यह विरासत है या शरारत


(प्रदेश के लोग जानते हैं कि यह 'विरासत' किन लोगों का सांस्कृतिक चेहरा है। संस्कृति के इस धन्धे में अफसरों  के अपने परिजनों के एनजीओ और सरकार का नापाक गठबंधन शामिल है। सांस्कृतिक गर्भ से जन्में इस पहाड़ी राज्य में संस्कृति कर्मियों का निरन्तर अपमान किया जाता है, क्षेत्रीय कलाकारों को धन तो दूर, उल्टे पुलिस द्वारा पिटवाया जाता है। संस्कृति-साहित्य परिषद जो कि क्षेत्रीय कलाकर्मियों की आवाज का मंच था, उसे भंग कर दिया गया है जो कि प्रदेश के बड़े अधिकारियों के इशारे पर किया गया। क्योंकि परिषद में जन प्रतिनिधियों के अंकुश के कारण फन्ड की यह लूट निर्बाध रूप से संभव नहीं थी, तो परिषद को ही ठिकाने लगा दिया गया...यह विरासत इन्हीं सांस्कृतिक अपराधियों की शरारत है। प्रस्तुत लेख में कोटनाला जी ने संस्कृति के नाम पर होने वाली इस गुन्डागर्दी का, संवेदनहीनता का, इस पूरे घटनाक्रम का एक खाका खींचा है-सं0)


देश को विदेशी शासन से मुक्ति 1947 में मिलने से भी पहले गढ़वाल -कुमायुं (अब प्रदेश उत्तराखण्ड) नाम के इस भूखंड की विषम भौगोलिक बनावट के कारण विरासत में मिली गरीबी और पिछड़ेपन के विरुद्ध आवाज उठने लगी थी। यहां विकास की प्रत्याशा में पृथक प्रदेश की मांग के साथ सर्वप्रथम सन 1926 ई0 में 'कुमायुं परिषद' से मुखर हुई और कुछ अंतराल के बाद अनेक संगठनों के जन्म के साथ 1968 में 'पर्वतीय राज्य परिषद' व 1979 में 'उत्तराखण्ड क्रांतिदल' आदि नामों से राजनैतिक मंचों-दलों की स्थापना हुई  जिन्होंने एक सूत्रीय मांग के द्वारा पृथक पर्वतीय प्रदेश के निर्माण के लिए संकल्प लिया। गढ़वाल-कुमायुं के गांवों से लेकर नगरों तक और प्रवासी पलायन-उन्मुख व्यक्तियों द्वारा देश भर के भिन्न-भिन्न नगरों में सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों के द्वारा अपनी पर्वतीय संस्कृति की रक्षा के लिए पृथक राज्य-निर्माण की अलख जगाना शुरु किया जिसका मुख्य उद्देश्य अपनी हिमालयी 'विरासत' को लुप्त होने से बचाना था। इस प्रकार बहुमुखी प्रयोजनों व आयोजनों के द्वारा इस निमित्त बुद्धिजीवी वर्ग ने सामुहिक रूप से संगठित होकर प्रयास करना प्रारम्भ कर दिया था। अपने पृथक 'पर्वतीय राज्य का आंदोलन' के 74 वर्षों के लम्बे और दुर्धर्ष संघर्ष के बाद-हड़ताल, जुलुस 'अनशन, अपमान, लाठी-गोली, कफ्र्यु, जेल और बलिदान के दमन-चक्रों को सहते-झेलते हुए अंततः 9 नवम्बर सन 2000 में जाकर 'उत्तराखण्ड' का स्वप्न साकार हो सका। लेकिन दुर्भाग्य से पृथक राज्य की स्थापना के बावजूद शासन की बागडोर प्रारम्भ से ही ऐसे हाथों में जाती गई जिनका यहां के वास्तविक निवासियों की विरासत और संस्कृति से जन्मना लगाव और प्यार नहीं रहा। इस पर, जैसे कि कहा जाता है, 'कोढ़ में खाज' जैसी विडम्बना ही रही कि तेरह वर्षों के लम्बे अर्से तक अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में शासन की बागडोर होते हुए भी निरंतर उपेक्षा का ही शिकार बना रहा और हर प्रकार से विकास के लिए छटपटाते इस प्रदेश को दैवकोप से 16-17 जून 2013 की कालरात्री में अकल्पनीय जलप्रलय की आपदा से दो-चार होना पड़ा। ऐसा प्रलय अपने देश में क्या, पूरी दुनिया में कई सदियों में शायद ही कहीं हुआ होगा। जब सारा देश सो रहा था तो महा-काल के यम-दूत वर्षा, बिजली, हिमपात, अंधड़, बाढ़ और भू-स्खलन जैसे प्रकोपों के नाना रूप धरकर और संहार के सभी संघातिक अमोघ अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित होकर भयंकर रौद्र रूप में सोते हुए लोगों के ऊपर टूट पड़े। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई। सारे प्रदेश के साथ पूरा देश अथाह शोक-सागर में डूब गया। पहाड़ टूट गए, नदियां, पर्वतों की चोटियों तक उफन गई, बस्तियां, मकानों में रहने वाले लोगों सहित बाढ़ में बह गए। कई पीढ़ियों से संजोई गई अधिकांश विरासत नद-नदियों के प्रवल प्रवाह में विलीन हो गई। सड़क, पुल, रास्ते सब ढह गए या बह गए। आपदा में फंसे-बचे लोगों को सुरक्षित निकालना असम्भव हो गया। देश-विदेश से इस देवभूमि में पुण्य-अर्जन करने आए हजारों धर्म-प्राण  तीर्थयात्री लापता हो गए। देव-मंदिर भी इस त्रासदी से बच नहीं सके। इस भयंकर प्रलय-लीला का अंत भी इतना लम्बा खिंच गया कि चैमासे के चारों महिने बीत गए लेकिन वर्षा का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा। लाशें बह गई हैं, मलवे में दब गई हैं, या फिर जंगली जानवरों का ग्रास बन गईं, फलतः मृतकों का अंतिम संस्कार भी नहीं हो सका। शासन-प्रशासन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर असहाय सा सहमा है। कई परिवार निर्वंश हो गए, सैकड़ों बच्चे अनाथ हो गए। अतः सब तरफ शोक ही शोक का आलम  है, रूदन ही रूदन व्याप्त है। लापता परिजनों की तलाश में अभी भी सैकड़ों लोग भटक रहे हैं, अखबार गुम लोगों की सूचनाओं से भरे पड़े हैं। मानवता के नाते देश-विदेश के अनेक लोग, स्वयंसेवी संगठन, इस आपदा में, जिसने देश के कोने-कोने से आए तीर्थयात्रियों के प्रभावित होने के कारण राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया है, सहायता के लिए आगे आ रहे हैं ।   
किंतु खेद है कि ऐसे शोक-सम्पृक्त माहौल में उत्तराखण्ड की अपनी सरकार, प्रदेश की ऐन राजधानी देहरादून में एक नामचीन संस्था 'रीच' को आर्थिक सहायता देकर उत्सव मनवा रही थी। उत्सव भी कोई ऐसा-वैसा नहीं-उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बनाने का प्रयास किया गया।  अंग्रेजी के लम्बे-चैड़े नाम-''रूरल इंटरप्रोनिअरशिप फॉर आर्ट एंड कलचर हेरीटेज'' के प्रारम्भिक अक्षरों से बने शब्द रीच (त्.म्.।.ब्.भ्.) संस्था 'विरासत' नाम से ऐसे सांस्कृतिक मेले का आयोजन निःसंदेह यहां 1994 से करती आ रही है। आपदा की संवेदना को अनुभव करते हुए अम्बेदकर स्टेडियम में इस मेले के उदघाटन के अवसर पर विरासत के निदेशक लोकेश ओहरी ने उम्मीद जताई थी कि 'यह उत्सव आपदा से उपजी पीड़ा को कम करने में मददगार साबित होगा।' लेकिन मेले के समस्त आयोजन में कहीं भी ऐसा संकेत नहीं मिल सका कि मेले के द्वारा आपदा-ग्रसित लोगों का दुख कुछ कम किया जा रहा है। यहां तक कि कार्यक्रम में स्वयं यहां के लोक-कलाकारों को भी कोई महत्व नहीं दिया गया। पिछले उत्सवों के अनुभवों के आधार पर जौनसार बावर जन-जातीय संगठन और वि0वि0 छात्र महासंघ के पदाधिकारियों ने स्थानीय कलाकारों को मंच न दिए जाने की 'शरारत' की आशंका जताई थी जो इस कार्यक्रम में सच साबित हुई। परिणाम स्वरूप सांस्कृतिक संगठनों को सड़कों पर उतरना पड़ा, आयोजकों के पुतले तक फूंकने पड़े और फलतः डी.एम. तक को हस्तक्षेप करने की नौबत आ गई।       हकीकत में 'विरासत-13', नाम से कला एवं विरासत के नाम पर यह मेला जिसे तिजारत कहना अधिक उपयुक्त होगा, कुछ ऐसे चुनींदा सम्पन्न व संभ्रांत लोगों के मनोरंजन और विनोद का जरिया बनता नजर आ रहा है जो अपने अंतर्तम में अंग्रेज शासकों की तरह विशिष्ठ व भिन्न होने की वर्ग-भेद वाली मानसिकता से ग्रसित लगते हैं। प्रदेश में  सक्रिय अधिकांश एन.जी.ओ. की छवि सेवाभावी से अधिक कमाईवाली यानी तिजारती संस्था की बनी हुई है। आपदा के वर्तमान शोक के परिवेश व हजारों लोगों की सड़ती लाशों की अनुभूति के बीच चल रहे इस मेले में यह किसकी विरासत का प्रदर्शन है? प्रश्न है कि तथाकथित आपदा से उपजी पीड़ा इस मेले से कितनी कम हुई? मेले को उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद और सार्वजनिक व्यावसायिक संस्थान-ओ.एन.जी.सी. के संयुक्त प्रयास से एवं पेट्रोनेट, एन.जी.एल, एस.बी.आई., ट्रिफेड, जेड.सी.सी., एन.सी.जेड.सी.सी., एन.जेड.सी.सी, आई.सी.सी.आर. एवं ललित-कला द्वारा प्रायोजित किया गया है। वैसे भी व्यावसायिक संस्थानों के लिए सरकारी आदेश से सी.एस.आर.ऐक्ट के अंतर्गत अपने लाभ का कुछ अंश सामाजिक कार्यों पर खर्च करने का प्रावधान बताया जाता है लेकिन यहां मेले में ऐसी कोई सूचना उजागर नहीं हुई कि इन सहयोगी कम्पनियों ने भी सद्य आपदा में कुछ सहायता की है। इस 15 दिन तक चलने वाले मेले का उद्घाटन दि0 18 अक्टूबर-13 को उत्तराखण्ड से चयनित कार्यक्रम के रूप में जागर-गायिका बसंती बिष्ट के जागर-गीत और कुमायुंनी छोलिया नृत्य के द्वारा किया जाना था लेकिन शरारत के चलते बसंती बिष्ट को बीच में ही रोककर उठा दिया गया जिसे उत्तराखण्ड की संस्कृति की जानबूझ कर की गई अवमानना के रूप में देखा गया है। विगत में भी ऐसे ही यहां के लोकप्रिय गायक नरेंद्र सिंह नेगी के साथ भी उपेक्षापूर्ण 'शरारत' का व्यवहार हुआ था जिस पर तब भी बबाल मचा था। इस बार भी सांस्कृतिक महोत्सव के नाम पर आयोजित इस 'विरासत मेले' में यहां के संस्कृति कर्मियों को मंच पर पर्याप्त मौका न दिए जाने से यहां के लोग और स्थानीय कलाकर स्वाभाविक रूप से आक्रोशित हैं और उन्होंने 24 अक्टुबर को सड़कों पर उतर कर आयोजकों के खिलाफ नारे लगाते हुए झुलुस निकाला। रीच के   अध्यक्ष विजय रंजन ने सफाई दी कि-'हम चाहकर भी अंतिम समय में स्थानीय कलाकारों को मंच नहीं दे सकते'। उनके इस तर्क से संतुष्ट न होकर उत्तराखण्ड संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं के पदाधिकारियों ने  इसे 'विरासत' के आयोजकों का अनुचित व शरारतपूर्ण रवैया बताया और आगाह किया कि ऐसे ही चलता रहा तो आगे से 'विरासत मेले' को नहीं होने दिया जाएगा। 'विरासत' के आयोजकों को इतना सामान्य ज्ञान तो अवश्य होगा ही कि उत्तराखंड की वर्तमान त्रासदी राष्ट्रीय-शोक का मौका है, न कि उत्सव मनाने का। हम जिस विरासत पर गर्व करते हैं, उसके अनुसार मृत्यु-शोक होने पर देश के सभी पंथों में हर प्रकार के आमोद-प्रमोद वर्जित होते हैं, मृतकों की आत्मा की शांति के लिए अनेक कर्मकांड व अनुष्ठान किए जाते हैं। शासन-प्रशासन के कार्यक्रमों में भी अन्य सब महत्व पूर्ण कार्य रोक दिए जाते हैं, यहां तक कि संसद की चलती बैठकें भी स्थगित कर दी जाती हैं। तो यहां की भीषण तबाही को देखते हुए क्या यह उचित नहीं था कि यह उत्सव स्थगित कर दिया जाता? यदि यह उत्सव इतना ही आवश्यक था तो उसके कार्यक्रमों के माध्यम से दिवंगत लोगों के प्रति कम से कम  औपचारिक  शोक और संवेदना ही प्रकट की जाती। उत्सव में आए लोगों को आपदा-ग्रसित लोगों के लिए सहायता करने का ही आवाह्न किया जाता। सम्भव है कि उक्त आयोजकों ने अपने स्तर पर आपदा-राहत में योगदान किया हो, क्योंकि वे सभी सुशिक्षित, समर्थ, सम्पन्न व संभ्रांत वर्ग के दयाशील लोग हैं। फिर भी यदि उनके योगदान को विज्ञापित कर  दिया जाता तो दूसरों को भी सहायता करने की प्रेरणा मिलती। आयोजकों के द्वारा समाचार-पत्रों में खुलासा किया गया है कि यह उत्सव उत्तराखंड के शासन के द्वारा पर्यटन-विभाग की सहभागिता से सम्पन्न किया जा रहा है। तब तो शासन के स्तर पर संस्कृति-विभाग को उचित था कि विरासत के आयोजकों को आर्थिक सहायता से पूर्व यह निर्देश भी दिया जाता कि वे उत्तराखंड की संस्कृति व कलाकारों को समुचित महत्व देंगे। आयोजन समिति में यहां की सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी स्वाभाविक रूप से होने ही चाहिए। अपने मुखिया जो यहीं की विरासत के दावेदार हैं, के होते हुए ऐसी चूक कष्टप्रद और असहनीय है। अपनी विरासत के साथ अन्य लोग शरारत करें, यह उचित नहीं। उसे मात्र तिजारत ना बनाया जाता, तो ही उचित होता।