समाज की दुश्मन है यह आत्ममुग्धता


जीवन में संतोष हो, आराम हो, शांति हो.. और क्या चाहिए? इस तरह का ज्ञान बांटने वाले और चाव से सुनने वाले लोग हर जगह मिल ही जाते हैं। बचपन में एक किस्सा सुना था, कि एक आलसी लड़के को किसी अनुभवी आदमी ने सही राह बताने के उद्देश्य से पढाई-लिखाईईकरने की सलाह दी तो लड़के का कहना था कि, पढाईईकरने से होगा क्या? व्यक्ति ने समझाया कि पढ़-लिख कर तुम बड़े आदमी बनोगे, यह सुनकर लड़केे पूछा कि बड़ा आदमी बनकर क्या होगा? उस व्यक्ति ने कहा, फिर तुम आराम से जिंदगी गुजार सकोगे। इतना सुनकर वह आराम पसंद किशोर मुस्कराया और कहने लगा कि आराम से तो मैं अभी भी हूँ फिर कुछ करने की क्या जरूरत है। यहाँ पर दो विचारों का स्पष्ट टकराव है। अधिकांशतः लोग समझते हैं कि सुखी जीवन जीने के लिए कर्म जरुरी है जबकि कुछ लोग मानते हैं कि वे जैसे हैं, वैसे ही अच्छे हैं और उन्हें जीवन में कुछ और प्रयास करने की जरूरत नहीं है। अपने सीमित अनुभव के कारण व्यक्ति आत्मसंतुष्ट होना बड़ी उपलब्धि समझता है, परन्तु इसका अर्थ ये बिल्कुल नहीं होता है कि वह सुखी है या खुश है। जीवन में अपनी निष्क्रियता को आत्मसंतुष्टि की झूठी चादर में छुपाने वाली सोच के लिए अंग्रेजी भाषा में एक सुंदर शब्द प्रयोग होता है, 'कम्प्लैसन्सी'। यह मोटे तौर पर इन्सान की अपने सहूलियत के हिसाब से आत्मसंतुष्ट हो जाने वाली मानसिक प्रवृति के लिए प्रयोग किया जाता है। तूफ़ान की चेतावनी के बावजूद ऐसा व्यक्ति अपने स्थान को नहीं छोड़ता क्योंकि वह खुद को कमरे में सुरक्षित महसूस करता है। वह इस बात से बेखबर रहना चाहता है कि तूफान उस इलाके को तहस-नहस कर सकता है। जब मनुष्य अपने मन के सीमित दायरे से बाहर नहीं सोचता है तो उस स्थिति को 'कम्प्लैसन्सी' कहते हैं। प्रसि( ब्लाॅगर मार्क मेरिल के अनुसार, जीवन में 'कम्प्लैसन्सी' सामाजिकऔर पारिवारिक संबंधो का सबसे बड़ा शत्रु है। अक्सर हम समय के साथ अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और पारिवारिक संबंधो को लेकर कम्प्लेसेंट ;आत्मसंतुष्टद्ध हो जाते हैं। अपने आस पास अलग-अलग लोगों की दिनचर्या का संज्ञान लें तो पायेंगे कि कुछ लोग बड़े-बड़े काम करते थकते ही नहीं हैं, जबकि अधिकतर लोग थोड़ी सी उपलब्धियों से ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाते है। प्रश्न यह उठता है कि हमारे अन्दर ऐसा क्या है जो हमें छोटा-बड़ा सोचने के लिए प्रेरित करता है? इजराइल के मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र, 'बार-इलान विश्वविद्यालय' की साइंटिफिक रिपोट्र्स के मुताबिक, मस्तिष्क की गतिविधि का संचालन अनेक मजबूत और कमजोर न्यूरोन लिंक, अरबों न्यूरोन टर्मिनल को आपस में जोड़ कर करते हैं। न्यूरोन लिंक जितने अधिक न्युरोनल टर्मिनल से जुड़ते हैं, मस्तिष्क के कार्यक्षेत्र अर्थात सोचने का विस्तार उसी हिसाब से होने लगता है। ठीक उसी तरह जैसे कि हम इन्टरनेट द्वारा जितने अधिक वेबसाइट से  जुड़ते हैं, उतनी ही अधिक जानकारियां हमें हासिल होती रहती हैं। इसी कारण जब हम किसी समस्या पर चिंतन करते हैं तो भिन्न-भिन्न समाधान निकलते हैं। रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजों पर अपनी सोच को अधिक केन्द्रित रखने से हमारे सोचने का दायरा छोटा ही रह जाता है। अधिकतर समय निष्क्रिय अवस्था में पड़े रहने से मस्तिष्क की सोचने की क्षमता स्थिर और सीमित होती जाती है और अंततः हम संकुचित मन लेकर संसार में छोटी सोच से उत्पन्न हुए दुखी लोगों की पंक्ति में शामिल हो जाते हैं। दूसरी तरफ, सोच का केंद्र बिंदु जब धीरे-धीरे बड़े मकसद की तरफ बढ़ता है, तो दिमाग बड़े दायरे में सोचने लगता है। फलस्वरूप मस्तिष्क खुद को विस्तारण की अवस्था में लाने के प्रयास में जुट जाता है, जिससे हमारादृदृष्टिकोण व्यापक होने लगता है और इस तरह हम अधिक महत्वपूर्ण, प्रसन्न और हितकारी लोगों की श्रेणी में जा पहुँचते हैं। हमारे धर्मग्रन्थांेमें सफल जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए योग का मार्ग सुझाया गया है, जो क्रमशः तीन अलग-अलग रास्तों से होकर जाता है, कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। अलग होते हुए भी तीनों राहें एक दूसरी की पूरक हैं, क्योंकि ज्ञान से कर्मफलीभूत होते हैं तो श्रध्दा-भक्ति इन्सान को जनकल्याण के सत्-मार्ग पर चलने को प्रेरित करती है। 'भगवतगीता' में कर्मयोग को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। अपने जीवन में मुकाम हासिल करने वाले अनेक बु(िजीवियों  ने यही शिक्षा दी है कि जीवन में संतुष्ट होकर बैठने की कोईईगुंजाइश नहीं है, क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और बेहतर समाज बनाने की जिम्मेदारी भी उसी के ऊपर है । अगर हर इंसान अपनी उपलब्धि को स्वयं की जरुरत तक रख कर ही संतुष्ट हो जाता तो मानव'पाषाण काल में ही रह जाता। अफसोस ये है कि हमारे समाज में ज्ञान का आदान-प्रदान भी सहूलियत के अनुरूप ही होता रहा है, जहाँ असली सन्देश लुप्त हो जाते हैं। अर्थशास्त्र के 'खपत-आपूर्ति' के मौलिक नियम शायद ही किसी को याद रहें, लेकिन स्कूल में पढ़े कुछ दोहे सदा याद रहते हैं जिन्हें बिना दिमाग खपाये आसानी से स्वीकार किया जाता रहा है। जैसे ये प्रचलित दोहा अधिकतर लोगों की जुबान पर रहता है, 'गोधन, गजधन, बाजिधन और रतन धन खान। जब आये संतोष धन सब धन धूरि समान''। इस दोहे की सुनो तो जीवन में कुछ करने की जरूरत ही नहीं है, बस संतोष रूपी काल्पनिक धन को पोटली में बांधकर जीवन को निरुद्देश्य ही गुजार दो। यह भी कहा गया है कि, ''रूखा सूखा खाय के ठंडा पानी पीव। देख पराईईचूपड़ी मत ललचावे जीव''। यानि हे मानव तू जिस हाल में है उसी में संतुष्ट रह, अधिक पाने की सोच पर ताला लगाकर चाबी दरिया में फ़ेंक दे। 
यहां उद्देश्य यह बताना है कि जीवन में आत्म संतुष्टि अति सूक्ष्म एवं अदृश्य शत्रु के सामान है। यह उस ठहरे हुए जल की तरह है जो एक समयांतर में अपनी गुणवत्ता खो देता है। कहने का अभिप्राय ये है कि आत्मसंतुष्टि से सम्बन्धित परंपरागत सोच में सम्पूर्ण बदलाव अति आवश्यक है। परम विद्वानों ने कहा है कि 'विचार से कर्म की उत्पत्ति होती है, कर्म से आदत की, आदत से चरित्र की और चरित्र से भाग्य का निर्माण होता है'। इसका सरल भाव यही है कि इन्सान की सोच ही उसकी नियति की निर्माता है। सार्वभौमिक सत्य है कि 'आत्मसंतोष' के अंत के साथ ही परिवर्तन का क्रम शुरू हो जाता है'। परिवर्तन जैस-जैसे घटित होता जाता है, हमारे भीतर सुसुप्त आकांक्षायें जागती जाती हैं। यह परिवर्तन अनेक अवस्थाओं से होकर गुजरता है परन्तु इसका उद्भव सोच बदलने से होता है। हिंदी साहित्य का इतिहास बताता है कि कैसे साहित्यकारों की बदलती सोच ने साहित्य जगत को परिवर्तन का क्रम प्रदान किया। दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से विदेशी आक्रान्ताओं के हमलों का सामना करने के लिए जनमानस को प्रेरित करने वाली काव्य रचानाओं ने 'वीरगाथा' काल को जन्म दिया। तदुपरान्त, यु(ों से होने वाले खून खराबे, जनमानस की आस्था-विश्वास पर होने वाले प्रहार जैसे कष्टों को सहने हेतु शक्ति प्राप्ति के लिए 'भक्तिकाल' का जन्म हुआ। बदलते परिवेश के साथ अनेक साहित्यकार अपने आश्रयदाता राजाओं और बादशाहों के गुणगान में रचना करने लगे और इस तरह रीतिकाल का जन्म हो गया। समयांतराल में दुनियां भर में होने वाले बदलाव के साथ हिंदी साहित्य भी नयी सोच के साथ आधुनिक काल में आ गयी। सोच में आये इस प्रकार के मूलभूत परिवर्तन को 'प्रतिमान विस्थापन' या 'पैराडाइम शिफ्ट' के रूप में जाना जाता है। जहाँ मानव का दृष्टि कोण और उसके सोच में पूर्ण बदलाव आ जाता है। उदहारण के लिए, मुग़ल-ब्रिटिश काल से लेकर सेक्युलर काल तक सामान्य व्यक्ति ने आत्मसंतोष में पीढियां गुजार दी क्योंकि कम से कम में गुजारा कर पाना भी उपलब्धि में ही शामिल माना जाता था। परंतु पिछले कुछ सालों में आथर््िाक नीतियों में आये बदलाव से हर तबके के आदमी की आत्मसंतुष्टि खत्म होने लगी है और उसकी आकांक्षायें जागृत हो चुकी हैं। हर व्यक्ति, परिवार और समाज अपने आप को पहले से ज्यादा खुशहाल बनाने में जुटा है जिसका असर देश में आये आथर््िाक परिवर्तन में स्पष्टतः नजर आने लगा है। पिछले दशक से तुलना करें तो, आज एअरपोर्ट पर अत्यधिक भीड़ दिखाए देती है, क्योंकि अब आम व्यक्ति भी हवाई जहाज से यात्रा करना चाहता है। एक दूसरे से ज्यादा संपन्न बनने की प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं ने उसमें व्याप्त आत्मसंतुष्टि के विष को खुद से अलग कर दिया है। इस नयी दौड़ में मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के स्तर में बडा परिवर्तन आया है। मध्यम वर्ग के लोग अपर मध्यम वर्ग में खिसक गये हैं और साथ में निम्न मध्यम वर्ग अब मध्यम वर्ग में शिफ्ट होने लगा है। आथर््िाक हो या बौ(िक, किसी भी तरह के विकास के लिये एक दूसरे से आगे बढने के क्रम में गति होना जरूरी है क्योंकि स्थिरता 'कम्प्लैसन्सी' का काम करती है। सोचिये, अगर सरकार सबको गुजारे के लिये पेंशन देने लग जाय तो फिर अधिकतर लोग कम से कम में संतुष्ट रहने लगेंगे और तब विकास का चक्र थम सा जायेगा । भारत के परिदृश्य में 'संतोषम परम सुखं' वाली सोच को 'पैराडाइम शिफ्ट' की सख्त जरूरत है। भ्रष्टाचार को बढाने एवं चोरों को बचाने में  'सादा जीवन उच्च विचार' वाली उक्ति का बड़ा हाथ रहा है। सादगी के लिबास में चोरों ने समाज में खूब इज्जत पायी। इस उक्ति को भी 'प्रतिमान विस्थापन' की जरुरत है । जो 'उच्च विचार उच्च जीवन' होना चाहिये,  यानी ऊंचा सोचो और शान से जीने के लिये प्रयत्न करना कभी बंद मत करो। जीवन में हमारी उपलब्धियां सीमित न हों लेकिन व्यसन सीमित रहें। कम्प्लैसन्सी हम सभी के अंदर मौजूद होती है क्योंकि ये हमारे स्वभाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। परंतु अपने अंदर के दुश्मन को जब हम पहचान लेते हैं तो उससे लडना कम मुश्किल हो जाता है और जो जीत जाय वही विजेता कहलाता है ।  
सोच में संपूर्ण परिवर्तन किस तरह हो जाता है, यहाँ कुछ उदाहरणों से समझाने की कोशिश करेंगे। देश में बहुत लम्बे समय तक कुछ लोग हिंदुओं का चोगा धारण कर तमाम हिन्दुओं को सेक्युलर बनाने का धीमा जहर पिलाते हुये देश पर निष्कंटक राज करते रहे। ये सेकुलर अपनी असलियत छुपाते रहे और साथ ही हिन्दुओं को जातियों में बाँट-बांटकर, देश के इस्लामीकरण के अपने गुप्त 'एजेंडा' पर काम करते रहे। इसके लिए विदेशों के भी मुसलमानों को देश में आने की खुली छूट दी गयी। सोचिए, देवभूमि में आज १५ प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान कहाँ से आ गए? साथ में, सिनेमा, साहित्यिक, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में हिन्दू धर्म की आलोचना करने वाले तथाकथित सेकुलरों को प्रोत्साहित करने के लिये सरकार उन्हें राष्ट्रीय पुरुस्कारों से सम्मानित करती रही। जो विचार धारा हिन्दु संस्कृति की घोर विरोधी थी, लोग उसी को साल दर साल अपना वोट देते रहे। सूचना प्रौद्योगिकी के आने से लोगों के नजरिये में  'पैराडाइम शिफ्ट' आया है। लोगों को अपनी गलतियों का अहसास होने लगा है। आज देश में सेकुलरों को गद्दार, देशद्रोही और मुस्लिम परस्त आदि शब्दों से सम्बोधित किया जाता है और अधिकांशतः हिन्दू सेक्युलर शब्द को गाली मानने लगे हैं क्यांेकि इस शब्द का इस्तेमाल मुसलमानों के हितों की रक्षा और हिन्दुओं को दबाने के उद्देश्य से होता रहा है। अब इन सेकुलरों के असली नाम और असली मकसद दोनों ही लोगों के सामने आ गये हैं, अतः हिन्दू समाज धीरे-धीरे एक होने लगा है । पहले जो 'अहिंसा परमो धर्म' का पालन करने के लिये एक गाल पर थप्पड़ खाने के बाद दूसरा गाल भी आगे करने पर विश्वास करते थे, आज लोग उसे 'नपुंसकता' का नाम देते हैं। देश के विभाजन के पीछे की मानसिकता को आज देशवासी समझ चुके हैं। एक तरफ धर्म के नाम पर नया दुश्मन देश बनाया और दूसरी तरफ उसी धर्म के बड़े हिस्से को भारत में रोका गया। इन सभी का एक ही ध्येय था कि जल्दी से जल्दी इस देश को इस्लामिक देश बनाया जाय। इस्लामीकरण का ट्रायल कश्मीरी पंडितों के पलायन से समझा जा सकता है। आज हम उन पंडितों को बहु-मुस्लिम कश्मीर में उनके अपने ही घरों में नहीं बसा पा रहे हैं, तो साचिए जब देश में मुस्लिम बहुसंख्यक हो जायेगा तब हिन्दुओं का क्या होगा? हिन्दुओं ने हमेशा ही हर धर्म जाति के साथ सामंजस्य स्थापित किया है, मगर क्या आप अभी भी यह अपेक्षा मुसलमानों से करेंगे? जन मानस की इस सोच में आये इस 'पैराडाइम शिफ्ट' के कारण भारत की राजनीति में परिवर्तन का नया क्रम शुरु हो चुका है। उम्मीद करते हैं कि परिवर्तन का ये क्रम भारतवर्ष में एक नये युग की स्थापना करेगा, साथ में सदियों से उपेक्षित होती रही सनातन संस्कृति को फिर से शिखर पर पहुंचने का गौरव प्राप्त होगा। आज हमें आत्मसंतुष्टि के घेरे से बाहर निकलकर अपनी आथर््िाक सम्पन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक और धार्मिक क्षेत्र में भी भरपूर योगदान देना होगा। जय हिंद।