आपदा में संघ की भूमिका


15-16 जून 2013 को अतिवृष्टि के कारण सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में भारी विनाश हुआ। किन्तु सीमान्त के जो विकासखण्ड इस आपदा से   सर्वाधिक प्रभावित हुए, वे हैं-भटवाडी (भागीरथी घाटी) ऊखीमठ, अगस्तमुनि, जखोली (केदारघाटी), जोशीमठ, दशौली (बद्रीनाथ) तथा कुमाऊँ के कपकोट, धारचूला तथा मुन्स्यारी आदि। इस आपदा में जो जन-धन हानि हुई है, उसका अनुमान लगाना अभी कठिन है। क्योंकि उसका व्याप तथा विभीषिका इतनी बड़ी है कि वह सरलता से तथा दूर बैठकर अनुभव नहीं की जा सकती। सम्पर्क मार्ग टूटे हैं, नदियों के असंख्य पुल बहे हैं, गाँवों तक जाने के पारम्परिक मार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं। हजारों तीर्थयात्री दिवंगत हुए, लापता हैं, उनके वाहन, साधन बह गये, घाटियों में बसे ग्राम-नगर, कस्बे, नदी के प्रवाह में समा गये। बड़ी संख्या में ग्रामीणजन हताहत हुए तथा खेती की जमीन भी बड़ी मात्रा में नष्ट हुई है। इस क्षति की पूर्ति कठिन है। जो जन-जीवन अस्त-व्यस्त हुआ है, उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में एक बड़ा समय लगेगा।
पहाड़ पर कार्यरत सीमा सड़क संगठन के तीनों मुख्य मार्ग टनकपुर- धारचूला, ऋषिकेश-बद्रीनाथ तथा ऋषिकेश-गंगोत्री मीलों दूर तक    ध्वस्त हुए हैं। ये सड़कें छुटपुट खुलती हैं किन्तु फिर वर्षा के कारण अवरूद्ध हो जाती हैं। सरकारी सर्वेक्षण, आकलन तथा उसके आँकड़े समय-समय पर घटते-बढ़ते रहते हैं। प्रारम्भिक काल से ही सरकार क्षति का आॅकलन ठीक-ठीक बताने में समर्थ नहीं रही है। वर्ष 1991 में भागीरथी घाटी में आए भीषण भूकम्प के कारण जो विनाश हुआ, उससे यह त्रासदी कहीं अधिक है। आपदा के तुरन्त बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा देश भर में सहायता की अपील की गयी, तथा उत्तरांचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति के माध्यम से इस राहत का कार्य संचालन होगा यह भी तय किया गया। क्योंकि आपदा के विषय पर प्रदेश में कार्य करने वाली यह सामाजिक संस्था गत 22 वर्षों से उत्तरांचल में सेवा के कार्य सम्पादित कर रही है। संस्था के स्थापना काल से अभी तक देशभर में कहीं भी कोई आपदा आयी उसमें संस्था के द्वारा प्रथमतः योगदान किया गया है। केदारघाटी में नारायणकोटी में स्थित माधव सेवा प्रकल्प तथा भागीरथी घाटी में स्थित सेवाआश्रम में तीर्थ यात्रियों हेतु सभी प्रकार की सहायता प्रारम्भ की गई। भागीरथी घाटी में मनेरी बाँध के निकट उत्तरांचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति का प्रकल्प मुख्यालय है। 1991 के भूकम्प के पश्चात राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की प्रेरणा से प्रारम्भ किये गये इस प्रकल्प के द्वारा सीमान्त के भटवाडी विकासखण्ड के 60 गाँवों के क्षेत्र में एकल शिक्षक विद्यालय, स्वरोजगार केन्द्र तथा स्थानीय कृषि के उन्नयन हेतु अनेक कार्यों का संचालन किया जाता है। उत्तरकाशी नगर से अन्तिम गाँव मुखबा तक फैले एकल शिक्षक विद्यालयों के शिक्षक तथा उनके साथ स्थानीय ग्रामीणजन सभी इस त्रासदी में राहत के लिये जुट गये।
गत वर्ष 3 अगस्त को भागीरथी की सहायक असीगंगा में जो बाढ़ आयी थी उस समय भी इस क्षेत्र में हुए विनाश को चुनौती मानकर कार्यकर्ता मीलों दूर तक राहत सामग्री लेकर गाँवों में पंहुचे। इस आपदा के समय भी यात्रियों की सहायता के लिये स्वयंसेवक रात दिन जुटे रहे। देशभर में गयी अपील के परिणामस्वरूप समिति को अनेक स्थानों से सभी प्रकार का सहयोग प्राप्त हो रहा है। उत्तराखण्ड़ के निकटवर्ती राज्यों हिमांचल, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा बिहार से राहत सामग्री प्राप्त हुई है। समिति के देहरादून केन्द्र के आह्वान पर विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने बड़ी मात्रा में खाद्य सामग्री, बर्तन, औषधियाँ तथा घरेलू सामग्री दान में दी है, अभी तक देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, से 140 वाहन गढ़वाल क्षेत्र के लिए तथा रूद्रपुर, हल्द्वानी व खटीमा केन्द्रों से 12 वाहन धारचूला, मुन्स्यारी तथा कपकोट के आवश्यकताजनित क्षेत्रों में भेजे गये हैं।  
बीहड़ में फँसेें यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालना, अस्वस्थ लोगों को मीलों दूर तक सहारा देना, राहत में सेना का हाथ बटांना आदि कार्य कार्यकर्ताओं ने किया। हर्षिल से ऋषिकेश तथा जोशीमठ, गुप्तकाशी से हरिद्वार तक अनेक स्थानों पर यात्रियों की सुविधा के लिये राहत केन्द्र स्थापित किये गए, जिनमें भोजन, आवास तथा सूचना सहायता की व्यवस्था भी थी। पहाड़ पर फंसे हुए यात्रियों को सड़क मार्ग से वाहनों में बैठाकर अपने गन्तव्य स्थानों के लिये रवाना करना यह भी एक बड़ी जिम्मेदारी कार्यकर्ताओं ने निभायी। हर्षिल सेना का क्षेत्र है, गंगोत्री से आने वाले यात्रियों का यह एक बड़ा केन्द्र रहा, यहाँ के स्थानीय भोटिया समाज ने अपने घरों से सामग्री लाकर सेना तथा यात्रियों की भरपूर सेवा की। सरस्वती शिशु मन्दिर की व्यवस्था समिति के लोग, प्रधानाचार्य तथा स्थानीय स्वयंसेवक इस कार्य में लगे रहे। सेना के जवान इस सेवा से प्रभावित थे। आर्मी मेडिकल कोर के कर्नल डाॅ0 अरूण सेन ने कहा, सेना के जवान अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद हैं लेकिन आप लोग जो सेवा कर रहे हैं, उसकी कोई कीमत नहीं है। चिन्याली सौड़ में यात्रियों के लिये लगाये गए सहायता केन्द्र व भण्डारे के आयोजन से वायुसेना के कैप्टन एम0के0 यादव गदगद थे, उन्होंने कहा कि मैंने अपनी सम्पूर्ण सर्विस के दौरान ऐसी श्रद्धा एवं सेवाभाव कभी नहीं देखा। स्थानीय सरस्वती विद्या मन्दिर के प्रधानाचार्य इस आयोजन के प्रेरणास्रोत थे।
सेना जहां एक ओर सीमाओं की सुरक्षा के लिये सन्नद्ध है, वहीं आन्तरिक सुरक्षा तथा प्राकृतिक आपदाओं में भी उसकी अहम भूमिका है। इस प्राकृतिक आपदा में स्थानीय प्रशासन से भी कहीं अधिक सभी प्रकार के जोखिम भरे कार्यों में सेना की अग्रणी भूमिका रही है। सेना के पास अपना सुगठित तन्त्र है, विशेष प्रशिक्षणों की व्यवस्था है, इसी कारण किसी भी आपातस्थिति में सेना के द्वारा किये गये कार्य को योग्य परिणाम प्राप्त होते हैं। प्रत्यक्ष रूप से जल, थल, नभ सेना, एन0डी0 आर0एफ0, आई0टी0बी0पी0, सीमा सुरक्षा बल तथा सीमा सड़क संगठन, सभी की इस राहत कार्य में प्रमुख भूमिका रही है। दूरस्थ क्षेत्रों से यात्रियों को सुरक्षित निकालना, राहत सामग्री पहुंचाना तथा जहां मार्ग टूटे हैं, वहां दुर्गम ऊँचाइयों पर चलने योग्य मार्ग बनाना, यह सब दुष्कर कार्य सेना के जवानों ने कुशलतापूवर्क किया। मौसम खराब होने के बावजूद भी हैलीकाॅप्टर की कुल मिलाकर 2500 साहसिक उड़ानंे इस राहत हेतु भरी गयीं, यह सब अनूठा कार्य था। इस रैस्क्यू आॅपरेशन मे सेना को एक बड़ा आघात भी सहना पडा। वायुसेना, आई0टी0 बी0पी0 तथा एन0 डी0 आर0 एफ0 के 20 जवान तथा अधिकारी गौरीकुण्ड के निकट वायुसेना के हैलीकाॅप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण शहीद हो गये। बड़ी कठिनाइयों से उनके शवों को निकाला गया। कृतज्ञ राष्ट्र ने उन कर्मवीरों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस त्रासदी में स्वयं कष्ट सहते हुए भी जिन्होंने निरन्तर अखण्ड रूप से सेवा की भूमिका का निर्वाह किया। उनके महत्वपूर्ण कार्याें की चर्चा करना यहां समीचीन होगा। गत 22 वर्षों से समाजसेवा में कार्यरत मनेरी का सेवाश्रम इस आपदा के पहले प्रहार में ही क्षतिग्रस्त हो गया। यहां छात्रावास भवन के 14 कक्ष भागीरथी में समा गये। भोजनालय, अतिथिकक्ष, क्रीड़ास्थल तथा प्रकल्प के अन्य अंगोपांग भू-कटाव के कारण नदी की ओर लटक गये हैं। धीरे-धीरे वर्षा के कारण हो रहे कटाव से प्रकल्प के चारों ओर असुरक्षा का घेरा बना हुआ है। इस सब से आश्रम की व्यवस्थाएं अस्त व्यस्त हुई हैं। इतना सब होने के बाद भी गंगोत्री से आने वाले यात्रियों, सेना के जवानों तथा आपदा राहत में लगी संस्थाओं की सब प्रकार की व्यवस्था यहां की गई। 17 जून से 1 जुलाई तक एक पखवाड़े के कालखण्ड में 10000 यात्री यहाँ रूके तथा कुल मिलाकर 8000 लोगों ने यहां भोजन किया। यात्रा मार्गों पर इतनी बड़ी व्यवस्था ऐसे संकट काल में जुटाना एक बड़ा कष्टसाध्य कार्य था। मार्ग बन्द होने के कारण भोजन सामग्री का यहां नितान्त आभाव था, तो भी छात्रावास बन्द होने के कारण जो सामग्री यहां उपलब्ध थी, उसी का उपयोग यात्रियों की सेवा के लिये किया गया। जो यात्री अपने स्थानों पर पहुंचे हैं, उन्हांेने इस सहयोग के लिये कार्यकर्ताओं का साधुवाद ज्ञापित किया।
केदारनाथ में हुई त्रासदी में यहां के पुरोहित समाज के लोग भी बड़ी संख्या में हताहत हुए। इस सब के मध्य जिन लोगों ने स्वयं के परिजनों की चिन्ता न करते हुए बाहर से आये हुए यात्रियों को बचाया, उनमें से एक प्रमुख नाम श्री दिनेश बगवाड़ी का है। उन्होंने वहाँ के जलप्रलय को अपनी आंखों से देखा, उनके परिवार के 6 लोग इस आपदा मंे नहीं रहे। इस पर भी यात्रियों का सहयोग करना, उन्हें बाहर निकालना तथा यथासम्भव इस घटना की जानकारी शासन प्रशासन को देना, यह सब कार्य उन्होंने किया। संघ के स्वयंसेवक तथा हैलीकाॅप्टर के कुशल चालक कैप्टन भूपेन्द्र सिंह ने इस त्रासदी में जो साहस का परिचय दिया, वह उल्लेखनीय है। केदारनाथ में 14 जून से हवाई सेवा बन्द थी। 16-17 जून को जो तबाही हुई, उसकी सर्वप्रथम सूचना पायलट कैप्टन भूपेन्द्र सिंह, योगेन्द्र, राणा तथा बृजमोहन बिष्ट ने प्रशासन को दी। 17 जून की साँयकाल उन्होंने केदारनाथ के लिये उड़ान भरी थी, मौसम खराब होने के कारण वे केदारनाथ तो नहीं पहुंच पाए, किन्तु रामबाड़ा में तबाही देखकर उन्हंे आपदा का अनुमान लग गया। उनकी इस टीम ने शासन को जानकारी दी कि केदारनाथ क्षेत्र में कोई बड़ी दुर्घटना के संकेत हैं। दिनांक 13 जुलाई को उन्होंने एक और चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम दिया। उत्तरकाशी से 42 किलेामीटर दूर तथा भागीरथी से 18 किमी0 की दुर्गम चढ़ाई पर स्थित सुदूरवर्ती ग्राम सिल्ला पिलंग, जहां पहुंचना कठिन है, उस स्थान पर उन्होंने हिम्मत के साथ रसद सामग्री का हैलीकाॅप्टर उतार दिया। उनके इस साहसिक कार्य की शासन ने भी सराहना की। 1991 के भूकम्प के बाद से ही यह गाँव चारों ओर से सम्पर्क मार्गों से अलग तथा जीवन की सामान्य आवश्यकताआंे से वंचित है। यहाँ उत्तरांचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति का एकल विद्यालय भी संचालित है। मनेरी सेवा आश्रम के कार्य कर्ताओं की एक टोली सर्वेक्षण के लिये दूरूह मार्ग से होते हुए यहां पहुंची।
जिस समय तीर्थयात्रा अपने पूरे आवेश में रहती है, दैवयोग से उसी अवसर पर यह त्रासदी आ उपस्थित हुई। मानसून के आने पर तथा वर्षाकाल में पहाड़ पर टूट-फूट तो प्रतिवर्ष होती ही है, किन्तु इस प्रकार का कहर बरसेगा यह कल्पना किसी को नही थी। ऐसे में जहां एक ओर यात्रा पर संकट आया, यात्रा अवरूद्ध हुई दूसरी ओर पहाड़ का वह छोटा ही क्यों न हो, जीवन निर्वाह का पारम्परिक रोजगार छिन गया। आर्थिक गरीबी के चलते जो राशन ग्रामीणों ने वर्षाकाल के लिये सम्भाल कर रखा था, उसका एक बड़ा भाग उन्होंने यात्रियों की भूख प्यास मिटाने में लगा दिया यहां ऐसे अनेकों उदाहरण हैं। छोटे-छोटे स्थानों पर ग्रामीणों के द्वारा जो भण्डारे लगाये उनसे एक बड़ी राहत यात्रियों को मिली। यात्रा मार्ग पर स्थित सुक्खी गांव के संघ के कार्यकर्ता सुरेन्द्र ने अपने साथियों सहित पहाड़ी पर फंसे 35 लोगों तथा उनके बच्चों को बाहर निकाला, जबकि सेना के जवान भी वहां नहीं पहुंचे थे। यात्रियों ने पुरस्कार स्वरूप कुछ राशि देने की बात कही पर कार्यकर्ताओं ने मना कर दिया।
देश भर में ग्रामीण विकास के कार्य में लगे कार्यकर्ताओं का मार्गदशर्न करने वाले राजकीय स्वयंसेवक संघ के अ0भा0 ग्राम विकास प्रमुख डाॅ0 दिनेश जी राहत सामग्री के वाहन के साथ केदारघाटी पहुंचे। वहां कार्यों में लगे कार्यकर्ताओं का  उत्साहवर्धन हुआ। संघ के सरकार्यवाह माननीय भैयाजी जोशी तथा सह सरकार्यवाह डा0 कृष्णगोपाल जी अपने व्यस्ततम प्रवास से समय निकाल कर तीन-तीन दिन के लिए राहत कार्य, पहाड पर हुयी जन, धन हानि की जानकारी प्राप्त करने तथा इस    विध्वंश में अपेक्षित दूरगामी कार्यों की समीक्षा हेतु प्रान्त मुख्यालय देहरादून पधारे।  
देशभर की अनेक सामाजिक संस्थाओं, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों तथा दानदाताओं की ओर से इस त्रासदी में सहयोग के लिये अपेक्षित योगदान हेतु निरन्तर सम्पर्क किये जा रहे हैं। यह निश्चित है कि इस विनाश में निर्माण की व्यापक कार्ययोजना अपरिहार्य है। तो भी हिमालय के प्रति जो सहज श्रद्धा भाव जनमानस के मन में पीढियों से अंकित है उसके कारण बहुत कुछ करने का संकल्प सर्वत्र जागृत हुआ है। उत्तरांचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति के संरक्षक, वयोवृद्ध समाज सेवी तथा पुरानी पीढी के स्वयंसेवक डा0 नित्यानन्द का कहना है कि हिमालय आपदाओं का क्षेत्र है। यहां आपदाओं के  विविध प्रकार हैं, तो भी वर्षानुवर्ष से जो समाज जहां रहता चला आया है उसने अपने पुरूषार्थ से यहां खेत-खलिहान विकसित किये, इस विषम धरातल पर वैज्ञानिक पद्धति से प्रकृति के अनुकूल भवन बनाये, आवागमन के मार्ग निर्मित किये तथा प्रकृति के संरक्षण हेतु मर्यादित व्यवहार का परिचय दिया। पहाड़ की सभी प्रकार की कठिनाइयों को सहते हुए यहां परिश्रमी तथा स्वाभिमानी समाज खडा है, यह यहां की अमूल्य धरोहर है। उनका मत है कि प्राकृतिक आपदाओं से डरकर पलायन प्रोत्साहित नहीं होना चाहिए। यह सीमान्त का क्षेत्र है, यहां की सुरक्षा की गारन्टी यहां बस रहे समाज के सशक्त हाथों में निहित है।