तुम बन जाओ हिमालय की बर्फ


मैं चाहता था तुम बन जाओ हिमालय की बर्फ
बर्फ की सफेद चादर और ढक लो हिमालय को
फिर धीरे धीरे मेरी बातों से पिघलकर
बन जाओ एक प्यारी सी पहाड़ी नदी
गाती रहो गीत हमेशा ही
धर लो गंगा-यमुना का रुप
और बहते बहते पहुंच जाओ दिल्ली
ताकि दिल्ली में तुम से भी मिल सकूं मैं भी
और पी सकूं तुम्हें अंजुली भरके
और समा लंू अपने में तुम्हें
ताकि बुझ सके मेरी पहाड़ों के याद की प्यास


लेकिन दिल्ली को देखकर


अब ऐसा सोच भी नहीं सकता हूं मैं



तुम अब ढके रखना हिमालय को
कम से कम सुरक्षित तो रहोगी
यदि मेरी बातों में आकर यमुना के रूप में आ गई दिल्ली
तो मार डालेंगे ये शहरी लोग तुम्हें भी यमुना की तरह
मैं भी नहीं पी सकूंगा यमुना का अंजुलीभर पानी
मार डाला है सांवरे कृष्ण की नदी को इन शहरी लोगों ने
इसलिए तुम कभी भी मत करना दिल्ली का रुख
बहुत बेदर्द हैं यहां के लोग
नदी के रुप में आओगी तो
बना देंगे तुम्हें भी गंदा नाला
चिडिय़ा के रुप में ओवोगी तो
भटकती रहोगी गौरेया की तरह हरदम
नहीं मिलेंगे घोसला बनाने के लिए घर और पेड़
दिल्ली में घर नहीं होते
यहां होते हैं फ्लैट या कोठियां
गौरेया को नहीं मिलता है यहां आसियाना
तुम पहाड़ की भोली भाली लडक़ी बन कर भी
मत आना दिल्ली
यहां रहते हैं राक्षस जैसे लोग
वे नहीं जानते मां, बेटी काकी, बोडी, दादी, नानी के रिश्ते
उनके लिए हो तुम सिर्फ एक औरत
नोच डालेंगे तुम्हें भी निर्भया की तरह
तुम आना चाहो तो यहां अवश्य आना
लेकिन कालिंका की तरह
एक हाथ में ले आना दरांती-थमाली
ताकि काट सको उन हाथों को जो
बढऩे की कोशिश करें तुम्हारी ओर
और हां
जब कभी मैं लौटूंगा पहाड़
तब बर्फ से जरूर पिघल जाना नदी की तरह
ताकि तुम्हारे पास बैठ कर सुन सकूं तुम्हारे गीत
खो जाऊं तुम्हारे साथ
पहाड़ की घाटियों में हम दोनों
------- (नई दिल्ली, 23 दिसंबर 2015)