नारी


(वक्रतुण्डोपनिषद )


वेणी में गुंथ गया, धैर्य ही
नियम भंग शिष्टों के पल में
संयम की पतवारें टूटीं
नाभि-गव्हर की हलचल में


कोण उत्तेजक उठा देह के
गजगामिनी वह डोले है
छुपा स्मरण स्पर्शाें के
मौन लाज का ओढ़े है


रूप के ज्ञानी रस-विज्ञानी
महाविराट की कथा कहो
अपनी कृति का, अपने मुख से
गणपति मृदु आख्यान कहो!