसके उद्देश्यों की पूर्ति पर ऐसा कुठाराघात है जिसे इतिहास कभी नहीं माफ करेगा।
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