गैरसैण का झुनझुना

 


जब भी चुनाव आता है, उत्तराखंड के वामपंथी और कोंग्रेसी गैरसैण का राग बजाना शुरू कर देते हैं ---कांग्रेसियों का डीएनए नेहरू खानदान से आता है, वे वही करेंगे जो पिछले साठ सालों से करते आ रहे हैं। गैरसैण एक ऐसा ही झुनझुना है जिसे प्रदेश के सभी पहाड़ी नेता बजाते आ रहे हैं। उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों का उस समय तर्क था कि पहाड़ों के बीच राजधानी बनाने से पहाड़ की सड़क-दुकान, मकान सब चकाचक हो जायेंगे और प्रदेश बनाने का जो उद्देश्य था वह पूरा हो जायेगा। इसी तरह के ऊलजलूल घोषणापत्र के कारण उत्तराखण्ड क्रांन्ति दल के मुंह में पानी देने वाला भी नहीं बचा...पर गैरसैण के बेताल को सभी दल आज भी कंधे पर उठाये हुये हैं। अच्छा होता कि इन सबसे पहले पहाड़ के लोग कम से कम कर्णप्रयाग तक रेल लाइन पहुंचाने की मांग उठाते तो देहरादून अपने आप नगण्य हो जाता। उत्तराखण्ड का पर्यटन और तीर्थाटन आज भी पहाड़ों के पौराणिक चेहरे के कारण है, देहरादून को अंग्रेजों ने जंगल के सफाये पर निगरानी के लिये विकसित किया। पहाड़ों से जो आज भी पलायन हो रहा है, उसका मुख्य कारण उसकी सड़क मार्गों की दुर्गमता है, सड़क की यह दुर्गमता अनेक समस्याओं की जड़ है। पर उत्तराखण्ड के नेता सोचते हैं कि वे यदि गैरसैण कर रिकार्ड चलाते रहेंगे तो जनता उन्हें प्रदेश का सच्चा हितैषी समझ लेगी। गैरसैण में जो सत्र कराये  गये  उसमें जनता के हिस्से का करोड़ों रूपया भाजपा-कांग्रेसियों की मूर्खतापूर्ण सोच पर खर्च कर दिया गये । सरकार में बैठे अधिकारी तो वैसे भी इस पहाड़ी प्रदेश को अपनी सेवाओं के हनीमून पीरियड की तरह देखते हैं, नेताओं को ऐसे ही मूर्ख विचार बताकर वे अपना और अपने साथ जुड़े दिल्ली-मेरठ के माफियाओं के हित पूरा करने में जुटे रहते हैं। गैरसैण में तम्बू टांगे गये, दावतें हुईं, हैलीकाॅप्टर से अफसरों के चक्कर लगे और अन्त में सत्र पूरा होने पर  सरकारों  ने ढ़ोल-दमौ बजाकर नृत्य किये.थे ..ध्यान रहे यह तब भी हुआ था जब देश ही नहीं पूरा विश्व केदार त्रासदी में मारे गये लोगों की बरसी का दुख मनाने में जुटा था। पर सरकारों  को लगता है कि वे गैरसैण जाकर यदि ठुमके लगा देंगे तो त्रासदी में मारे गये लोगों को बैकुण्ठ मिल जायेगा।
केदार घाटी आज भी सिसक रही है, विधवाओं के आंसू अभी सूखे नहीं हैं, श्रीनगर से लेकर केदारनाथ और उत्तरकाशी से गोमुख तक लोगों के घर, उनके रिश्तेदारों के कंकाल मलवे सालों बाद भी दबे हैं और उत्तराखण्ड के अफसर गैरसैण की पिकनिक का आनंद ले रहे हैं? ऐसी संवेदनहीनता तो शायद अंग्रेजों ने भी नहीं की होगी। अब जब मीडिया का दवाब बना, केदारघाटी में एक साल से चल रहे आपदाप्रबंधन की पोल खुली तो माफियाओं के साथ उठने-बैठने वाले सरकारी अफसर लीपापोती करते रहे  हैं। पर कुछ लोगों को लगता है कि उत्तराखण्ड इसी लूटमार के लिये तो बना है। उस आपदा में सात हजार करोड़ की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहायता राशि से किसे राहत मिली थी, यह तो साकेत बहुगुणा, राहुल बाबा जानते होंगे, या फिर बाद की सरकारें बताएंगी कि  आखिर वे किस बात से इतना प्रसन्न थे  कि गैरसैण में उन्हें आज भी यह कैमरा नृत्य करना पड़ाता है ।
गैरसैण को प्रदेश की राजधानी बनाने का मूर्ख विचार वामपंथियों के शातिर दिमाग की उपज है...वे हर विभाग, हर क्षेत्र में अशान्ति चाहते हैं क्योंकि अशान्ति और अराजकता फैलाने के लिये ही तो उन्हंे विदेशों से फंडिग होती है...वे कर्णप्रयाग की रेलवे लाइन को जनांदोलन क्यों नहीं बनाते? क्यांेकि ऐसा करने से उत्तराखण्ड एक समृद्ध प्रदेश बन सकता है। लोग वापिस पहाड़  पर लौट सकते हैं, पहाड़ी लोगों के उत्पाद सुगमता से मैदानों में पहुंच सकते हैं, लोग देहरादून नौकरी करके शाम को अपने घर लौट सकते है...और यही तो विदेशी ताकतें नहीं चाहतीं...उन्हें भारत में हर जगह असंतोष चाहिये, गैरसैण भी एक ऐसा मुद्दा है जिससे पहाड़ का तो क्या भला होगा पर किसी भी सरकार को देहरादून में पैर जमाकर कार्य नहीं करने दिया जायेगा, यही तो कुछ शक्तियां चाहती हैं ---- यदि प्रदेश का नेतृत्व उत्तराखण्ड का हितैषी है तो सबसे पहले केदार घाटी और यात्रा मार्गों की और यहाँ के लोगों की सुध ले, यात्रा मार्ग और केदार तीर्थ में सुरक्षा और अभय का माहौल तैयार करे।