भागवत का भारत


संघ प्रमुख मोहन भागवत ने क्या गलत कहा? जब गांधी एक नवीन 'भारत' के निर्माण के लिये प्रयासरत थे, तब नेहरू ने अंग्रेजों के सहयोग से इसे उनका उपनिवेश बनाकर 'इंडिया' ही रहने दिया। संघ प्रमुख के बयान की तीन-चार दिन तक मीडिया में चीर-फाड़ होती रही, किसी ने इसका अर्थ, गांव और शहर किया, तो किसी ने परंपरावाद और आधुनिकता की लड़ाई बताया...भागवत के आशय की गहराई में किसी ने जाने का प्रयत्न नहीं किया। प्रगतिवादी कई ब्रान्डेड बुद्धिजीवी जो रेव पार्टियों, पब कल्चर, बेलेन्टाईन डे, और बिकनी को स्त्री की स्वतंत्रता से जोड़कर उसका विरोध करने वालों को भगवा आतंकवादी कहते रहे हैं...जो तीन दशक से नई पीढ़ी की इस अराजक पश्चिमोन्मुखी जीवन शैली पर रीझे हुये हैं...उनके लिये यही आधुनिक इंडिया है...सगोत्रीय जैसे अवैज्ञानिक विवाह की वकालत करते इन मीडिया मैनेजरों की जड़ें पश्चिम में हैं...इस वकालत के लिये वहीं से उनका खुराक-पानी भी आता है। वहां की जीवन शैली के विष बीज इस धरती में रोपना ही उनकी दिनचर्या है...इन दलालों को कोई भाव नहीं देना चाहिये। संघ प्रमुख को परंपरावादी कहने वाले पत्रकार, परंपरा का अर्थ शायद रूढ़िवादिता करते हैं...परंपरा के लिये अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है। शास्त्र या व्यवस्था से जानना रूढ़ि से जानना है...रूढ़ियां सूचित करती हैं जबकि परंपरा ज्ञान की होती है। रामायण शास्त्र है, पर राम की मर्यादा, हिन्दु समाज की पारिवारिक परंपरा है। हमारे समाज ने हमेशा शास्त्रों से अधिक परंपरा को प्राथमिकता दी है। हम हिन्दु अपने ग्रन्थों को पत्थर की लकीर नहीं मानते...इस अर्थ में पश्चिमी और इस्लामी समाज रूढ़िवादी समाज हैं और भारत एक परंपरावादी देश...जो देश रूढ़ियों पर चलता है, उसका समाज आधुनिक कैसे हो सकता है? भारत ही आधुनिक देश है।
यूरोप, जो कि सातवीं सदी तक बहुदेव पूजक था...वह ग्याहरवीं सदी तक ईसाई हो गया...इसी समय इंग्लैण्ड के नार्मन शासकों ने पोप का नैतिक समर्थन पाने के लिये क्रिश्चयेनिटी को राजधर्म घोषित किया...चैथी सदी में रोम से शुरू हुई ईसाईयत की आंधी, चैदहवीं सदी तक पूरे एशियन देशों में फैल चुकी थी...और फिर इससे उकताकर पन्द्रहवीं सदी में स्वयं इग्लैण्ड में ईसाईयत के मानव विरोधी मूल्यों के प्रति विरोध आरम्भ हुआ। ईसाईयत की मान्यताओं के अनुसार प्रभु ने पुरूष को बनाया...पुरूष सब का लाॅर्ड है...इसी मैन, अर्थात् 'एडम' की एक पसली से स्त्री अर्थात 'ईव' बनाई गई जो कि पुरूष का ही अंश है और उसके मन बहलाव के लिये है...उनका मिलन पाप है...इस मिलन के लिये स्त्री ने शैतान के कहने पर 'मैन' को फुसलाया था...इसलिये वह मूल पाप की दोषी है, शैतान की बेटी 'विच' है...उसे यातना देना पुण्य कार्य है। पुण्य स्त्री केवल 'नन' मानी जाती है। इस मूल पाप के कारण प्रभु ने स्त्री को प्रसव, रजस्वला, गर्भ आदि सात शापों से ग्रस्त किया...अतः ईसाई धर्म में मां बनना भी एक अभिशाप है...संतानोत्पति को 'ओरिजिनल सिन' माना गया...इन्हीं मान्यताओं के कारण यूरोप में पांच सौ वर्षांे तक स्त्रियों पर सैकड़ों अमानवीय अत्याचार, पढ़े-लिखे वर्गों ने, चर्च और राज्य की संस्तुति से किये। सन 1929 में पहली बार इंग्लैण्ड की अदालत ने माना कि स्त्री 'परसन' है...स्त्रियों में आत्मा होती है, ऐसा बीसवीं सदी में मान्य हुआ। उसके बाद ही उसे बाइबिल पढ़ने और मताधिकार का अधिकार प्राप्त हुआ...वरना 14 वीं से अठाहरवीं सदी तक सैकड़ों स्त्रियों को डायन कहकर जिन्दा जलाया जाता था...इसी के विरोध में पश्चिम की स्त्री उबल पड़ी। वह विद्या, विज्ञान, शिल्प, कला के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी बनी...साथ ही शास्त्रों में वर्णित प्रत्येक शब्द का उसने अक्षरस प्रतिकार लिया..'भोग्या तथा आकर्षित करने वाली' कहा गया तो उसने श्रंृगारहीनता को अपनाया, काम को मूल पाप कहने का बदला लेने के लिये उसने स्वच्छन्दता और समलिंगी सम्बन्धों को अपनाया...मीडिया में उछलता नारी समाज का यह बराबरवाद का नारा इसी कारण सबसे पहले पश्चिम में उठा। भारत के बुद्धिजीवी क्या विज्ञान की चकाचैंध में इसी पश्चिमी समाज को आधुनिक कह रहे हैं? भागवत का आशय यही था...गांव हो या शहर, पश्चिमी जगत जिनका रोल माॅडल बनाया गया, वह इंडिया हो गया...भोग उनका दर्शन...शेष भारत अपनी परंपराओं में ही जीता रहा...भारत को इंडिया बनाने के इस इस धतकर्म में एक नाजुक कोण स्त्री का भी था।
भारत की स्त्री ब्रह्मवादिनी, सेनानी एवम् शिल्प, कला, व्यवसाय में सदैव अग्रणी थी...दास मानसिकता वाले भारतीय बृद्धिजीवियों ने अपने शास्त्रों का एक पृष्ठ पलटे बिना ही देशी चिन्तकों, ऋषियों पर, स्त्री विमर्श को केन्द्र में रखकर, लज्जाजनक आरोप लगाने शुरू किये...पश्चिमी नारीवादी चिन्तकों के अनेक आन्दोलनों से विचलित, वहां के समाज के असन्तोष की कलम को बलात् भारतीय धरती में भी आरोपित किया गया...पुरूष-स्त्री के भेद को गाढ़ा करके भाई लोगों ने अपने ही इतिहास के मुख पर कालिख पोतने का धतकर्म शुरू किया...जबकि भारतीय शास्त्रकारों ने जैसा समग्र चिन्तन स्त्री को लेकर किया है, वह अतुलनीय है, अकाट्य है...और आज इतने हजारों वर्ष बाद भी उनके लिखे एक-एक वाक्य हमारे सामाजिक सम्बन्धों के आदि अलंकार हंै...सबसे पहली बात तो यह है कि लैंगिक विभिन्नता को एक ओर रखकर हमारे शास्त्रों ने स्त्री-पुरूष को आधार रूप में एक ही माना है...इस आठ चक्रों और नौ-द्वारों वाली देह को उन्होंने 'पुर' कहा है...और इस पुर में जो निवास करता है...वह पुरूष है...अलंकृत भाषा में इस देह को अयोध्या कह के इसमें बसने वाले चैतन्य तेजपुंज को ही 'पुरूष' कहा गया है...तो अपने भाई लोगों ने पुरूष का अर्थ 'मर्द' करके मीडिया के द्वारा भयंकर आर्तनाद कर डाला...जबकि शास्त्रों का मंतव्य अलग था...यहां 'पुरूष' शब्द स्त्री-पुरूष दोनों के लिए था...आठ चक्र, नौ द्वार दोनों की देह में हंै...मन, बुद्धि और चित्त दोनों में हैं, इस कारण धर्म, अर्थ काम जैसे पुरूषार्थ दोनों के लिये प्रयुक्त हुये हैं...काले अंग्रेजों ने गोरों की किताबें पढ़कर जैसे अनर्थ अपने शास्त्रों का किया, वह अक्षम्य है...पश्चिम को स्त्री के स्वरूप का पता नहीं था...इसलिये वहां नारी मुक्ति के आंदोलन चले...वहां की स्त्री नकली पुरूष बन गई...पश्चिमी स्त्री का यह समाधान ही समस्या बन गया...स्त्री अन्ततः पुरूष से कैसे मुक्त हो सकती है? उन्होंने स्वयं को पृथक करना चाहा, आर्थिक आधार ढूंढा, समाज टूटते गये...वहां का वैज्ञानिक समाज अपने घरों की स्थिति को देखकर हतप्रभ है। पश्चिम की स्त्री पायलट है, खिलाड़ी है, सब कुछ है...परन्तु उसने नारी होने से इनकार कर दिया है। बच्चा उसके लिये बोझ है, मातृत्व को वह प्रजनन कह रही है...सदियों से उसके अन्दर पनपता क्रोध आने वाले समाज से आत्महत्यायें करवायेगा। इस सबके बाद भी पश्चिम की यह स्त्री सभी समाजों की रोल माॅडल बना दी गई। इनके इंडिया में भी वह आधुनिक स्त्री स्वावलम्बी है, स्वतंत्र है, नियमों, कर्मकाण्डों से मुक्त है...तो फिर वह गर्भ में सुरक्षित क्यों नहीं है? बराबर बनाने से स्त्री पुरूष के समान नहीं हो जायेगी, वह पुरूष के समान नहीं हो सकती...उसे पुरूष जैसा होना भी क्यों चाहिये? उसकी प्राकृतिक भिन्नता के अनुसार ही भारतीय समाज में उसकी भूमिका तय हुई थी। हमने पश्चिमी दर्शन और जीवन शैली की नकल कर अपनी परिवार व्यवस्था तो चैपट की ही, स्त्री को नकली पुरूष बनाकर उसे भी भ्रष्ट कर दिया। इस पूरी बहस का रेप और सेक्स से भी गहरा सम्बन्ध भी है। जो दिल्ली में हुआ, उस बर्बरता के बीज पश्चिम से ही आये हैं।
नवोदित पश्चिमी समाज पर डार्विन के विकास सिद्धान्त का गहरा असर पड़ा। डार्विन ने प्रतिपादित किया कि मनुष्य पशुओं का ही विकसित रूप है, अतः मनुष्य में पशुवत स्वभाव मौलिक है, जीवन का कोई भविष्य नहीं है, जन्म का विस्तार नहीं है आदि...इसी सिद्धान्त से प्रकृति का भरपूर उपभोग करने की दृष्टि प्रबल होती गई...धर्मिक देशनायें और पाप का भय, हाशिये पर चले गये। 'सर्वाइवल टू द फिटेस्ट' जैसे सिद्धान्त ने समाज को और क्रूर बनाया, 'खाओ-पिओ-मौज करो' की जो सोच विकसित हुई, उसकी शिकार फिर नये रूप में स्त्री ही बनी। पैसा ऐसे भोगवादी समाज का परम पुरूषार्थ बनना ही था...अधोगति के ऐसे दौर में, भोगवाद की इस आग में फ्रायड के सिद्धान्तों ने घी का काम किया। काम ऊर्जा की अतुलनीय शक्ति और उसके व्यापक प्रभावों के बारे में हिन्दु दर्शन को पढ़कर फ्रायड ने मनोविज्ञान की नींव रखी...काम की इस आदिम प्रवृत्ति और अपार शक्ति का प्रयोग उसने भले ही कई मनोवैज्ञानिक उलझनों को हल करने में किया हो परन्तु पश्चिम के अपने संस्कारों के कारण उसने काम को नये ढ़ंग से पनप रहे पश्चिमी बाजार की सेवा में लगा दिया। फ्रायड ने सिद्धान्त दिया कि यदि किसी वस्तु को काम से जोड़कर प्रस्तुत किया जाय तो उपभोक्ता उस वस्तु से बहुत गहरे रूप में जुड़ जाता है। सेक्स के कारण वह अनुपयोगी वस्तु में भी रूचि दिखायेगा...बाजार ने यह सूत्र पकड़ा और स्त्री के शरीर को ही बाजार बना दिया। विज्ञापनों के अखिल द्रव्य में नारी को घोलकर, उसका कभी न समाप्त होने वाला शोषण शुरू कर दिया गया। ऐसे बाजार की भारतीय नकल को ही भागवत ने इंडिया कहा है...जहां नारी भी एक प्रोडक्ट है और बाजार के अन्य सामानों की तरह समाज के काउन्टर में नित्य उपलब्ध है। इसी विज्ञापनी संस्कृति के कारण स्त्री, जो पहले चन्द्रमा, कमल, हिरनी या दुर्गा थी, अब वह अपने को सार्वजनिक मंचों पर भी 'सेक्सी' कहलाने पर प्रफुलिलत होती है...'सेक्सी' बोले तो...सेक्स करने योग्य...यह भारत की नहीं इंडिया की वाणी है...ऐसे बाजार में कबिरा कहां खड़ा होगा...? वहां रेप ही हो सकता है। 
राज्यसत्ता बाजार की नौकरानी है...तो सत्ताधारी यदि लक्ष्मण रेखायें बना भी लें तो उनका हाल मोरारजी देसाई की तरह होगा। इसलिये बाजार के मानक ही इस इंडिया के विधान हैं...वहां कांडा का जन्मदिवस है, उत्तराखण्डी महिलाओं का अपमान करने वाला मुलायम सत्ता का सबसे मूल्यवान मोहरा है, कलमाड़ी राजनीति का सबसे महंगा ब्रान्ड है...भागवत का अपराध इतना ही है कि वे मूल्यों की बात कर रहे हैं। परिवार की महत्ता समझा रहे हैं। दिल्ली की गैंगरेप की घटना को कुछ प्रगतिवादी बुद्धिजीवी अपने मूर्ख और धूर्त मीडिया की मदद से इसे मर्द बनाम स्त्री की बहस बनाकर भारतीय थिंक टैंको पर निशाना साधने के लिये एक मंच की तरह उपयोग कर रहे हैं जबकि यह बहस आपराधिक मानसिकता को बढ़ाने वाले फिल्मी उद्योग और विज्ञापन उद्योग पर अंकुश लगाने के लिये होनी थी, शिक्षा संस्थानों की पढ़ाई में इंडिया के साथ भारत को सम्मिलित करने के लिये की जानी थी...हमारी पारिवारिक व्यवस्था,सामुहिकता के टूटने और उसके कारण प्रतिबिम्बित होती अराजकता पर होनी थी...बहस राजनीति और समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता पर होनी थी...इस मोमबत्ती उठाने वाली पीढ़ी को तय करना ही पड़ेगा कि जब महानगरों की भीड,़ दो नग्न और क्षत-विक्षत लोगों को सड़क पर तड़पता छोड़कर तमाशा देख रही थी तो उनके ये साथी इंडियन थे या भारतीय...यदि भारतीय होते तो रेपिस्टों से पहले भत्र्सना इन तमाशबीनों की होती...
आज के इस नेट युग में, इस नागरी व्यवस्था में, कानून की नाक के ठीक नीचे स्त्री पर अत्याचार निरंतर बढ़ रहे हैं। समाज की काया तो बदल गई परन्तु स्त्री के लिये कुछ नहीं बदला है...उपभोग के माध्यम नये हो गये हैं...समाज का सामुहिक मन अभी भी परिवर्तित नहीं हुआ है...उसमें अभी भी आदिम बर्बरता है...पश्चिमी शिक्षा के साथ जो पश्चिमी मन हमारे समाज के ऊपर लीप दिया गया...उसी कारण स्त्री पुनः निशाने पर है। रिलीजन, विज्ञान, विज्ञापन, और साहित्य-कला के बहाने नारी के नये-नये तरीकों से आखेट हो रहे हैं...संकीर्णता की हिंसक अभिव्यक्ति में स्त्री को पुनः उपकरण बनाया जा रहा है। स्त्री के लिये सुबह कब होगी? उसके आत्मोसर्ग का मूल्यांकन कब होगा? उसकी शारीरिक विवशता को अपनी जय मानने वाला पुरूष, क्या किसी दिन पश्चाताप करके स्त्री के समक्ष नतमस्तक होगा...? स्त्री की मेधा, प्रज्ञा, सामथ्र्य को वह स्वीकार करने का साहस दिखायेगा? उसके सम्मान, उसके उत्थान को वचनवद्ध होेगा? यह शरीर का नहीं, मानसिक शक्ति का युग है...यानि स्त्री का युग है। कहीं इस बर्बरता का कारण स्त्री की बढ़ती भागीदारी तो नहीं? यदि है तोे यह देश का दुर्भाग्य है...