राजेन टोडरिया


राजू चला गया...वह हमारी बचपन की मित्रमंडली का तीसरा नेत्र था। देवप्रयाग में हमारी यह मंडली उम्र के उस मोड़ पर बनी थी जब जीवन का अंधा मोड़ आता है और जब खून की रफ्तार सबसे तेज होती है। राजू हमारे लिये सूचना संसार की खिड़की था...उसके हाथ में हमेशा दिनमान या धर्मयुग हुआ करती थी, जिन्हें वह अपने जुगाड़ से मांग-मांग कर पढ़ता था। लुगदी प्रकाशन का परिचय मित्रमंडली से करवाने का श्रेय भी राजू को जाता है। पढ़ना उसके लिये खाने की ही तरह ही था...राजेन वह बाद में बना, कैसे बना, क्यों बना, कहना नहीं चाहिये। कई पत्रकार जो कि राजेन के मित्र बाद में बने होंगे, वे उसकी मृत्यु के बाद राजेन पर कई तरह के आरोप मढ़ रहे हैं, आलोचनायें लिख रहे हैं...वे सब कायर हैं। क्योंकि उनका प्रतिकार करने के लिये राजेन आज उपस्थित नहीं हैं...ऐसे लोग भारतीय नहीं हैं। राजेन होता तो उन्हें कोई ऐसा लिखने का साहस नहीं करता, राजू उनके धुर्रे बिखेर देता। उसकी कलम ही उसकी कवच थी।
राजू देवप्रयाग से चार किमी दूर सौड़ गांव से पैदल ही पढ़ने और घूमने आता था। उसे दोस्ती की लत थी...जिस दिन भोजन का जुगाड़ हो जाता वह देवप्रयाग ही रूक जाता..ठहरने को राजेन्द्र कोटियाल की कोठरी थी ही...जिसे वह काली कमली का क्षेत्र कहता था, इस कारण वह कोपभाजन भी बनता। राजेन्द्र कोटियाल की कोठरी मित्र मंडली का मुख्यालय थी, वहां पढ़ाई भी चलती, फिल्मों के मांसल विमर्श चलते, संगीत के दौर होते और लैंगिक उत्कंठाओं पर चर्चायें चलतीं। तम्बाकू और चाय का अतिरिक्त बोझ सह रहे राजेन्द्र कोटियाल का मंडली पर इस कारण दवाब भी रहता पर राजेन इस दवाब में कभी नहीं आता था, राजेन जीवन भर कभी किसी के दवाब में नहीं आया। प्रतिष्ठान विरोध की आदत मुझे राजेन से ही मिली...हलांकि बाद के वर्षों में ओशो को पढ़ने के कारण अपनी दिशा बदली पर राजेन भी अन्य वामपंथियों की तरह व्यक्तिगत परिवर्तन की जगह समूह में विश्वास करते रहे। वहीं से हम दोनो के रास्ते अलग हुये, और जब मैं भी पत्रकारिता से जुड़ा तो यह वैचारिक वैमनस्य और बढ़ा...बचपन में जब कभी स्कूल के बाद वह बाजार की खाक छानने के लिये तैयर होता तो मुझे जबरन रजाई से खींचता, सुट्टे का लालच देता, अपने आप ही मेरे कस्ट्यूम बदलता...मैं जानता हूं कि उन गलियों से उसे कभी कुछ नहीं मिला...इसी कारण यह छीनने वाला वामदर्शन उसे जीवन भर लुभाता रहा। राजेन हमेशा अपनी शर्तों पर जिया...देखना, पढ़ना और फिर बिंदास होकर लिखना, मैंने उससे बड़ा हंसोड़ नहीं देखा...जीवन के अनेकों अभाव जीने के बाद भी वह जीवन पर पलट कर हंसता था, जितनी साधारण उसकी दिनचर्या थी, ठीक उलट, उतने ही शास्त्रीय उसके व्यंग्य होते थे...राजेन के शब्द हंसिया की तरह थे, वह बीस वर्ष पत्रकारिता जगत में रहकर अनेक ज्वलनशील मुद्दों पर कलम चलाता रहा...वह पहाड़ की पत्रकारिता का एक गुमनाम शिखर था...उसने कितनी कवितायें कीं, नहीं जानता, पत्रकारिता के अतिरिक्त उसने जो भी लिखा है उसका संकलन होना चाहिये। मैंने फेसबुक पर भी उससे दोस्ती की...पर बात नहीं जमी...उसने गुस्से में मुझे 'अनफ्रैंड' कर दिया...पर वह दोस्ती तोड़कर इतनी दूर जाने वाला है, ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था...पता होता तो शायद मैं राजू के लिये हथियार डाल भी देता...पर वह तो बिना किसी को बताये चुपचाप खिसक गया...एक गजल याद आती है...'गये दिनो का सुराग लेकर, इधर से आया उधर गया वो/ अजीब मानुष अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो/ तेरी गली तक तो हमने देखा था, फिर न जाने किधर गया वो...'