लोक आस्था का महोत्सव-रामलीला


बहु देवों के उपासक उत्तराखण्ड को भी राम का नाम उतना ही अनुप्राणित करता है जितना शेष भारत-भूमि के हिन्दुजनों को। सच पूछा जाये तो उत्तराखण्ड के मर्यादित समाज में राम का आदर्श गहरे तक समाया हुआ है। शारदीय नवरात्रों में जिस तरह देश के दूसरे हिससों में रामलीला का आयोजन होता रहा है, ठीक उसी प्रकार उत्तराखण्ड के शहरी व कस्बाई क्षेत्रों में भी शारदीय नवरात्रों में रामलीला के आयोजन के साथ-साथ दशहरा उत्सव को रावण- बध द्वारा राम की विजय के प्रतीक स्वरूप मनाये जाने की परंपरा सदियों से रही है। लेकिन उत्तराखण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में खरीफ की फसल कटाई और खेतों के खाली होने पर अक्टूबर-नवम्बर मास में सुविधाजनक तिथियों में रामलीला आयोजित की जाती है। प्रायः कई आस-पास के गांव सम्मिलित होकर रामलीला का आयोजन करते हैं। रामलीला का आयोजन क्षेत्र की शांति, सुख, सौहार्दता, आत्मीयता, प्रेम व उन्नति की आकांक्षा को लेकर किया जाता है। प्रायः क्षेत्र विशेष में रामलीला मण्डली या कमेटी गठित कर रामलीला आयोजित होती है। इस मण्डली में जरूरी नहीं कि सभी हिन्दु लोग ही सम्मिलित हों। रामलीला मंचन आरम्भ होने से लगभग एक माह पूर्व रिहर्सल शुरू हो जाती है। रामलीला का मंचन सामान्यतः दस दिनों में सम्पन्न किया जाता है और मंचन रात्रि में ही, जब सब लोग अपने गृह कार्य से निवृत्त हो जाते हैं, किया जाता है। रामायण की कथा वस्तु को अभिनय के माध्यम से विभिन्न राग-रागनियों, दोहा-चैपाईयों की सुमधुर धुन में गायन तथा संवादों द्वारा मंचन किया जाता है। प्रायः सीता, मंदोदरी, शबरी, तारा, सुलोचना, कौशल्या, सुमित्रा, कैकेई, सूर्पनखा आदि महिला पात्रों का अभिनय भी पुरूष कलाकारों द्वारा ही अभिनीत किया जाता है। चूंकि रामलीला मंचन के पीछे क्षेत्रवासियों का मूल विश्वास यह था कि भगवान राम और हनुमान की कृपा से आधि-व्याधि और संक्रामक बीमारियों से बचा जा सकता है, प्राकृतिक आपदाओं और अनिष्टों की रोकथाम होती है। गांव में रामलीला के आयोजन से दुर्भिक्ष नहीं होते, इसलिये रामलीला का मंचन बड़ी श्र(ा और पवित्रता से होता था। रामलीला से पूर्व उचित मुहूर्त देखकर रामलीला स्थल पर हनुमान जी की पताका स्थापित कर भूमिपूजन किया जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में रामलीला का आयोजन विद्युत सुविधा के अभाव में पहले पेट्रोमेक्स जला कर किया जाता था।
रामजन्म को एक महोत्सव के रूप में मनाया जाता है लेकिन राम वनवास के दिन कम ही दर्शक उपस्थित रहते हैं। परशुराम-लक्ष्मण संवाद, सीता स्वयंवर, सीता हरण, अंगद-रावण संवाद के अवसर पर खूब भीड़ होती है। अंतिम दसवें दिन दोपहर को राजतिलक का उत्सव मनाया जाता है। प्रतिदिन रामलीला का मंचन आरम्भ होने पर कोरस वंदना होती है। उत्तराखण्ड की रामलीलाओं का मंचन मुख्यतः राधेश्याम रामायण के आधार पर होता है। उत्तराखण्ड में रामलीलाओं के पीछे केवल मैदानी सामाजिक प्रभाव नहीं है अपितु भगवान श्रीराम लक्ष्मण और माता जानकी के इस क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रसंग हैं। भगवान राम के रावण बध के पश्चात ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिये देवप्रयाग में, तथा उनके भ्राता लक्ष्मण ने लक्ष्मण झूला )षिकेश में तपस्या की थी।  राम ने श्रीनगर, गढ़वाल स्थित भगवान कमलेश्वर के मंदिर में भगवान शंकर की उपासना कमल पुष्प अर्पित करते हुये सम्पन्न की थी, तभी से इस मंदिर का नाम कमलेश्वर हुआ था, ऐसा कहा जाता है। रामायण में भी उल्लेख है कि भगवान राम ने सीता के साथ उत्तराखण्ड के तीर्थों की यात्रा की थी। वर्तमान कुमाऊँ-गढ़वाल से लेकर कैलाश मानसरोवर तक राम के आने और पूजा करने के अनेक उदाहरण मिल जाते हैं। यथा-
 अथ त्रेता युगान्ते वौ आगतौ राम लक्ष्मणौ,
 देवप्रयाग क्षेत्रे यत्र सा पुष्पमालिका ;58/63द्ध
 रामो भूत्वा महाभाग गतो देवप्रयागः ;62/50द्ध
 यत्र वै जाह्नवी साक्षाद्लकनन्दा समन्विता,
 यत्र राम स्वयं साक्षात्ससीताश्च सलक्ष्मण। ;35द्ध
प्रसि( विद्वान श्री भजन सिंह सिंह ने ने तो सप्रमाण यह सि( करने का प्रयास किया है कि पौड़ी जिले के सितोनस्यूं में ही सीता भूमि के अन्दर समाहित हुई थीं। इस स्थान पर आज भी मेला लगता है। हालांकि उत्तराखण्ड में देश के अन्य भागों की तुलना में भगवान राम के पौराणिक मंदिर कम हैं। देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर यहां का सबसे प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर भगवान राम के प्रति साहित्य, संस्कृति और अन्य अनेक गतिविधियों का केन्द्र रहा है। गोस्वामी तुलसीदास जी की अपने आराध्य भगवान राम के इस मंदिर के प्रति अगाध श्र(ा रही है। डा0 भगवती प्रसाद पुरोहित के अनुसार ''डा0 शिव प्रसाद डबराल ने भी लिखा है कि तुलसीदास राजा अजयपाल के समय उत्तराखण्ड आये थे और  मुरधार, खड्गधार डांडों को पार करके बदरीनाथ पहुंचे थे''। रघुनाथ मंदिर का निर्माण शक 1564 से होने और रघुनाथ मंदिर का अभिषेक सन् 1575 श्रावण शुक्ल पंचमी सोमवार को होने का उल्लेख प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि यह क्षेत्र राम की भक्ति का केन्द्र था और इसी भक्ति के कारण जब देश भर में रामलीला मंचन की शरूआत हुई तो उत्तराखण्ड में देवप्रयाग को इसकी शुरूआत का सम्मान प्राप्त हुआ।
डा0 अजीत पंवार ने उत्तराखण्ड में 'रामलीलाओं की परंपरा' के अन्तर्गत लिखा है-'1860 में दन्या के बद्रीदत्त जोशी सदर अमीन ने अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मैदान में पहली रामलीला आयोजित की थी। ऐसी भी मान्यता है कि श्री देवीदत्त जोशी ने पारसी के आधार पर सबसे पहले बरेली और मुरादाबाद में कुमाऊँनी तर्ज पर 1830 में रामलीला आयोजित की थी। और इनके द्वारा ही सन 1860 में अल्मोड़ा में रामलीला का मंचन किया गया जिसे कालान्तर में बद्रीदत्त जोशी, गोविन्द लाल शाह आदि ने आगे बढ़ाया। जनश्रुति है कि दुर्गाशाह जी के प्रयत्नों से सन 1897 में रामलीला का प्रथम मंचन नैनीताल में हुआ। सन 1902 में गंगाराम पुनेठा द्वारा रामलीला की प्रस्तुति पिथौरागढ़ में की गई थी। इसी तरह सन 1930 में शिवलाल शाह द्वारा रामलीला का मंचन बागेश्वर में प्रारंभ किया गया। कुमाऊँ की रामलीला को अधिक समृ( और उत्कृष्ट बनाने में नृत्य सम्राट उदयशंकर के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता है। उन्होंने सन 1941 की नव रात्रियों में 'रामलीला छायाभिनय' का प्रदर्शन करके राम लीला का एक नया रूप प्रस्तुत किया था। गढ़वाल में भी रामलीलाओं की अपनी समृ( परंपरा रही है। गढ़वाल में मुख्यतः टिहरी, देवप्रयाग, पौड़ी, सुमाड़ी, देहरादून, श्रीनगर की राम लीलायें समृ( और प्राचीन रही हंै। डा0 पंवार के शोध के अनुसार पौड़ी की रामलीला प्राचीनतम रामलीलाओं में से एक है। सर्वप्रथम यहां के स्थानीय लोगों ने 1897 ई0 में कांडई गांव में रामलीला की शुरूआत की थी। सन 1896 ई0 में कमलेश्वर मंदिर ;श्रीनगर गढ़वालद्धके महन्त श्री दयालपुरी की अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी जिसमें रामलीला आरम्भ करने का निर्णय लिया गया था। चमोली जिले के प्रसि( गांव डिम्मर में सन 1918 में महान संगीतज्ञ ज्ञानानंद डिमरी द्वारा एक ज्ञानानंद कम्पनी स्थापित की गई थी जिसमें उस समय 72 कलाकार कार्यरत थे। इस कम्पनी ने उस अवधि में चमोली के कई गांवों में रामलीला की प्रस्तुतियां दीं। गढ़वाल के सुमाड़ी गांव में 1919 ई0 में रामलीला की नींव रखी जानी ज्ञात हुई है जो गढ़वाल की पुरानी रामलीलाओं में से एक है।
देहरादून की परंपरागत रामलीला का इतिहास भी लगभग 140 वर्ष पुराना बताया जाता है, लेकिन उसमें गढ़वाली समाज की भागीदारी नहीं थी। उल्टा इस रामलीला मंच पर सीता स्वयंवर के दिन उपहासात्मक अभिनय द्वारा टिहरी महाराज की खिल्ली उड़ाई जाती थी जिसे 'गढ़वाली' के सम्पादकाचार्य स्व0 विश्वम्भर दत्त चंदोला द्वारा गंभीर आपत्ति व्यक्त करने के उपरान्त आयोजकों द्वारा क्षमा-प्रार्थना के साथ रोका गया। प्रतिक्रिया स्वरूप सन 1955 में देहरादून में गढ़वाली समाज द्वारा 'गढ़वाल रामलीला परिषद' का गठन कर लगभग पंैतीस साल तक प्रतिवर्ष रामलीला का आयोजन किया जाता रहा। इस परिषद के संस्थापक अध्यक्ष स्व0 श्री भोलादत्त सकलानी थे जो देहरादून नगरपालिका के अध्यक्ष तथा तत्पश्चात देहरादून नगर       विधानसभा क्षेत्र से उत्तरप्रदेश विधान सभा के सदस्य भी रहे। स्व0 श्री उर्विदत्त      उपाध्याय इस परिषद के संस्थापक मंत्री रहे तथा कई वर्षों तक परिषद को सुदृढ़ता प्रदान करते रहे। श्री सत्य प्रसाद ओझा वर्षों तक निर्देशन का गुरूत्तर दायित्व संभालते रहे। इस परिषद ने देहरादून में  गढ़वाली समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण कार्य किया। संस्था ने रामलीला के साथ-साथ उत्तराखण्ड की गढ़वाली- कुमाऊँनी संस्कृति के उन्नयन के लिये महत्वपूर्ण कार्य किये। यही संस्था थी जिसने प्रथमतः देहरादून नगर में गढ़वाली- कुमाऊँनी गीतों को सार्वजनिक मंच प्रदान किया था। इन पंक्तियों के लेखक स्वयं सन 1976 से लेकर एक दशक से अधिक समय तक गढ़वाल रामलीला परिषद देहरादून के मंत्री तथा अध्यक्ष पद पर समय- समय पर पदासीन रहे हंै। मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि रामलीला का मंचन मात्र एक उत्सव नहीं है अपितु एक यज्ञ है। रामलीला के कई पात्र स्टेज को देवालय समझकर माथा झुकाते थे। दर्शक भी राम- लक्ष्मण, सीता, हनुमान जैसे देव पात्रों के प्रति श्र(ा रखते थे। रामलीला के जिन पात्रों  और कार्यकर्ताओं ने श्र(ापूर्वक इसके आयोजन में काम किया, उनकी जिंदगी में अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक उन्नति हुईं, यह मेरे स्वयं अपने जीवन का भी सि( अनुभव है। देहरादून नगर में श्री गुणानंद पथिक के निर्देशन में सन 1977 से एक और रामलीला का आयोजन लगभग चैदह वर्षों तक किया जाता रहा जो गढ़वाली भाषा में अभिनीत होती रही। रामानंद सागर द्वारा दूरदर्शन पर प्रसारित रामायण सीरियल ने शहरी क्षेत्रों की सभी रामलीलाओं की भीड़ को समेट लिया। सभी रामलीला मण्डलियों के सम्मुख अपना अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया। धीरे-धीरे दर्शकों की कमी के कारण ज्यादातर रामलीला मण्डलियां दम तोड़ती चली गईं। शहरों में अब पुनः रामलीला कमेटियां अस्तित्व में आने लगी हैं। जहां तक उत्तराखण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में रामलीला उत्सव के आयोजन की स्थिति का प्रश्न है तो अब पलायन के कारण एक ओर गांव खाली होते जा रहे हैं तो दूसरी ओर जंगली जानवरों के भय के कारण गांव वालों का रात्रि में घर से बाहर निकलना दूभर हो गया है। चूंकि रामलीला का मंचन रात्रि को ही किये जाने की परंपरा रही है इसलिये अब उत्तराखण्ड के गांवों में रामलीला का आयोजन भी विरल होता चला जा रहा है। आज से कुछ दशक पूर्व तक गांवों में रामलीला के प्रति बहुत ही ललक देखने में आती थी...लोग रात्रि को भोजनोपरान्त मीलांे दूर रामलीला देखने जाते थे। जो आज समाप्त होता जा रहा है।