केदारनाथ


शिव तुम कल्याणकारी हो/ आदि हो अनंत हो
सृष्टि का आदि-मध्य-अंत तुम्हीं से है
परम ब्रह्म, परम सत्य का साकार रूप ही प्रकट हुआ
काशी, उज्जैन, और केदारघाटी में
भाव, भावना और भक्ति से भरपूर तुम्हारे भक्त
दूर-दूर से पैदल चलकर आते थे
तुम्हारे साथ ही देवभूमि का दर्शन करने
यहां का कण-कण पावन पवित्र
कंकड़-कंकड़़ शंकर था
यहां के बच्चे, स्त्री-पुरूष
सहजता सरलता से भरपूर
दैवीय संतान जैसे 
पावन-पवित्र
कहां खो गये वो भाव?
क्या विकास निगल गया
हमारी मानवता को?
खोद डाले हमने पहाड़
बांध डाला हमने
पावन पवित्र गंगा को
जीवन दायिनी, 
मोक्षप्रदायिनी भागीरथी
झील में समा गई या,
हमारे कृत्यों से शरमा कर
सीधे पाताल चली गई
बिना भूतल पर आये?
प्रकृति की गोद में सजे-संवरे
हमारे केदारनाथ
घुटन महसूस करने लगे, 
पास बने होटल और गेस्ट हाउस से
तुम तो सारे जगत के स्वामी हो प्रभु!
प्रकृति के प्रतीक सभी प्राणिमात्र को स्वीकार किया तुमने
सांप तक को गले लगाया
जहर पीकर नीलकंठ हो गये प्रभो!
तो प्रकृति का अविवेकी दोहन तुम्हें सवीकार है प्रभो!
रूद्ररूप में प्रकट होकर तुम बता गये अपनी असहमति
प्रकृति का विनाश तुम्हें स्वीकार नहीं
क्षमा करो हमे सद्बुद्धि दो
हम पूजें प्रकृति को, सम्मान करे नदियों का, वृक्षों का
प्रकृति के हर रूप में दर्शन करें तेरा
परम सत्य का, परमात्मा का।