वक्रतुण्डोपनिषद


भीगी देह वो बूँद कतारें / वे बौछारें मूसलाधारें


उमड़ घुमड़ ,वे मेघ पावने / छातों की वे बन्दनवारें 


टप -टप ,रिमझिम राग धुरंधर / वर्षा ऋतु के गीत परम 


निर्वस्त्र धरा स्नान देखकर / काम पुकारें हुईं  चरम 


सिद्धहस्त उस बूँद ताल पर / रसिक पर्ण सिर हिला रहे 


जलाभिषेक गन्धर्व विधि पर / लंबकर्ण गुनगुना रहे