जात्री जिधर जाता है


सन २००७ में खण्डूड़ी सरकार ने तीर्थाटन के लिये अलग व्यवस्था बनाकर महत्वपूर्ण कार्य किया था / एक पर्यटक और एक तीर्थयात्री की दृष्टि में जो मूलभूत अन्तर है, उसी को रेखांकित कर पाना ही एक चतुर व्यवस्था का लक्षण हो सकता है / अपने पैसे और समय का उपयोग करना पर्यटक का पफौरी लक्ष्य होता है, वह होटलों की सुविधा पर नाचता है / पेट्रोल और पैसे की धमक में उड़ता है, सौन्दर्य स्थलों को नोचता है, बुग्यालों और हिमशिखरों को रौंदकर एक पर्यटक सन्तुष्ट होता है... इन्हीं रौंद स्थलों के चकाचक विज्ञापनों पर ही पर्यटन मंत्रालयों की समस्त ऊर्जा जाया होती है... और मार्च के अन्तिम दिन चिर्ििंत हुये लाभांश पर अनेक हाईटेक मंत्राी, अफसर अपनी छातियां फुलाते हैं / संभवतः इसी मूर्खता को पहचान कर भाजपा सरकार ने उत्तराखण्ड जैसे धार्मिक स्थान में तीर्थाटन के विचार को अपने मंत्रालय की मीमांसा का विषय बनाया है।
तीर्थयात्राी उपभोक्ता नहीं है... बल्कि वह तो उल्टे अपने अन्दर की समस्त वासनाओं से पिंड छुड़ाने ही तीर्थयात्रा पर निकलता है... दक्षिणा देने पर उसे पैसे की निरर्थकता समझ में आती है / खाने-पीने की शुचिता में दस-पन्द्रह दिन जीकर उसे इन्द्रियों की भाषा के वर्णाक्षर समझ में आते हैं... देव दर्शन, कर्मकाण्ड, पदयात्राओं से लेकर, नदियों, कुण्डों के सान्निध्य में रहकर वह भारतीय दर्शन का प्रवक्ता बनकर अपने घर लौटता है / पर्यटन और तीर्थयात्रा के दो अलग-अलग मार्गों पर निकले व्यक्तियों की व्यवस्था एक ढंग से नहीं हो सकती... दोनों के लिये अलग तन्त्रा खडे़ करके ही हम उन्हें संतुष्ट भी कर सकते हैं और राजस्व के लाभांश को भी बढ़ा सकते हैं... जबकि आज तक हमारे व्यवस्थापकों ने पर्यटकों, घुमक्कड़ों के लिये तो होटल-मोटल से लेकर थूकदान तक सजाये, और वह तीर्थयात्राी, हमारा वह देशी आदमी जो न जाने कितनी पीढ़ियों से उत्तराखण्ड के दर्शन करने आता है उसको हमने उन्हीं भगवानों के भरोसे छोड़ दिया है।
पण्डा-परिवार का होने के कारण बचपन से 'जात्राी' लोगों का आवागमन, लेन-देन, कर्मकाण्ड, सुविधा-दुविधा देखता रहा हूँ / सन् बासठ से पहले जब मोटर मार्ग )षिकेश तक ही था, उस समय भयंकर तपती दुपहरियों में पैदल यात्रा की कठिनाईयों का अनुमान आज नहीं लगाया जा सकता / अपना राशन-पानी, कपडे़, विस्तर कंधों पर रखकर सैकड़ों मील की चढ़ाई-उतराई भरी यात्रा पर जा रहे व्यक्ति की कठिनाईयाँ चाहे आज नगण्य हों पर यात्राी की भावना में अधिक अन्तर नहीं आया है, वह अभी भी यात्राी है / देवप्रयाग उस समय ऋषिकेश के बाद प्रमुख तीर्थ स्थल था... पुराने समय में जब आदिगुरु शंकर ने बद्रीश और देवप्रयाग के रघुनाथ मंदिर की स्थापना की थी तब दोनों मंदिरों में पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मण होते थे। बद्रीनाथ में नम्बूदरीपाद व रघुनाथ मंदिर में आन्ध्र के भट्ट ब्राह्मण पुजारी हुआ करते थे / ऐसे ही एक पुजारी महादेव भट्ट ने टिहरी महाराज की विनय पर स्थानीय थपलियाल जाति की स्त्राी से विवाह किया, जिसकी संतानों को टिहरी नरेश ने बद्रीनाथ धाम के तप्तकुंड और सुफल का अधिकार सौंपा... यही लोग बद्रीनाथ के पंडे कहलाये और उन्होंने देवप्रयाग महातीर्थ में अपने घर बनाये... उस कट्टर मुगलकाल में टिहरी नरेश ने पहाड़ के साढे़ तीन सौ मंदिरों को अभूतपूर्व संरक्षण दिया व पंडों को बद्रीनाथ धाम के प्रचार-प्रसार का दायित्व दिया... पंडे लोगों ने समस्त भारतवर्ष में गांव-शहर-कस्बों में भ्रमण कर उत्तराखण्ड के तीर्थों-धाम का खूब प्रचार कर यात्रियों को इन यात्राओं के लिये प्रोत्साहित किया... / पैदल यात्रा के समय पंडे तथा उनके गुमाश्ते यात्रियों को साथ लेकर विभिन्न चट्टियों में टिकते, खाने-पीने की व्यवस्था के अतिरिक्त सम्पूर्ण धार्मिक वृतान्तों की जानकारी, देवदर्शन और पुनः ऋषिकेश तक यात्रियों को सकुशल लौटाना पंडों के दायित्व में शामिल था / इस पूरे तन्त्रा में देवप्रयाग के आस-पास चालीस-पचास गांवों के सैकड़ों लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस आर्थिकी से जुडे़ थे / महीनों की इस यात्रा अवधि में प्रशासन की सहायता के बिना ही चोरी, हत्या, व्यभिचार की घटनायें लगभग शून्य थीं / जिन टिहरी महाराज के 'बोलांदा-बदरी' नामकरण पर कुछ प्रगतिशील पत्रिकाओं को आपत्ति है, उन नरेश ने ही उत्तर भारत की तीर्थयात्राओं को सुचारु रूप से चलाने में महत्वपूर्ण भूमिकायें निभाईं, यात्रा को शासन का दायित्व समझा।
बचपन में छतों, सड़कों के किनारे खाना पकाने वाली बूढ़ी स्त्रियों को देखते हम बच्चे कौतुक से भर उठते थे, स्त्रियों के झुर्रीदार हाथ की चित्रकारी, उनके विचित्र गहनों को हाथ से छूते थे / उनके सत्तू, पिंजरी, अमावट और गुड़ पर मक्खियों की तरह भिनभिनाते हम बच्चों की हथेलियों में स्त्रियां चिडुवा, गुड़ रख देती थी, कई वृद्ध  हमें पंडों की संतानें समझ हमारे छोटे पैर छूने की कोशिश करते तो हम भाग खडे़ होते थे... यात्रियों के दिये दर्पण, चूड़ियां, बिन्दी, फकुँलि (ओढ़नी) ही हमारी बाल क्रीड़ा के अस्त्र-शस्त्र थे / उन यात्रियों की बोलियां, पहनावे उनके जिलों-तहसीलों के नाम हमें कंठस्थ रहते थे / उन दिनों देवप्रयाग समस्त भारत के सांस्कृतिक-पुष्पों से रंगबिरंगा बना रहता था, वेशभूषायें, खान-पान और भाषा-बोलियों की विविधता को ही व्यवसाय बनाता पंडा समाज उन पुरानी स्मृतियों को बीज रूप में संभाले हुये है / तब के भाजपा के पर्यटन मंत्राी प्रकाश पंत ने तीर्थयात्राओं के प्रबन्धन के लिये जो भी ब्लू-प्रिन्ट बनाया था  उसमें उत्तराखण्ड के समस्त तीर्थों के पंडे उन्हें अनुभूत सुझाव दे सकते थे । पंडों की सक्रिय भागीदारी के बिना तीर्थाटन न तो कमाऊ उद्योग बन सकता है और न ही आम जनता की कमाई का स्रोत ।
मोटर मार्ग बनने पर तीर्थयात्राओं का पूरा ढांचा छिन्न-भिन्न हो गया / यात्राी, जो पहले पंडों और उनकी व्यवस्था से जुडे़ हजारों लोगों की आर्थिकी का ड्डोत था वह बडे़ व्यावसायियों के चंगुल में पंफसाकर 'पर्यटक' बना दिया गया / बस मालिकों ने अधिकाधिक मुनापफा कमाने के चक्कर में यात्रियों को )षिकेश से उठाकर सीधे गंगोत्राी, गुप्तकाशी या बद्रीनाथ में पटकना शुरू कर दिया / यात्रियों को बलपूर्वक धार्मिक स्थानों की जगह इच्छित स्थानों पर रुकवाकर होटल व्यवसायी और मोटर मालिक मिलकर लूटने लगे / रास्ते में पड़ने वाली चट्टियां, तीर्थस्थान वीरान पड़ते गये, लोगों से रोजगार छिना और यात्रा का जो भारतीय लक्ष्य था, वह समाप्त हो गया / दूसरी मूर्खता हमारी सरकारों ने यह की कि वह तीर्थयात्राओं का स्वरूप समझे बिना मन्दिर व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करने लगी / मन्दिरों की दक्षिणायें लखनऊ की काॅकटेल पार्टियों का अंग बनने लगी और दूसरे गढ़वाल मण्डल विकास निगम में 'पर्यटन' की विदेशी पढ़ाई पास किये बच्चों को इन यात्राओं का प्रबन्धन संभालने का दायित्व दिया गया / पर्यटकों की तर्ज पर तीर्थयात्रियों के चारों ओर पोस्टर, पैग और पहिये की सुविधा टांगी गई जिससे ग्रामीण भारत का धार्मिक-व्यक्ति आहत हुआ है। वह यात्रा मार्ग में पड़ने वाली अण्डे की क्रेट, और पूर्व सरकार की शराब-नीति पर वितृष्णा से भर उठता है।
आज तक किसी भी पर्यटन मन्त्राी को पर्यटन और तीर्थाटन का अन्तर समझने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई / तीर्थयात्रियों को सुविधा नहीं शुचिता चाहिये... यात्रा मार्ग में पड़ने वाले रेस्तरां, होटल, व्यक्ति, घाट, पंडे, नदियां, सम्पूर्ण दृश्य जगत की शुचिता को देखकर ही कोई यात्राी आंखें बन्द करके प्रभु का ध्यान कर सकता है / मैदानी इलाकों की मारकाट और उछलकूद यदि इन प्रयागों में भी दिखायी देगी तो यह तीर्थस्थान नहीं हो सकता। नये पर्यटक स्थलों को चिर्ििंत कर उनका प्रचार तथा विकास नयी पढ़ाई वाले बच्चे करें। देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने की हाईटेक योजनायें तैयार करें, होमवर्क करें, ड्राइव-वे, स्वीमिंग, राफ्रिटंग,, क्लाइंबिंग सुविधायें देकर अपना अलग ढांचा तैयार करें,..... बोलांदा-बदरी और पंडों की मेहनत पर तैयार तीर्थ-व्यवस्था की कमाई पर एयरकंडीशंड दफ्रतरों में बैठ-बैठ कर टेलीपफोन पर अंग्रेजी पूंफकना, एक नैतिक अपराध है। दूसरे की मेहनत पर हाथ सापफ करके अपनी मूंछे बढ़ाने वाला पर्यटन विभाग स्वयं को गब्बर सिंह कहने में लज्जित क्यों नहीं होता?
भाजपा सरकार  का यह निर्णय सम्पूर्ण भारतवर्ष के आम आदमी के अन्दर बैठे उस धार्मिक आदमी को उत्साहित ही करेगा जो अपनी भागमभाग वाली रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ क्षण के लिये तीर्थयात्रा पर निकलता है / नदियों में डुबकी लगाकर ज्ञान-तरंगों को सुनता है / सौम्य-शांत इन धार्मिक पथों से गुजरते हुये उसे भी कुछ देर के लिये लगेगा कि वह गौतम, नानक, ओशो, महावीर, कृष्ण और राम की भूमि का नागरिक है... वह भी कुछ देर गौरव से शीश उठाकर इन उत्तुंग शिखरों को देखेगा जिनमें तपस्यारत होकर, विचरण कर हमारे अवतारों ने कुछ देर के लिये इस भारतभूमि को अपने आलोक से ओतप्रोत किया था... तब चाहे हमारा वह यात्राी कार में ही क्यों न बैठा हो, हम उसके अन्तस में बैठे धार्मिक व्यक्ति को ऐसा वातावरण तो दे ही सकते हैं कि वह अपने को पर्यटक नहीं बल्कि तीर्थयात्राी समझे... वह भी पंडे की 'बही' में अपने पुरखों का नाम ढूंढे और साथ ही अपना नाम लिखाकर अपनी आने वाली पीढ़ी को तीर्थयात्रा का संदेश छोड़ जाय... तीर्थयात्रा, सनातन-मार्ग पर चलने का पुण्य विचार है। यह पर्यटन की तरह दुधारु उद्योग नहीं है, यह अलग बात है कि उत्तराखण्ड के पर्यटन मंत्रालय की 'टीम-टाम' उसी यात्राी की दक्षिणा पर चलती रही है, जिसे वह अपने चिकने रिसेप्शन पर बैठी मक्खी समझता है। ु