सेवा करते आपदा पीड़ित

 


उत्तराखण्ड में आई प्राकृतिक आपदा में अनेक प्रकार से विध्वंश हुआ। तीर्थयात्रियों के साथ ही स्थानीय ग्रामीण भी बड़ी संख्या में काल कवलित हुए। भयावहता इतनी अधिक है कि सामान्य जीवन की न्यूनतम आवश्यकतायें तथा जन सुविधाएं अभी तक भी उपलब्ध नहीं हैं। कुल मिलाकर देवभूमि पर जो विनाशलीला उपस्थित हुई, उसका अनुभव निकट जाकर ही किया जा सकता है। इस बड़ी त्रासदी के बीच जनसेवा के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनकी चर्चा आवश्यक है। इस सबको यों भी कहा जा सकता है, कि त्रासदी के इस वातावरण में स्वयं पीड़ा सहते हुए भी जिन्होंने दूसरों को सहारा दिया, सेवा की भूमिका निभायी, उनका यह प्रयास अनुकरणीय है, प्रेरक है।
गंगोत्री मार्ग पर गत 22 वर्षों से समाजसेवा में रत 'उत्तरांचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति' का प्रकल्प केन्द्र 'सेवा आश्रम' भागीरथी के तीव्र प्रवाह में क्षतिग्रस्त हो गया। प्रकल्प का दोमंजिला छात्रावास, भोजनालय, अतिथि कक्ष, गोदाम सहित आश्रम के अन्य उपांग भागीरथी में समा गये। निरन्तर कटाव से इस केन्द्र की सुरक्षा खतरे में है। इस सब पर भी 17 जून से 1 जुलाई तक, एक पखवाड़े के कालखण्ड में गंगोत्री मार्ग पर फंसे तीर्थ यात्रियों की सेवा का यह एक बड़ा आश्रय स्थल बना रहा। सम्पूर्ण भागीरथी घाटी अन्धकार में डूबी थी, पानी की व्यवस्था ठप्प थी, सड़क मार्ग से किसी भी वस्तु को लाना ले जाना कठिन था। किन्तु रात-दिन आने-जाने वाले तीर्थयात्रियों की सब प्रकार की सेवा सुश्रुषा यहाँ की गयी। अपने स्थान पर पंहुचे अनेकों यात्रियों ने इस सेवा के लिये कार्यकर्ताओं को      साधुवाद कहा। रैस्क्यू आपरेशन में लगे सेना के जवानों के लिये भी यह आश्रम एक बड़ा आधार था। यहाँ की सेवा में उन्हंे जो अपनापन दिखा, उससे गद्गद् होकर हर्षिल में कार्य कर रहे ए.एम.सी. के कर्नल डा0 अरूण सेन ने कहा-'आप जो सेवा कर रहे हैं, उसका कोई मूल्य नहीं है।'
वर्षों से तीर्थ यात्रियों, स्थानीय समाज तथा दीनदुखियों की सेवा कर रहे कैलाश आश्रम, आपदा राहत का एक प्रमुख केन्द्र बना रहा। बाढ़ के प्रथम चरण में ही कैलाश का मन्दिर परिसर भागीरथी में बह गया। यात्री निवास जलमग्न है, इसकी गौशाला खतरे में है। नदी धीरे- धीरे आश्रम की भूमि को काट रही है। उत्तरकाशी के मध्य में बसे इस धार्मिक बसेरे के प्रमुख स्वामी कृष्णानन्द जी जहां राहत सामग्री वितरण में लगे रहे, वहीं राहत में कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं की कुशलता की भी चिन्ता कर रहे हैं। उन्होंने आश्रम में स्थायी सूचना दी है कि आने वाले कार्यकर्ताओं, अतिथियों के रहने तथा भोजन करने की हर क्षण यहां व्यवस्था है। चेहरे पर कोई शिकन न लाते हुए वे कहते हैं कि यह त्रासदी ईश्वर की ओर से हमारी परीक्षा है। लेकिन इस पर भी हमें अपने कर्तव्य का निर्वाह करते रहना चाहिये।
पर्वतीय मार्ग पर चलने में अनअभ्यस्त तीर्थयात्री, सेना के द्वारा बनाये गये दुर्गम मार्गों से कैसे मीलोंमील पैदल चलकर आये, यह आश्चर्य की बात है। वर्षा के कारण फिसलन, पहाड़ पर चिपकी हुयी पगडण्डी तथा नीचे गहरी खाई, यह दुष्कर यात्रा थी। अनेकों को संघ के स्वयंसेवकों, उत्तरांचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति के कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय ग्रामवासियों ने सहारा दिया। हरिद्वार के लिये बस में बैठते समय गुजरात के उद्धव भाई ने अपनी जेब से एक चैक निकाला, उस पर उत्तरांचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति लिखा और एक वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री गोपाल रावत को थमाते हुए बोले-'मैं आपके इस यज्ञ में केवल अपना नाम लिखा रहा हूँ, मेरी सेवा भी स्वीकार करें।
सेना जहां एक ओर सीमाओं की सुरक्षा के लिये सन्नद्ध है वहीं आन्तरिक सुरक्षा तथा प्राकृतिक आपदाओं में भी उसकी अहम भूमिका है। सेना ने बचाव अभियान में जिस अदम्य साहस का परिचय दिया वह एक शौर्यगाथा है। सेना के जल, थल, नभ ये तीनों अंग, एन.डी.आर.एफ., आई.टी.बी.पी., सीमा सड़क संगठन के जवानों ने कई बार चोटिल होते हुये भी दिनरात जुटकर जो यशस्वी कार्य सम्पादित किया, वह राहत का एक अलग अध्याय है। कन्धों पर औजार लेकर, दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ते हुये, हाथ पकड़कर बूढ़ांे, बच्चों तथा अस्वस्थजनों को सम्बल देते हुये वे यत्र-तत्र देखे गये। राजस्थान की एक वृद्धा ने सैनिक के सिर को सहलाते हुए कहा-'किस मां का बेटा है रे तू ? मौत की पहाड़ी पर दूत बनकर खड़ा है।' इस रैस्क्यू आॅपरेशन के चलते सेना को एक बड़ा आघात भी सहना पड़ा। गौरीकुण्ड़ के निकट वायुसेना का हैलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें 20 सैनिक शहीद हो गये, कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की। वर्षा काल के खराब मौसम की चुनौती में भी सेना के 8000 जवान, 10 पैरामिलिट्री दस्ते, एन.डी.आर.एफ. की 2 बटालियनें, बी.आर.ओ. के प्रहरी निरन्तर इस राहत अभियान में लगे रहे। वायु सेना ने दुर्गम क्षेत्रों में 2500 से भी अधिक साहसिक उड़ाने भरीं। अभाव के संकट को झेलते हुये भी हर्षिल, बागौरी के भोटिया समाज ने सात दिनों तक अपने घरों से सामग्री लाकर यात्रियों के भोजन की व्यवस्था की। सुक्खी, झाला, चिन्यालीसौड़, घनसाली तथा जखोली जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों में वज्रपात, बादल फटने की आपदा से ग्रसित ग्रामीणों ने इस वैकल्पिक मार्ग से जाने वाले यात्रियों को परिवारों में टिकाया तथा उनका ढाढस भी बंधाया। यात्रा मार्ग पर स्थित बिशनपुर में एक तीन मंजिली धर्मशाला के यात्रियों को सुरक्षित निकालना दैवीय पराक्रम से कम नहीं। इसी गांव की एक बालिका ऊषा देवी ने धर्मशाला के दरवाजों को खटखटाकर यात्रियों को जगाया कि नदी के उफान से धर्मशाला खतरे में है। इस कारण 250 यात्रियों के प्राण बच गये और धर्मशाला आधे घण्टे बाद नदी में ढ़ह गयी। यात्रियों का सब सामान, यहां तक कि पहनने के वस्त्र भी बह चुके थे, गांव के लोगों ने उन्हें पहनने योग्य वस्त्र दिये। यह क्षण उन तीर्थयात्रियों को सदैव स्मरण रहेगा। कभी भूस्खलन तो कभी बाढ़ की त्रासदी से पीड़ित केदारघाटी का ऊखीमठ विकासखण्ड प्रकृति की मार को हमेशा से सह रहा है। ऊखीमठ निवासी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूद्रप्रयाग जिला कार्यवाह श्री प्रहलाद पुष्पवाण इस विनाशलीला के भुक्तभोगी हैं। गतवर्ष अतिवृष्टि के कारण आयी आपदा में भी वे अपने कार्यकर्ताओं के साथ सुदूरवर्ती प्रभावित क्षेत्रों में राहत के लिये गये थे। स्वयं की पारिवारिक कठिनाइयों की चिन्ता न करते हुये पहले दिन से ही बचाव तथा राहत की टोली का वे नेतृत्व कर रहे हैं। राहत का प्रथम चरण पूरा कर परिवारजनों के साथ चिकित्सा के लिये चंडीगढ़ के लिये निकले तो दूरभाष पर उन्होंने बताया कि सड़कों की दुरावस्था के कारण पहाड़ का सीमान्त क्षेत्र दूसरी दुनिया हो गया है। यहाँ से मैदान की ओर आना कष्टसाध्य है, क्योंकि निरन्तर हो रही वर्षा के कारण आपदा प्रभावित मार्ग विकराल बने हुए हैं, तो भी लौटकर जल्दी आना है क्योंकि राहत का दूसरा चरण, 'पुनर्वास' का कार्य प्रारम्भ हो गया है। आपदा के तुरन्त बाद से ही उत्तरांचल उत्थान परिषद के    अध्यक्ष सेवानिवृत अध्यापक श्री भजन सिंह खत्री तथा संगठन मंत्री श्री राजेश थपलियाल निरन्तर इस दुरूह क्षेत्र में राहत तथा पुनर्वास कार्य में लगे हैं।  
उत्तरांचल दैवी आपदा सहायता समिति के संरक्षक वयोवृद्ध समाजसेवी तथा पुरानी पीढ़ी के स्वयंसेवक डा0 नित्यानन्द जी ने 1991 के भूकम्प के पश्चात ग्राम विकास के केन्द्र 'सेवाश्रम' मनेरी में रहना स्वीकार किया। यह केन्द्र उनकी ही प्रेरणा से प्रारम्भ हुआ। निरन्तर 22 वर्षों से अनवरत वे सीमान्त के कठिन क्षेत्र भटवाड़ी विकासखण्ड़ के सर्वांगीण विकास के कार्यों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। 88 वर्ष की आयु तथा रोग पीड़ित जर्जर शरीर में उनका स्वस्थ मन निरन्तर चिन्तनशील है। वे कहते हैं, कि हिमालय आपदाओं का क्षेत्र है। इस विषम धरातल की कठिनाइयों को सहते हुये भी यहाँ परिश्रमी तथा स्वाभिमानी समाज खड़ा है, यह यहाँ की अमूल्य धरोहर है। आदिकाल से हिमालय पर तीर्थयात्री आ रहे हैं, वे हमारे अतिथि हैं। उनकी सब प्रकार की कुशलता की चिन्ता करना हमारा दायित्व है। वर्तमान में इस जलप्रलय ने जो त्रासदी दी है उससे आगन्तुकों को असीम पीड़ा हुई तथा पहाड़ का स्थानीय जन-जीवन भी आहत हुआ है। यह कहते-कहते डा0 नित्यानन्द थक जाते हैं और अन्त में इस वाक्य से अपनी बात पूरी करते हैं कि 'जो लोग उजड़े हैं उनके लिये बहुत कुछ करना है, यह सीमान्त का क्षेत्र है, आपदाओं से डरकर पहाड़ से पलायन नहीं होना चाहिये, सीमाओं की सुरक्षा यहाँ की बसावट के हाथों में सुरक्षित है।'