सार्जेन्ट मोहनदास गाँधी ....

 

1906 में, ज़ुलु वनवासी समुदाय या मूल निवासियों का स्वतंत्रता आंदोलन दक्षिण अफ्रीका में चल रहा था। आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध था। ब्रिटिश सरकार के आदेश पर रॉयल ब्रिटिश आर्मी ज़ुलु आंदोलन को कुचलना चाहते थे।

एक भारतीय मोहनदास गाँधी ने ब्रिटिश हकूमत की मदद करने का निर्णय लिया। मोहनदास गाँधी  ब्रिटिश सेना में भर्ती हो गए। ट्रेनिंग के बाद बने- सार्जेन्ट मोहनदास गाँधी।

सार्जेन्ट मोहनदास गाँधी अति सक्रिय अधिकारी के रूप में पहिचाने जाने लगे। ब्रिटिश सेना ने ज़ुलु लोगों का नरसंहार किया। दमन चक्र चला। यहाँ तक कि लंदन से ब्रिटिश सेना को आदेश दिया गया कि बीमार, घायल ज़ुलु विरोधियों का इलाज न किया जाए। बीमार, घायल ज़ुलु लोग मरने लगे। लेकिन इलाज न हुआ। युद्ध थम गया था, सार्जेन्ट मोहनदास गाँधी को एम्बुलेंस सेवा का कार्य दिया गया। इस पद पर रहते हुए वे हज़ारों ज़ुलु नागरिकों की मौत का इस लिए कारण बने, क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश हकूमत का साथ दिया और इलाज नहीं किया। इस प्रत्यक्ष हिंसा के लिए वे ज़िम्मेदार थे।

अब आप बताएं कि तब कहाँ गई थी अहिंसा की मुरलिया ? गाँधी हिंसक या अहिंसक ? गाँधी कितना महात्मा ? 

एक हिंसक सार्जेन्ट मोहनदास, जो यौन इच्छा के लिए अपनी पत्नी को निरंतर पीटता है, अचानक बैरिस्टर के अवतार में लोगों के सामने आता है। 

इंग्लैंड में गोरों संग एक साथ बैठकर, बिना भेदभाव खाना खाता है, रूम शेयर करता है, बाथरूम शेयर करता है...... फिर एक पूर्व लिखी पठकथा के तहत दक्षिण अफ्रीका में रेल के प्रथम क्लास  डब्बे से स्टेशन पर फेंक दिया जाता है। कौन मानेगा इस कहानी को ?

सीधे भारत आकर चंपारण के उग्र नील आंदोलन को ब्रिटिश सरकार हैक करता है। फिर अहिंसा के नाम पर उंस आंदोलन को फुस कर देता है।

17-18 उग्र जन-आंदोलनों को हाइजैक करके अहिंसा शब्द की मदद से अनिर्णीत बनाने में मदद करता है। तथाकथित अहिंसावादी पूर्व सार्जेन्ट जिन्ना के हिंसक डायरेक्ट एक्शन को लाभ पहुँचाकर भारत का विभाजन करता है।