जन्मोत्सव- प्राच्य आनन्द का पाश्चात्य उल्लास


प्रसवकाल जीवन और मरण का संधिकाल होता है। चेतना के शरीर रूप में धरा पर अवतरण का काल होता है। प्रसव घोरतम पीड़ाकारण और सबसे जटिल जीवाशास्त्रीय प्रक्रिया है। स्वाभाविक है कि जब कोई जातक इस विलक्षण सृष्टि में संभावनापूर्ण जन्म लेता है तो पहला उल्लास मां को प्रसववेदना से मुक्ति का मनाया जाता है और तदोपरांत नवजात की नवयात्रा के आह्वान का। वाणी ब्रह्म है और सम्प्रेषण  के चार माध्यमों-चक्षुसा, मनसा, बाचा, कर्मणा-में सबसे सरल और सफल माध्यम है इसलिए नवजात के स्वास्थ्य की पहली पड़ताल वाणी की होती है। माता से उसकी कुशलता पूछते समय लोग शिशु  की वाणी के बारे में भी पूछते हैं। ज्ञान, बुद्धि, आत्मा और पूर्वप्रज्ञा (जीवात्मा द्वारा पिछले जन्मों के कर्मफल का संचय) के अलौकिक अनुभवों की दिव्य मुखाभिव्यक्ति वाणी ही कर सकती है। नवजात की वाणी रहस्यपूर्ण और बेबूझ होती है। नवजात नई नियति, नए नियमन, नवाचार, नवोत्थान और नूतन सौभाग्य का प्रतीक होता है। नवजात शिशु में माता-पिता एक बार फिर अपने बचपन का प्रतिबिम्ब देखते हैं...इसलिए आनन्द का अतिरेक होना असामान्य नहीं कहा जा सकता। नाचना और गाना लौकिक आनन्द की अभिव्क्ति के दो सबसे सरल माध्यम हैं इसलिए जन्मोत्सव नृत्य और गायन से परिपूर्ण रहता है। शैक्सपीयर की अमर कृति 'बाहरवीं रात'-प्रभु ईसा मसीह के जन्मोसव जिसे 'इपिफेनी' कहा जाता है, पर आधारित है और पूरा नाटक नृत्य संगीत और गायन से ओतप्रोत है। तथापि जन्मोत्सव किसी सभ्यता विशेष की देन कदापि नहीं है। संसार के प्रत्येक भूखण्ड में अलग-2 शैली में जन्मदिन का उल्लास मनाया जाता है। जहां तक जन्मदिवस मनाने की पाश्चात्य (मूलतः ब्रिटिश) शैली की लोकप्रियता का प्रश्न है तो इसका एक प्रमुख कारण ब्रिटिश उपनिवेशवाद का विश्वव्यापी प्रभाव है जिसने भाषा के साथ-साथ जीवनशैली का भी अमिट प्रभाव छोड़ा। अमेरिका,आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, एशिया, यूरोप जैसे महाद्वीपों के सैकड़ों राष्ट्रों पर अंग्रेजों ने अनाधिकार प्रभुत्व स्थापित किया। प्रत्यक्ष-परोक्ष तौर पर अंग्रेज साढ़े तीन सौ साल भारत में रहे और स्वाभाविक रूप से भारतीयों ने उनकी जीवनशैली को प्रभावपूर्ण और विकसित मानकर अपनाया। इसके अलावा ब्रिटिश उपनिवेशवाद और वर्तमान 'राष्ट्रमण्डल' (जिसे मैं 'साइकिक और काॅलोनियलिज़्म कहता हूँ) के देशों में पाश्चात्य आचार-विचार, जीवनपद्धति, प्रजातंत्र,नियम-कानून और धर्म-दर्शन का प्रत्यक्ष प्रभाव है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखंे तो हमारी पुलिस व्यवस्था, न्याय प्रणाली, शिक्षा प्रणाली, नौकरशाही, वन प्रबन्धन व्यवस्था, लोकतंत्र के छदमवेश में सामन्तशाही मानसिकता इत्यादि न केवल ब्रिटिश उपनिवेशवाद (सामाज्यवाद) की नकल है वरन् कहीं-कहीं तो इसे ज्यों का त्यों अपनाया गया है। हमारे न्यायाधीशों के चेतन-अवचेतन का प्रत्येक भाग 'गोरा' होता है सिवाय कोट और काॅलर को छोड़कर। भारतीय अभिजात और मध्यवर्ग दशकों तक पाश्चात्य (इसे ब्रिटिश पढ़े) जीवनशैली-कार्यशैली का प्रशंसक रहा है। अंग्रेजी तरीके से मनाया जाने वाला जन्मोत्सव उसी जीवनशैली का अवैध मुखपत्र है जिसका पोषण-संरक्षण हम देश के कोने-कोने में कर रहे हैं। अभी-अभी एक राष्ट्रीय पार्टी के 'सादगी दिखाओ अभियान' के दौरान पांचसितारा जीवनशैली में व्यवधान पड़ने पर झुंझलाये शशि थरूर जब एक बेहया तर्क दे रहे थे कि 'शर्मिंदा तो मैं तब होता यदि मैं जनता के पैसे से पांचसितारा होटल में रूकता, मैं तो अपना पैसा खर्च कर रहा था। उनके इस कथन से मुझे विचारक हेराल्ड जें. लास्की याद आए जिनका मानना था कि 'अगर मेरे लजीज व्यंजन खाने से पड़ोसी से उसकी रूखी-सूखी रोटी का अधिकार भी छिन जाए तो मुझे ऐसे भोजन पाने का कोई अधिकार नहीं है। शक्ति और सत्ता के जोश में शशि थरूर भूल रहे हैं कि मानव होने के नाते हमारे इस धरती के प्रति कुछ नैतिक दायित्व हैं। निरन्तर प्रगतिशील मानव ने अपने बुद्धिबल के सहारे संसार के सभी प्राणियों पर नकेल कसी है किन्तु स्वयं को उनका संरक्षक कभी नहीं समझा। यह दुनिया अकेले आदमी की बपौती नहीं है और न ही उसे सृष्टिचक्र में किसी अमर्यादित दखल का हक है। खैर, पशुओं को अपने सहअस्तित्व का अनिवार्य हिस्सा समझना तो दूर, मानव भी मानव को समान मानने को तैयार नहीं है। हम उस दुनियां के सबसे भयावह ढंग से बंटे हुए लोग हैं जिन्होने इस प्यारी दुनिया का स्वरूप बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिस अंग्रेजियत के वैचारिक उच्छिष्ठ का भोंटा ठुमका थरूर जैसे ऐफ्लुऐंट लोग अपनी नग्न और चकाचैंध भरी पार्टियों में लगाते हैं उसी पार्टी की बची जूठन चाटने के लिए हजारों लोग रोज कटते मरते हैं। ऋण अदायगी न कर पाने के कारण जिस देश में हजारों किसान आत्महत्या करते हों, बच्चे कुपोषित, कुशिक्षित,कुदीक्षित और भूखे मर जाते हों, कालाहाण्डी का वनवासी पत्ते खाते-खाते मर जाता हो, दहेज के लोभियों के कारण बेटियां बिनव्याही रह जाती हों, महाजनों का 'गोदान' पूरा न होने पर आदमी अपनी पत्नी और बेटी की अस्मत न बचा पा रहा हो, छब्बीस करोड़ लोग तिरपाल के नीचे सड़ रहे हो-उस देश का विदेश राज्य मंत्री ऐसी दो कौड़ी की सोच पाले हुए है? मिस्टर थरूर, क्या यही सेंट स्टीफन की पढ़ाई है? क्या हवाई जहाज में उड़ते-उड़ते तुम जमीन से इतने ऊपर जा चुके हो कि लैंड करना तुम्हें अपमानजनक लगने लगा है। आज जब समाज उजड़ रहे हैं, रिश्तों की डोर टूट रही है, परिवार बिखर रहे हैं सामाजिक संस्थाएं छिन्न-भिन्न हो रही है, पूरी दुनियां गहरी आर्थिक एवं आध्यात्मिक मंदी से गुजर रही है तो भी हम भारतीयों का हैप्पीनैस कोशिएंट गजब की ऊंचाई पर है। ऐसा इसलिए है कि हमारे यहां परिवार, दोस्ती, समाज, शादी, सामाजिक मूल्य इत्यादि शब्दों के अर्थ व्यापारिक पैमाने वाले नहीं है। यहां धन खत्म भी हो तो भी दोस्ती रहती है। यौवन के अवसान से दाम्पत्य और निखरता है, लोग ज्यादा बहर्मुखी हंै, बच्चे पवित्र धर्म और खुशी से मां-बाप और परिवार के साथ रहते हैं इसलिए मीलों दूर किसी गुमनाम शहर के अंधेरे फ्लैट में रह रही मां की सुध 'मदर्स डे' पर लेने जैसा पाखण्ड यहां कम ही होता है।
साहित्य के विद्यार्थी के तौर पर मेरा स्पष्ट मानना है कि इतिहास का ईमानदारी पूर्वक जब भी सिंहावलोकन होगा और रोती-बिलखती विश्व मनीषा भविष्य में जब भी मानवीय गरिमा और विश्व के नवनिर्माण की पूर्वपीठिका बनाएगी तब उसकी संयोग भूमि (रैलीइंग पोइंट) भारतवर्ष ही होगी। श्रुति और वेदों की परंपरा वाला देश ही अंतरिक्ष और पाताल लोकों तक केे कल्याण की देशना दे सकता है। इसलिए मैं सम्पूर्ण विश्व के सुरक्षित भविष्य के प्रति पूरी तरह आस्वस्त हूं। विकृतियों के बाजार को घड़ी देर और सुलगाने दो बन्धु! फिर देखना 'पोर्न लाइफ' के ये प्रस्तोता पाॅपकोर्न की भांति अस्तित्व की गरम भट्टी से छिटककर अपने आप दूर हो जाएंगे।
सितंबर 09 में हाॅलीवुड अभिनेत्री जूलिया रोबर्ट्स भारत आई और दिल्ली के एक आश्रम में उसने अपने बच्चों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया। पाश्चात्य विचारक, सुधारक  और धर्मगुरू अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं क्योंकि किशोरों और युवाओं में यौन उन्मुक्तता पागलपन तक बढ़ गई है, बाल अपराध चरम पर है, युवा उच्छंखल और बुजुर्ग पीढ़ी अवसादग्रस्त और उपेक्षित है। लगभग प्रत्येक दूसरा अमेरिकी तलाकशुदा है। एक ही परिवार में इतनी वैरायटी के बच्चे हैं कि प्यारे सदगुरू ओशो अप्रैल 2009 के 'ओशो वल्र्ड' में चुटकी लेते हुए कहते हैंः 'दो पति-पत्नी आपस में बात कर रहे है तभी पत्नी ने कहा- देख रहे हैं आप, मेरे और तुम्हारे बच्चे मिलकर हमारे बच्चों को मार रहे हैं!
अब मैं पुनः प्राच्य जन्मोत्सव पद्धति पर पाश्चात्य शैली के प्रभुत्व पर अपनी बात केन्द्रित करूंगा। मेरी समझ के अनुसार पांच मुख्य कारण है जिनकी वजह से जन्मदिन मनाने का अंग्रेजी तरीका भारत में इतना लोकप्रिय हो गया है-
1. उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवादी सांस्कृतिक-धार्मिक प्रसार नीतियों का प्रभावः- भारतीय जीवनशैली को अंग्रेेजों की साम्राज्यवादी धार्मिक-सांस्कृतिक नीतियों ने बड़ी गहराई तक प्रभावित किया है। जन्मोत्सव का तरीका भी इसी प्रसारवादी विरासत का उपांग है।
2. आंग्ल जीवन-दर्शन के अंधानुकरण की रूग्ण भारतीय मनोवृतिः- हमारे भारत में 'अंग्रेजी' के नाम पर शराब, शबाब, शिक्षा, दीक्षा, योगा और फाॅस्ट फूड (स्लो लाइफ!) इत्यादि न जाने क्या-क्या बिकता है। बर्थडे पार्टी इसी अंग्रेजियत का एक स्वरूप है। इस साल 26 जुलाई को श्री अरविन्द आश्रम दिल्ली में 'इलिंग, ब्रीथिंग एण्ड स्लीपिंग'-नामक विषय पर बोलते हुए 'मानव मशीन' जैसे कृति के लेखक आश्रम के साधक डाॅ0 रमेश बिजलानी ने चुटकी ली-'पश्चिमी समाज में प्रचलित प्रत्येक तौर तरीके को हम आंख बन्द कर अपनाते हैं ये सोचकर कि अंग्रेजों का तरीका है, अच्छा ही होगा'
3. हिन्दी सिनेमा का प्रभावः-जन्मोत्सव के पश्चात्य तरीके का प्रचार-प्रसार करने में हिन्दी सिनेमा का योगदान भी कम नहीं है। मैंने जितनी भी हिन्दी फिल्में देखी हैं सबमें जन्मदिन मनाने का तरीका पाश्चात्य था। सामाजिक सांस्कृतिक जागरूकता का सशक्त माध्यम होने के कारण इस प्रकार के प्रचार ने मदुरै से लेकर मागा तक लोगों के आचार-विचार को प्रभावित किया है।
4. भारतीय परंपराओं-जीवनमूल्यों के प्रति भारतीयों का स्तब्धकारी नजरियाः- पाश्चात्य जीवनशैली को हमारे देश में उन्नत माना जाता है। फिल्म जगत, मीडिया, व्यापार, राजनीति, खेल, लेखन तथा समाजसेवा जैसे क्षेत्रों में एक वर्ग विशेष इतना अंग्रेजीदां है उसे स्वयं को भारतीय स्वीकारने में भी शर्म आती है- कुछ-कुछ हमारे पं0 नेहरू जी की तरह। इन 'एडवांस' और एक्स्ट्रामार्डन लोगों के पाश्चात्य तौर-तरीकों का गजब का फैन फेयर होता है। हमारे बच्चों और कुत्तों के नामों में मिटता फर्क, हमारी खान-पान की बदलती आदतें, क्षरण होते जीवन मूल्यों का निहंग प्रदर्शन और इन सबके तह में भारतीयता को दोयम दर्जे का समझने का आत्मघाती विषाणु-बड़ी आसानी से कहीं भी देखा जा सकता है।
5. मेरे विचार से पाश्चात्य जन्मोत्सव पद्धति की अपार लोकप्रियता का पांचवा और अंतिम कारण-इसमें समाहित बाल मनोविज्ञान, कुतूहल और उत्सवप्रियता के सभी कोणों का मनोरंजन करने की क्षमता है। बर्थडे केक, कार्डस, हैट, बलूनस, कैण्डल, गिफ्ट, स्टोन, बर्थडे साँग, डाँस, फ्लावर्स और सुन्दर कपड़े इत्यादि धूम धड़ाके को बच्चे अधिक पसन्द करते हैं। बाल मनोविज्ञान को लुभाने में उपर्युक्त सभी वस्तुओं ने आधारभूत भूमिका निभाई है।
किन्तु प्रश्न केवल इस पाश्चाय परंपरा का ही नहीं है। हमारा पूरा समाज तेजी से पाश्चात्य जीवन दर्शन का पुजारी बनता जा रहा है। लोग परंपरा को आधुनिकता का विरोधी मान रहे हैं। हाल के वर्षो में भारतीय नौनिहालों में प्रत्येक स्तर पर संवेदनहीनता बढ़ी है, रिश्तों की डोर टूटी है, विश्वास चटका है, मर्यादाओं को वनवास मिला है। खुलेपन और आधुनिकता के नाम पर समलैंकिगता को खुला समर्थन लिव इन रिलेशनशिप (बिन फेरे, हम तेरे) की बेहया वकालत, बढ़ते इतर वैवाहिक सम्बन्ध, बूइंग और डेटिंग का बढ़ता चलन, घरों का उजड़ना और एकाकी परिवारों का बढ़ता चलन आने वाले 'भारतीय समाज' की नियति का मोटा खाका को खींच ही रहे हैं। 'ये कहां आ गए हम....अगर चिंतनीय हैं तो 'कहां जा सकते हैं हम-निःसंदेह भयावह होगा। लोग भारत की ओर बड़ी आशा से निहार रहे हैं और हम उनके माउस की क्लिक को ही अनाहत नाद का सूत्र समझ बैठे हैं। अंत में मैं जस्टिन मैकार्थी जिन्होंने भरतनाट्यम को साधना और भारत को अपना घर बना लिया है द्वारा लिखित 24 अगस्त 2009 के अंग्रेजी आउटलुक (पृष्ठ-82-83) में प्रकाशित लेख की कुछ अनूदित पंक्तियों को उद्धृत करना चाहूंगाः
परंपराओं की विविधता! खान-पान की विविधता, अलग-अलग रंग रूप के लोग, कला के स्वरूपों की विस्मयकारी विविधता! भारत के कुछ और छोटे-मोटे आनन्द भी हैं, लुंगी, धोती, साड़ी आदि, नमक और घी के साथ गरम भात। फर्श पर बिछाकर धोये जाने वाले कपड़े,मग्गों से स्नान और गुलाब जामुन...अनन्योन्याश्रित अनेक धर्मांे और जातियों के लोग...चाय की दुकानें...प्रतिदिन दो बार संस्कृत में समाचार...अतिथि देवो भवः का वन्दनीय आदर्श। और अन्ततः मैत्री के सूत्र में बांधनंे वाले कई सहृदय मित्र।