अशुद्धियों के वाहक--भारतीय पंचांग


संसारी लोग कुछ भी कहें किन्तु यह एक स्पश्ट सत्य है कि ज्योतिश ज्ञान आर्यावर्तीय वैदिक ऋशियों को ही सर्व प्रथम  सुलभ  हुआ और वेदोंके माध्यम से उन्होंने समग्र मानवता के लिये वह ज्ञान प्रकट भी किया है। 
प्रमाण - 1ः ज्योतिश स्वयं 'शड़ वेदांगों' में से एक 'अंग' है। 
प्रमाण -2ः वेदों में संवत, ऋतु, अयण, मास ( मधु-माधव मास (वसन्त ऋतु) षुक्र- षुचि मास  (ग्रीश्म ऋतु ), नभस्- नभस्य मास  (वर्शा ऋतु), ईश-ऊर्ज मास (षरद ऋतु ),सहस्-सहस्य मास (हेमन्त ऋतु) एवं तपस्-तपस्य मास (षिषिर ऋतु), पूर्णिमा व अमावस्या से नियंन्त्रित पक्ष और यहां तक कि मलमासादि की वैदिक व्यवस्था है। प्रमाण -3ः ऋतुबद्ध मास व्यवस्था, मलमासादि की व्यवस्था व 28 नक्षत्रों का वर्णन इस बात के बुलन्द प्रमाण हैं कि उनका खगोलिकी का ज्ञान कितना विषद और परिपूर्ण था। किन्तु हा! मेरे प्यारे धर्म भाई -बहिनो, देखो तो सही कि हम उन दिव्य ऋशियों के उदात्त मार्गदर्षन से हट जाने के कारण पंचांग विधा से कितना भटक गये हैं?
पंचागों के नाम से जो भी कुछ आज तक भारत में छप रहा है, अधिकतर गलत और  भ्रामक ही देखने में आया है। इसी से, सही तौर से गणित किये गये एक षुद्ध वैदिक पंचांग या तिथि पत्रक की आवष्यकता स्पश्ट दिखती है।  वैदिक तिथि पत्रक को कैसे गणित किया जाना  है, आम पंचांगों में क्या है जो गलत है - यही सब स्पश्ट करते हुए होगा मेरा यह लेख। ़वेदों से अनुप्राणित अपनी जनता के लिए ज्योतिश  गणित पर दिग्दर्षन का जो सम्यक कार्य कर रहा हॅू उस कार्य की परिणति की दिषा और उन के हित में मील का पत्थर सिद्ध हो मेरा यह लेख, यही विनम्र भाव है। संकल्पित प्रयास है।  
     मैं निष्चित ही दष्ग्गणित के पक्ष में हूॅ और यह भी कि सारे ही भारत में एक सिद्धान्त सम्मत तिथि पत्रक लागू होना चाहिए। दष्क् सिद्धि ही,  जिसकी कि वस्तुतः अवहेलना हो रही है, पंचांगों को ष्ुाद्ध सिद्धान्त सम्मत करने के लिये एक मात्र ंअवलम्बन है। अस्तु, स्पश्ट करते हैं कि ये सिद्धान्त सम्मत तथा दष्ग्गणित आधारित तथ्य क्या हैं? 
 सर्व प्रथम हमें आचार्य मुन्जाल के प्रयास को समझ लेना आवष्यक होगा क्योंकि वह प्रयास भी इसी उद्देष्य के लिए किया गया एक महत्वपूर्ण और ष्ुारुवाती प्रयास था। आचार्य मुन्जाल ने देखा कि गणितीय तौर पर ग्रहों आदि की जो स्थितियाॅ प्राप्त हो रही हैं, देखा गया है कि वे दृक् (देखी गयी) स्थितियों से अन्तर बनाये हुए होती  थी और यह अन्तर सदैव संचित अयन चलन के बराबर होता था। गणितागत न्यूनता को गणितीय तौर पर सही न कर पाने से एक नियम बनाना पड़ा कि दृक् स्थिति से गणितागत स्थितियों का साम्य बनाने हेतु अन्तर का अयन भाग (अयनांष) गणितागत तथ्यों में जोड़ दिया जाये। यह एक वैकल्पिक किन्तु तात्कालिक तौर पर सही व्यवस्था थी। आज लेकिन, सब उल्टा हो रहा है। ग्रहों की स्थितियाॅ हमें अति सूक्ष्मदर्षी युक्त वेधषालाओं से, सीधी सीधी प्राप्त होने के कारण, दृक्सिद्ध ही मिल रही हैं जिन पर कि उपरोक्त वैकल्पिक व्यवस्था की तो आवष्यकता ही नहीं है किन्तु अज्ञान से, ऐसा किया जा रहा है। इसके परिणामपर्वूक जो स्थितियाॅ बतायी जा रही हैं वह दृक् स्थितियों में से 'अयनांष' घटाकर ली गयी निरयन अर्थात् बिल्कुल भ्रान्त एवं अर्थहीन स्थितियाॅ हैं। पहले हम ग्रहस्पश्ट आदि गणितीय उपलब्धि को दृक समान करने या बनाने के लिये 'अयनांष' जोड़ते थे। ठीक करते थे किन्तु अब हम ग्रहस्पश्ट आदि वेधोपलब्धि से 'अयनांष' घटाकर लेने से, गुड़ का गोबर बना रहे हैं, गलत कर रहे हैं। इसीलिए पंचांगीय उद्देष्य हेतु, हमारे  पंचांगकार जब तक अयनांष के इस दुरूपयोग को नहीं भूलेंगे तब तक वे सही षुद्ध पंचांग नहीं दे सकते। उनको चाहिए कि सूक्ष्मदर्षी वेधषालाआंे से प्राप्त स्थितियों को ले लें और जैसा कि सभी ले भी रहे हैं, किन्तु उसमें से अयनांष न घटायें। ज्यों के त्यों ही स्थितियों को लें और यह भूल जायें कि वह स्थितियाॅ सायन हैं कि निरयन।
सायन सूर्य या निरयन सूर्य, सायन  संक्रान्ति या निरयन संक्रान्ति, भारतीय सम्पात या पाष्चात्य सम्पात आदि कथन ज्योतिश विशयक अज्ञान से उपजी हुई भाशा है। तिथि पत्रक या तथाकथित पंचांग न सायन होता है और न निरयन। वह तो केवल तिथि पत्रक होता है। महत्व दष्क् तुल्यता एवं ऋतुबद्धता का है। सूर्य सिद्धान्तकार भी स्पश्टाधिकार (ष्लोक 14) में यही कह रहे हैं - ''तत्तद्  गति वषान्नित्यं यथा दष्क् तुल्यतां ग्रहाः। प्रयान्ति तत् प्रवक्ष्यामि स्फुटिकरण मादरात।्'' अर्थात ग्रहादि अपनी गतियों के अनुसार जिस प्रकार दष्क् तुल्य हो जाते हैं (जिस स्थान पर वेघ द्वारा दष्ग्गोचर होते हैं) उस स्पश्टीकरण प्रक्रिया को आदर पूर्वक कह रहा हॅू। यह कहना है सूर्य सिद्धान्त का। इससे स्पश्ट होता है कि सूर्य सिद्धान्तकार की दष्क् तुल्यस्थितियों में ही पूर्ण श्रद्धा है। हमारे गणितज्ञों को आगे चलकर होने वाली इस त्रुटि का पूर्वाभास था। इसी लिये 'दष्ग्ग पक्ष' के जागरुक मनीशी, व्यंकटेष केतकर जी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'ज्योतिर्गणितम्' में ''अग्रे यदा दष्ग्गणितान्तरं स्याच्छनैःषन्ैाष्चोपचितं तदा वै, तत् कारणानि क्रमषो विचार्य ग्रन्थान्पटिश्ठाः परिषोधयेयुः'' लिखा है। तात्पर्य है कि जो यथार्थ है वही गणितागत भी होना चाहिये।
  हमने अब तक 4 बार छायार्क साधन करके सूर्य की वास्तविक स्थिति को जानकर के यह स्पश्ट समझ लिया है कि आज अति सक्षम वेधषालाओं द्वारा जो ग्रह स्थितियाॅ दी जा रही हैं वे वास्तविक तौर पर दष्क् स्थितियाॅ ही हैं। अस्तु हम बिना किसी षंका के इस निर्णय पर पहुॅचे हैं कि प्राचीन विभिन्न सिद्धान्तों द्वारा दिये गये जटिलतम गणितीय प्रपंच में फॅसने की कदापि आवष्यकता नहीं है और ना ही तरह तरह के बीज संस्कारों युक्त गणितीय प्रक्र्रिया से गुजरने की आवष्यकता है। किसी भी पंचांगीय गणना के लिए सक्षम वेधषालाओं द्वारा दिये गये सूर्य-चन्द्रादि की स्थितियों को लिया जा सकता है। अस्तु छायार्क साधन कर लेने के बाद पूरी संतुश्टि से पंचांगीय आधार के लिये यही कार्य  मैं भी कर रहा हूं। अब आपको स्पश्ट करें कि सिद्धान्त सम्मत 
तथ्यों से हमारा और क्या-क्या अभिप्राय है। 
अभिप्राय-1ः पंचांग के, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, और करण केवल ये पाॅच ही अंग नहीं होते हैं अपितु अन्य भी कुल मिलाकर ग्यारह प्राकष्तिक अंग होने चाहिए और होते ही हैं। जानना चाहिए कि ये सभी अंग अनुमन्य नहीं, अपितु दष्श्टव्य हैं और इनमें तथाकथित योगों की गिनती षामिल नहीं है। चॅूकि पाॅच अंगों में गिने गये इस योग नामक अंग की पूरे खगोल में कहीं कोई व्याप्ति नहीं है। अस्तु इन योगों को 'पंचांग' में व्यर्थ गिना गया है और इसीलिये श्री मोहन कष्ति आशर््ा तिथि पत्रक से मैने इनको हटा दिया है। वास्तविक अंग तो इस प्रकार हैं- 
1- अयन, 2- विशुव, 3- ऋतु, 4 व 5- मास (सौर एवं चान्द्र), 6-पक्ष, 7-तिथि  (सूर्य-चन्द्रास्त सहित), 9-दिनमान, 10- रात्रिमान, एवं 11- नक्षत्र। पूरे मासों एवं ऋतुओं का उल्लेख हमें यजुर्वेद 13वें अध्याय में मिलता है। अध्याय 14-15 में ऋतुओं का अलग-अलग उल्लेख भी प्राप्त है (मधुष्च माधवष्च वासन्तिका वष्तू अग्नेरन्तः ष्लेशो असि कल्पतां कृकृकृकृ) ये सब सूर्य, चन्द्र और पष्थ्वी की पारस्परिक स्थिति अथवा गतियों पर आधारित हैं। तिथि पत्रक का सारा विशय सूर्य द्वारा ही संचालित है। इसीलिए चान्द्रमास ही सौरमासों से नियमित और नियन्त्रित हैं न कि चान्द्रों मासों से सौर मास। यही वजह है कि सौर मास बारह ही निर्धारित हैं, जबकि चान्द्रमासों में अधिक एवं क्षय मास की व्यवस्था की गयी है। यही सब बने रहना चाहिए। सूर्य सिद्धान्तकार ने भी माना है कि ''सौरेण ़़़द्युनि षेार्मानं शड़षीति मुखानि च। अयनं, विषुवच्चैवं संक्रान्तेः पुण्यकालता।। (मानाघ्याय ष्लोक-3)''अर्थात दिन रात्रि का मान, शड़षीतिमुख संक्रान्तियों का मान, अयन, विशुव (सौम्यगोल, याम्यगोल) तथा संक्रान्तियों का पुण्यकाल सौरमान से ज्ञात किया जाता है। 
अभिप्राय-2ः विशुवद्वय अर्थात वसन्त एवं षरद सम्पात, अयणद्वय अर्थात उत्तरायण और दक्षिणायण का घटित होना गणितागत और दृग्गागत भी है क्योंकि एक तो इनका सम्बन्ध षून्य अथवा परमक्रान्ति से है और दूसरा यह कि उस दिन समस्त पृथ्वी में तदनुसार दिनमान और रात्रिमान स्पश्टतया दृश्टव्य हैं। छायार्क परिणाम के तौर पर उत्तरायण के दिन मकर रेखा क्षेत्र पर छायालोप होगा। परमक्रान्ति के कारण सूर्य की स्थिति 270 अंष पर ही होती है और यह ही मकर संक्रान्ति का तात्पर्य भी है। चूंकि वेद में  ऋतुबद्ध पंचांग व्यवस्था का ही उपदेष है इसी से ऋतु व्यवस्था अन्तर्गत उत्तरायण दिवस मकर संक्रान्ति, माघ संक्रान्ति और षिषिर ऋतु का दिन भी एक ही होगा ना कि अलग अलग। षिव महापुराण में भगवान षंकर का उपकारी कथन हमें संक्रान्तियों के विशुव तथा अयनों से जुड़ाव को बहुत ही स्पश्ट करता है। कथन इस प्रकार है-
''तस्माद् दष गुण ज्ञेयं रवि संक्रमणे बुधाः।
विशुवे तद् दषगुणमयने तद् दषस्मष्तम्।। ''
समग्र सनातन वैदिक धर्मावलम्बी, धर्मपरायण हिन्दू समाज को यह बात अन्तिम रूप से समझ लेनी होगी कि संक्रान्तियों का गलत या सही निर्धारण ही किसी भी तिथि पत्रक के सही या गलत होने का आधार अथवा कारण है। षेश तिथियाॅ, दिनमान, रात्रिमान, सूर्योदयादि सभी तो सामान्य गणना के विशय हैं।


 


अभिप्राय-3ः जैसा कि पहले भी कहा है सौर मास ही चान्द्रमासों 
के नियामक  होते हैे। अस्तु इस स्थिति में अर्थात माघ षुरू होने के बाद षुक्लादि व्यवस्था जो कि अधिक प्रामाणिक और तर्कयुक्त है, के अन्तर्गत माघ षुक्ल भी षुरू होगां इसी प्रकार उत्तर सूर्य की परमक्रान्ति के घटते के साथ ही कर्क संक्रान्ति श्रावण मास और वर्शा ऋतु का आरम्भ  भी होगा। स्वाभाविक है कि दक्षिणायण के बाद जो भी षुक्ल पक्ष होगा वह ही श्रावण षुक्ल पक्ष भी होगा। ध्यान रहे कि मकर संक्रान्ति के गलत निर्धारण अर्थात परम क्रान्ति रहित (अवास्तविक) लिये जाने पर माघ षुक्ल पक्ष भी गलत  ही निर्धारित हो जायेगा। ऐसे में व्रत पर्व निर्धारण जो कि पंचांग या तिथि पत्रक का अति सम्यक उद्देष्य है, कभी भी पूरा नहीं हो सकेगा। इस स्थिति में सारे ही मास पक्षादि, बिगड़ जायेंगे। मैंने सिद्धान्त ग्रन्थों के मार्गदर्षन का और कैलेण्डर रिफैार्म कमेटी की रिपोर्ट का अध्ययन, मनन करके जो तिथि पत्रक के लिए आवष्यक लगा वह सब ले लिया और जो आवष्यक नहीं लगा वह सब छोड़ दिया है। उदाहरणार्थ मीनार्क मास से ही मधुमास लिया है और मधुमास को ही वसन्तारम्भ मास लिया है। यहाॅ हम कैलेण्डर रिफैार्म कमेटी की रिपोर्ट से सहमत नहीं हैं। इसी प्रकार चान्द्र मासों को षुक्लादि पक्ष गणना से लिया है। मास गणना हेतु मधु माधव आदि की तिथियों को गति अर्थ से गते में लिया है और एक ऐसा तरीका अपनाया है कि गते का क्रम वर्तमान में प्रचलित अंग्रेजी तिथियों के साथ साम्य में बना रहेगा। यह एक अति महत्वपूर्ण निर्धारण हुआ है जिसमें हमें कहीं-कहीं एक दिन के लिए सिद्धान्त ग्रन्थों से हटकर चलना पड़ा है। व्रत पर्व निर्धारण में कलैण्डर रिफार्म कमेटी के द्वारा दिये गये मानकों को महत्व दिया गया है।
मेश  संक्रान्ति का बसन्त विशुव एक ऐसा दिन है जिस दिन सूर्य की षून्य क्रान्ति होती है तथा षून्य ही विशुुवांष भी होता है । इस प्रकार सूर्य के षून्य भोगांष, षून्य क्रान्ति और षून्य विशुवंाष के दिन ही दिन रात के बराबर होने (दिनमान = रात्रिमान) और ठीक संक्रान्ति के क्षण पर भूमध्य रेखा क्षेत्र में छायालोप से ही विशुव तिथियां, उत्तरायण, दक्षिणायण की तरह गणितागत के साथ साथ दष्ग्गागत भी हो जाती हैं। यह दिन इतना प्रामाणिक है कि इस दिन छायाकोण के आधार पर आप किसी भी स्थान का अक्षांष भी ज्ञात कर सकते हैं। इस दिन माधव मास (वैषाख) की संक्रान्ति का दिन भी होगा। उसके अनन्तर पर आ रहा षुक्ल पक्ष ही वैषाख षुक्ल पक्ष होगा। 
अभिप्राय-4ः अब मुख्य बात आती है नक्षत्रों की। नक्षत्र 28 हैं 27 नहीं और यह बात अधिकतम विशय विद्वान जानते भी हैं। फलित ज्योतिश के लिए इन्हें, बाद में, 27 ही स्वीकार किया गया क्योंकि 27 का भाग 3600 में ठीक-ठीक चला जाता है और आसानी से सारे नक्षत्रों का मान 130 20' ले लिया गया। आसमान में किन्तु इनके 'दष्ग्' विस्तार और विदित भोगांष जो हमें आज सूक्ष्म दर्षी वेधषालाओं से प्राप्त हैं, भिन्न है। सत्य ये है कि - 1. नक्षत्र समान भोगांष में नहीं हैं।
2. कोई भी नक्षत्र 130 20' का नहीं है।
किसी भी पंचांग में उनको यथा तथ्य नहीं दिखाया गया है। अब सोचिये कि जो तिथि पत्रक (पंचांग) नक्षत्रों को उनके वास्तविक भोगांष के साथ नहीं दिखा सकता वह पंचांग, 
पंचंाग न होकर मात्र एक रद्दी का कागज नहीं तो क्या हो सकता है। अगर हम इसको नहीं समझेंगे तो आने वाला समय हमारे बौद्धिक अपमान का समय होगा। कैलेण्डर रिफॅार्म कमेटी ने नक्षत्रों के लिए योगतारायें निष्चित की हैं और पंचांगों को,  वास्तव में दष्ष्यमान योगतारा से युति के समय को ही, नक्षत्रारम्भ काल दिखाना चाहिये ताकि चन्द्रमा वहाॅ उस नक्षत्र में है भी, इस सिद्धान्त सम्मत सत्य का दिग्दर्षन भी किया जा सके। दष्क् संक्रान्तियों के बाद किसी तिथि पत्रक की सत्यता व सर्वोच्चता का यह दूसरा सबसे बड़ा प्रमाण होगा। मान्यता रूप से इस सिद्धान्त को सभी विद्वान स्वीकार करते भी हैं किन्तु यथार्थ में कोई  भी पंचांग इस सत्य की अवहेलना ही करता है।  ऐसे में  तो प्रचलित पंचांग आपको नक्षत्र आधारित सही मुहुर्त भी षायद ही दे सकते हों। मैं कहता हॅू कि जिस जातक का जन्म प्रचलित पंचांगों के अनुसार अष्वनी, मघा, मूल आदि किसी भी नक्षत्र में बताया जा रहा हो पूरी तौर पर जानिये कि सही तिथि पत्रक के अनुसार उक्त क्षण पर, षायद ही है कि वे नक्षत्र हों भी। यह बिन्दु पंचांग सुधार का मुख्यतम विचार बिन्दु होना चाहिए। अथर्व वेद (19/7/2-5, 19/8/2)  एवं स्ूा0सि0(8/2-9) मे 28 नक्ष़त्र स्पश्टीकष्त हैं। कुछ ज्योतिश विशयक पुस्तकों के लेखक 27 नक्ष़त्रों के समर्थन में यजुर्वेद के नवम् अध्याय के सप्तम् मंन्त्र को उद्धष्त करते हैं। वास्तव मे इस मंन्त्र का नक्षत्र या नाक्षत्रिक सन्दर्भ से कोई लेना देना नहीे है।
कुछ लोग पंचांगों की समस्या को फलित ज्योतिश का दष्श्टिकोण सामने रखकर देखना चाहते हैं जो कि गलत है। पंचांग सुधार एक सर्वथा स्वतन्त्र और पष्थक समस्या है और इसी नजरिये से इसको सही करने पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
अभिप्राय-5ः ध्यातव्य है कि किस प्रकार पंचांगकार ही नहीं ज्योतिश गणित के बडे-बडे वेत्ता भी भ्रमपोशित चल रहे हैं। सूर्य सिद्धान्त पर एक संस्कष्त विष्वविद्यालय के ज्योतिश विभागाध्यक्ष की टीका मेरे पास उपलब्ध है। त्रिप्रष्नाधिकार में ''इश्टकाले लग्नायनम'' में उन्होंने ष्लोक 46-48 की सुन्दर व्याख्या तो दी है किन्तु लग्न साधन के अन्त में अपनी तरफ से बलात् लिख दिया कि यह लग्न सायन होता है इसलिए अयनंाष घटाने से निरयन लग्न होगा। अब ध्यान देने की बात यह है कि ष्लोक की अन्तिम पंक्ति ''भागहीनंच युक्तं हि तल्लग्नम क्षितजे तदा'' है। यहंाॅ ''तल्लग्नम क्षितिजे तदा'' ही कहा गया है न कि ''तन्ननिरयनं लग्नं हि क्षितिजे तदा'' अगर सूर्य सिद्धान्त का ऐसा ही मंतव्य होता तो वह स्वयं ही ऐसी व्यवस्था दे दिया होता। प्रष्न है कि जो सूर्य सिद्धान्त को भी नहीं स्वीकार है वह बलात अथवा प्रयासपूर्वक क्यों कहा जा रहा है? ऐसा एक नहीं, अन्य कई स्थलों में भी देखने को मिला है। मेरा दुःख यह है कि एक लब्ध प्रतिश्ठित विष्वविद्यालय का संस्कष्त विभागाध्यक्ष जब ऐसा अकष्त्य कर रहा है, तो अन्य सामान्यजनों से क्या उम्मीद की जा सकती है ? ऐसे ही पंचांगकारों ने पंचांगों में निरयन लग्न काल दिये होते हैंे। यह भी असत्यवाद है। लग्न विन्दु हमेषा क्रान्तिवष्त्त का हिस्सा होता है और दष्श्टा स्वयं पष्थ्वी पर होता हैै। अस्तु पष्थ्वी वासियों के लिये लग्न विन्दु कभी भी निरयन नहीें हो सकता। इसीलिये ''इश्टकाले लग्नायनम'' में सूर्य सिद्धान्त का लग्न 'सायन' है और वह सही है। ज्ञातव्य है कि सूर्य, राहू एवं केतु सदैव क्रान्तिवष्त्त पर ही होते हैं। इसीलिये  इनका 'षर' षून्य होता है। 
अभिप्राय-6ः जब सूर्य की की स्थिति निरयन में है ही नही ंतो तब चान्द्र मासों की गणनाऐं, मल मासादि निर्धारण अप्राकष्तिक तौर पर लिये गये उस तथाकथित निरयन सूर्य से कैसे हो सकेंगी? यदि प्रचलित पंचांग ऐसी गणनायें दे रहे हैं तो निष्चित है कि गलत दे रहे हैं। 
अभिप्राय-7ः जैसा पहले भी स्पश्ट किया  गया है कि तिथि पत्रक का सारा विशय सूर्य द्वारा ही संचालित है। इसीलिए चान्द्रमास ही सौरमासों से नियमित और नियन्त्रित हैं। यह भी जान लेना आवष्यक है कि चन्द्रमा की ऋतुवें न होती हैं और ना ही हो सकती हैं। चन्द्रमा के ना होने पर भी वसन्तादि ऋतुवें, मधु, माधवादि मास, सूर्य उदय व अस्त अर्थात दिन-रात आदि होते रहेंगे। ऐसे में नहींे होंगे तो केवल षुक्लादि पक्ष एवं उनकी तिथियां, राहू, केतू, ग्रहण एवं चांन्दनी रातें नहीं होंगी। अस्तु, त्यौहार निर्धारण में सौर मासों का वर्चस्व बना रहना चाहिये। एक उदाहरण - इस संवत (2070) की राखी और श्री कृश्ण जन्माश्टमी की बात करेंगे। 21 जून को 10 बजकर 34 मि0 पर कर्क संक्रान्ति हुई। ऐसे में 9 जुलाई से षुरू होने वाला षुक्ल पक्ष ही श्रावण षुक्ल पक्ष  हुवा। तब 22 जुलाई को रक्षाबन्धन और वहां से आठवां दिन अर्थात 29 जुलाई को श्री कृश्ण जन्माश्टमी का त्योहार बनता था। ं23 अगस्त को ईश मास के साथ ही षरद ऋतु षुरू हो गयी। अस्तु, अषुद्ध पंचांगों के कारण लोगों ने भाद्रपद मास में तो  रक्षाबन्धन मनाया और श्री कृश्ण जन्माश्टमी मनाई आष्विन मास में। अर्थात वर्शा ऋतु का त्योहार षरद ऋतु में। 
अभिप्राय-8ः खगोलिकी के वर्तमान नियम और गणितीय संषोधन अधिक उपयुक्त और सक्षम हैं। उनसे पायी गयी गणितें दष्ग्ग तौर पर भी स्वीकष्त हैं। अस्तु हमें उनके स्वीकरण में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्हें न मानना, विकास को अस्वीकार करने के समान है। जेम्स वाट के उस ईंजन को याद कीजिये कि जिसके षोर व आकार से डर कर लोग भागते थे। उन्होंने वाश्प की षक्ति के चमत्कारिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। आज के षक्तिषार्ली इंजनो से हजारों टनों के भार सहित हवा से बात करती रेलगाड़ियों को देखकर क्या आपको लगता है कि जेम्सवाट का सिद्धान्त या ईंजन अपमानित हो रहा है। नहीं, सच तो यह है कि अधिक आदर पा रहा है।  पहले ही हम ऐसा कर चुके हैं। उदाहरणार्थ - हमने समय की घटी, पल, विपल आदि इकाइयों की जगह पर घण्टा, मिनट, सेकेण्ड इकाइयों को और मन, सेर छटांक तथा गज फुट इंच की इकाइयों को छोड़कर क्ंिवटल, किलो, ग्राम और मीटर की इकाइयों को स्वीकार कर लिया है। क्या ऐसा करके हमने कोई नुक्सान पाया है ? हम में से कितने लोग हैं कि सोम, मंगल आदि वारों के वैदिक निर्धारण के बारे में बता सकते हैं। होरा का मान घटी आदि पर आधारित न होकर स्पश्टतः घण्टे पर आधारित क्यों है? जबकि घण्टा भारतीय काल मापांक  की तो इकाई ही नहीं रहा है। सात वारों को निर्धारित करके सात दिनों का सप्ताह लिया गया है। वर्शमान विभक्त है अयनों (उत्तरायण-दक्षिणायन) में और अयन विभक्त हैं ऋतुओं में, ऋतु मास में, मास पक्ष में, तथा पक्ष दिनों में। पुनः घट्यादि में निषिवासर के भाग दिनमान तथा रात्रिमान विभक्त हैं। अब प्रष्न यह है कि सप्ताह के निर्धारक घण्टात्मक होरा कहाॅ से आ गये अगर नौ ग्रहों वाला ज्योतिश, फलित वैदिक आधारयुक्त होता तो वार सात नहीं नौ होते और तब सप्ताह नहीं नवाह होता। कुल मिलाकर बात यह है कि समय के साथ मनुश्य की आवष्यकताऐं बनती हंै और तद्नुसार आविश्कार होते जाते हैं। धीरे-धीरे उसकी आवष्यकता पूर्ति के संषाधन और विधियाॅ बदलती जाती हैं, वह पैरवी (सीढ़ियों) पर चढते-चढते पिछली सीढ़ी को छोड़कर अगली को पकड़ता रहता है। जहाॅ भी वह अपने वर्तमान में होता है तो उसके पीछे उसके भूत का ही योगदान होता है परन्तु वह कभी भी भूतकाल को साथ में लादकर नहीं चलता। अस्तु उसे समय के साथ बदलना पड़ता है। या यूॅ कहें कि परिवर्तन ही नवीनता एवं संस्कार का आधार है। कल हम लकड़ी की तख्ती में लिखकर पढ़ते थे, केरोसीन आॅयल की डिबिया के प्रकाष में पढ़ते थे किन्तु आज हम अपने बच्चों को इसका यकीन भी नहीं दिला सकते। इसलिए प्रगति पथ पर चलते-चलते हम नये तौर तरीकों को अपनाते हैं, अपनाना भी चाहिएं। तब फिर पंचांग गणना के क्षेत्र में क्यों नहीं? 
एक आवष्यक तथ्य यह भी है कि द्रुत गति एवं पष्थ्वी से निकटता के कारण चन्द्रमा की भू-केन्द्रीय और भू-पृश्ठीय स्थिति में अधिक अन्तर है। जो लोग फलित ज्योतिश को वैज्ञानिक आधार दिलाने हेतु अनुसंधान कर रहे हैं और जन्म पत्र तथा उसकी फलतीय सार्थकता पर किसी मंतव्य तक पहुॅचना चाहते हैं उन्हें भू-पष्श्ठीय आधार को ही लेना होगा। तिथिमान केे लिए तिथि पत्रक का गणनाधार, सन्दर्भ राज्य की राजधानी अथवा भौगोलिक केन्द्र स्थल (भारत के मामले में नई दिल्ली अथवा वरसाली, मध्य प्रदेष) के लिए लिया जा सकता है। प्राचीन काल में सायन या निरयन षब्द नहीं थे किन्तु दष्श्यानुभवगत होने से सभी प्राचीन सिद्धान्त आज के कथित सायन गणना  के समान हैं। भचक्रीय पिण्डों की जो वास्तविक पहचान वेधषालाओं से प्राप्त हो रही है वह भी वास्तव में सायन ही है। आज विष्व की कोई भी वेधषाला ग्रहों की जो स्थिति हमें बताती है वह उसके द्वारा देखी गयी अर्थात दष्क् ही होती है।   
असत्य वादी एवं अषुद्धियों के वाहक हो गये हैं भारतीय पंचांग। अस्तु, हम स्पश्ट करना चाहते हैं कि जितने भी संषोधन सन्दर्भ के महत्वपूर्ण बिन्दु हमने बताये हैं उनका विचार करते हुये पंचांगों का उक्त सम्यक संषोधन अति आवष्यक हो गया है। भारत के पंचांगकार जब तक इस सायन-निरयन के विवाद से बाहर नहीं आ जायेंगे तथा अयनांष नाम के 'विशाणु' को बुद्धि से निकाल नहीं देंगे तब तक एक सही, षुद्ध पंचांग का निर्माण असंम्भव है। सभी पंचांगों का असत्य वाद चलता रहेगा और वे अषुद्धियों के वाहक और संवाहक बने रहेंगे। संस्कृति के बुद्धिजीवी सपूतों को इसकी चिन्ता होनी चाहिये और सिद्धान्त सम्मत, ऋतुबद्ध, यथार्थ क्रान्ति सिद्ध वास्तविक संक्रान्तियों तथा सभी असमान 28 नक्षत्रों  (जो कभी भी 13 अंष 20 कला नहीं हैं) ले कर गणित कृत षुद्ध वैदिक पंचांगों को प्रतिश्ठा मिलनी चाहिये।