कब पारदर्शी होगा राजनितिक चंदा


भारत की जनता का चरित्र बड़ा ही रहस्यमय है। नोटबंदी और नगदबंदी के जुल्मों को वह एक तरफ चुपचाप सहती रही और दूसरी तरफ वह इन दोनों मूर्खताओं को पटकनी भी मारती रही। अपने आपको सर्वज्ञ समझने वाले नेताओं को उसने ऐसा सबक सिखाया है कि उसे वे जिंदगीभर नहीं भूल सकते। भारत की जनता कितनी सहनशील है कि करोड़ों लोग बड़ी सुबह से बैंकों की लाइन में भूखे-प्यासे लगे रहे लेकिन न तो उन्होंने बैंकों पर हमला किया और न ही उन नेताओं के घरों का घेराव किया, जिनकी नादानी के कारण वे भिखारी बन गए। रोजगार के अभाव में मजदूर अपने गांवों की तरफ भाग गए, दुकानदार हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, नगदी के अभाव में मरीज दम तोड़ गए, नए नोटों की कमी के कारण शादियां और अंत्येष्टि जैसे महत्वपूर्ण मौके संकट में फंस गए और कतारों में लगे सौ से अधिक लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे। फिर भी देश में विरोध-बगावत का माहौल दिखाई नहीं दिया। विरोधी नेतागण जनता को भड़काने की पूरी कोशिश करते रहे लेकिन लोग उनकी बात एक कान से सुनते और दूसरे कान से बाहर निकाल देते। ऐसा लग रहा था कि मानो पूरा देश मोदीमय हो गया है। क्या लगभग ऐसा ही माहौल आपातकाल के पौने दो वर्ष में नहीं रहा? कहीं कोई शोर-शराबा नहीं। कहीं कोई बगावत नहीं। इंदिरा गांधी के विरु( कोई धरना-प्रदर्शन नहीं। ऐसा लगता रहा कि जैसे देश में कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन लोगों ने मार्च, 1977 में इंदिरा गांधी और कांग्रेस का सफाया कर दिया। उन्होंने सि( किया कि वे बहुत ठंडी मार लगाते हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी को तो 8 नवम्बर, 2016 की रात से ही गर्म मार लगनी शुरु हो गई थी। उसी रात लोगों ने अरबों रुपए का काला धन हीरे-जवाहारात में खपा दिया। जनधन खातों के जरिए लोगों ने सरकार को शीर्षासन करवा दिया। सरकार ने नोटबंदी के जरिए जनता के साथ चालाकी और उस्तादी की लेकिन जनता ने सरकार के घुटने तोड़ दिए। जनता ने ऐसी चालाकी दिखाई कि सारा कालाधन बिना टैक्स दिए ही सफेद हो गया। यह सर्वज्ञ सरकार प्रतिवर्ष मिलने वाले आयकर से भी वंचित हो गई। जनता ने नरेन्द्र मोदी की चालाकी को रद्द ही नहीं किया, वह उससे भी अधिक चालाक निकली।
आप सभी को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के चुनाव आयोग के समक्ष पंजीकृत 1,900 से अधिक राजनीतिक दलों में से 400 ने आज तक कभी कोई चुनाव ही नहीं लड़ा है। नोटबंदी के बाद कालेधन पर निगाह जमाए सरकार की निगाहें अब इन पंजीकृत दलों पर हैं। जवाबदेही से बचने के लिए ही तमाम राजनीतिक दल सूचना के अधिकार के दायरे में आने का विरोध कर रहे हैं। सीपीएम जैसी सर्वाहारा पार्टी भी इसके सख्त खिलाफ है। केंद्रीय सूचना आयोग ने वर्ष 2013 में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और सीपीएम समेत छह दलों को उक्त कानून के दायरे में लाने का फैसला किया था लेकिन तमाम दलों ने उसका विरोध करते हुए उक्त आदेश नहीं माना। सीपीएम नेता वृंदा करात कहती हैं कि उनकी पार्टी का कामकाज पारदर्शी है और वह हर वर्ष अपने आय-व्यय का लेखा-जोखा चुनाव आयोग के समक्ष पेश करती रही हैं। वृंदा कहती हैं, ‘राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने पर सरकार को उनकी जासूसी करने और उन्हें परेशान करने का मौका मिल जाएगा। हम कभी ऐसा नहीं होने देंगे।’ लेकिन क्या राजनीतिक दलों को नगदी की बजाय महज चेक या आॅनलाइन ट्रांसफर के जरिए चंदा नहीं लेना चाहिए? इस प्रश्न पर उनका कहना है कि माकपा गरीबों, मजदूरों व किसानों की पार्टी है। हम घर-घर जाकर पांच-दस रुपए चंदा लेते हैं और हमें चंदा देने वालों के पास बैंक खाते नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दाल में कुछ काला तो जरूर है।
कालाधन और भ्रष्टाचार का मूल कारण राजनीति दलों को मिलने वाला चन्दा है। वर्तमान नियमों के अनुसार यदि कोई राजनीतिक दल को 20 हजार रुपए तक चन्दा प्राप्त होता है तो उसे चन्दा देने वाले का नाम-पता बताने की जरूरत नहीं होती है। काफी देर से यह मांग उठती आ रही है कि देश के विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलने वाले चन्दे को सूचना के अधिकार के तहत लाया जाए ताकि एक आम देशवासी इस अधिकार का प्रयोग करके इस बात का पता लगा सके कि किस पार्टी को किसने कितना चन्दा दिया है। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख बहन मायावती और उनके भाई को जब से प्रवर्तन निदेशालय ने उनको मिले 104 करोड़ रुपए के चंदे के बारे में नोटिस जारी किया है तब से देश के विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के विषय में गरमा-गर्म चर्चा शुरू हो गई है। एक अंग्रेजी समाचारपत्र ने 16 दिसम्बर को वित्त सचिव अशोक लवासा का एक बयान प्रकाशित किया। समाचारपत्र के मुताबिक उन्होंने कहा था कि राजनीतिक पार्टियों को इनकम टैक्स कानून के तहत छूट मिली हुई है, इसलिए अगर राजनीतिक पार्टियां पुराने नोटों में पैसा जमा करती हैं, तो उनसे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी। यहां आपको ये भी बता दें कि आयकर कानून, 1961 की धारा 13। के तहत देशभर की राजनीतिक पार्टियों को आयकर से 100 प्रतिशत की छूट मिली हुई है। यानी राजनीतिक पार्टी को किसी तरह का इनकम टैक्स नहीं देना पड़ता लेकिन इन तमाम पार्टियों को हर वर्ष अपना आयकर रिटर्न दाखिल करना पड़ता है। ऐसे समाचारों के बाद देशभर में हंगामा हो गया और वित्त मंत्री अरुण जेटली को सामने आकर सफाई देनी पड़ी। अरुण जेटली ने साफ किया कि सरकार ने राजनीतिक पार्टियों को चंदे में मिलने वाली छूट के नियम-कानूनों में कोई बदलाव नहीं किया है। लेकिन साथ ही अरुण जेटली ने ये भी कहा कि नोटबंदी के बाद कोई भी राजनीतिक पार्टी 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों में चंदा नहीं ले सकती है और अगर कोई भी पार्टी ऐसा करती हुई पाई गई तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। ये बात तो ठीक है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों में चंदा नहीं ले सकती है, लेकिन प्रश्न उस पैसे का है जो इन राजनीतिक पार्टियों के पास पहले से ही जमा है। राजनीतिक पार्टियां 20 हजार रुपये तक का चंदा कैश में ले सकती हैं और इसके लिए उन्हें चंदा देने वाले का नाम भी नहीं बताना होता है। यानी अगर किसी राजनीतिक पार्टी को 20 हजार रुपये तक की रकम का चंदा मिलता है तो वो चंदा किसने दिया इसकी जानकारी ना तो इनकम टैक्स विभाग मांग सकता है और ना ही चुनाव आयोग। अब मान लीजिए कि किसी पार्टी के 100 कार्यकर्ताओं ने करीब 20-20 हजार रुपये जमा किए तो 20 लाख रुपये का कालाधन सफेद हो जाएगा। इसी तरह से 200 कार्यकर्ताओं ने 20-20 हजार जमा किए तो 40 लाख रुपये का कालाधन सफेद हो जाएगा। 500 कार्यकर्ता अगर ऐसा करते हैं तो 1 करोड़ रुपये का कालाधन सफेद हो सकता है। यानी अगर राजनीतिक पार्टियां चाहें तो कितना भी कालाधन सफेद कर सकती हैं। यहां आपको ये भी जानना चाहिए कि नोटबंदी के बाद से अगर एक आम आदमी के खाते में अगर ढ़ाई लाख रुपये से अधिक की रकम जमा होती है, तो उसे अपने पैसे का पूरा हिसाब देना होगा। लेकिन अगर कोई राजनीतिक पार्टी अपने खाते में करोड़ों रुपये जमा करके ये कहती है कि उसे ये पैसे चंदे में मिले हैं तो उस पार्टी से कोई पूछताछ नहीं होगी, क्योंकि राजनीतिक पार्टियों को 20 हजार रुपये तक के चंदे का कोई हिसाब नहीं बताना पड़ता। चुनाव आयोग लगातार राजनीतिक पार्टियों की पारदर्शिता के लिए केन्द्र सरकार को सुझाव दे रहा है। फिलहाल भारत में लोकसभा का चुनाव लड़ रहे एक प्रत्याशी को चुनाव में 70 लाख रुपये तक खर्च करने की इजाजत होती है। कुछ छोटे राज्यों में ये सीमा 56 लाख रुपये है। जबकि विधानसभा चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार चुनाव प्रचार पर 28 लाख रुपये से अधिक खर्च नहीं कर सकता। छोटे राज्यों में चुनावी खर्च की ये सीमा 20 लाख रुपये है। लेकिन अब आपको बताते हैं कि असल में होता क्या है और क्यों चुनावों में काले धन का इस्तेमाल रोकने के लिए स्टेट फंड से चुनाव कराए जाने पर विचार किया जाना चाहिए। सेंटर फाॅर मीडिया स्टडीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों ने करीब 35 हजार करोड़ रुपये खर्च किए। एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के मुताबिक 2014 में हर उम्मीदवार ने चुनाव प्रचार पर ही औसतन 25 करोड़ रुपये खर्च किए। ये एक बहुत बड़ी रकम है और इसका हिसाब कोई भी पार्टी जनता को नहीं देना चाहती। एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के मुताबिक विधानसभा चुनावों में औसतन 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जाते हैं। ऐसे में प्रश्न ये है कि राजनीतिक पार्टियों के पास ये पैसा आता कहां से है? इस प्रश्न का उत्तर ये है कि पार्टियों को ये पैसा उद्योग पतियों, अपराधियों और माफियाओं से हासिल होता है। अब आप खुद ही सोचिए कि अगर चुनाव लड़ने के लिए पैसा उद्योगपति, अपराधी और माफिया देंगे तो फिर जाहिर है कि वो अपना पैसा नेताओं से वसूल करने की कोशिश करेंगे और नेता भी जनता की बजाए इन्हीं लोगों के हितों के लिए काम करेंगे। इसलिए हमें लगता है कि स्टेट फंडिंग पर आधारित चुनाव अधिक पारदर्शी हो सकते हैं। जहां खर्च की गई पूरी रकम का हिसाब रखना संभव होगा। जनता को पैसे बांटकर या लालच देकर वोट नहीं खरीदे जा सकेंगे। इसके साथ-साथ पूरे भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने से चुनाव का खर्च बच सकता है। हर तीसरे-चैथे महीने पर चुनाव होते रहने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। क्योंकि चुनावों से पहले आदर्श आचार संहिता लगा दी जाती है। स्टेट फंडिंग के जरिए एक साथ चुनाव कराए जाने से एक फायदा ये भी होगा कि पार्टियों को बार-बार चुनावों की तैयारियां नहीं करनी पड़ेंगी बल्कि एक बार चुनाव हो जाने के बाद सरकारें अपने वादों को पूरा करने पर ध्यान लगा पाएंगी। यहां मुझे महात्मा गांधी की एक पंक्ति याद आती है उन्होंने कहा था “हमारा देश गांवों में बसता है लेकिन हमारे देश का सिस्टम सिर्फ शहरों में केंद्रित है। अपने खातों की आॅडिट रिपोर्ट भी राजनीतिक दल प्रायः चुनाव आयोग को नहीं देते। तो चुनाव कानूनों में सुधारकर चुनाव आयोग को ही राजनीतिक दलों के खातों के आॅडिट का अधिकार दिया जाना चाहिए। चुनाव आयोग के पास अपना एक आॅडिट तंत्र हो, जो सारे रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों के खातों का आॅडिट करे, ताकि आॅडिट मानकों में एकरूपता रहे और सभी राजनीतिक दल एकाउंटिंग के एक समान दिशा-निर्देशों का पालन करें। इसके बाद कुछ और बातें रह जाती हैं, जिन पर चुनाव आयोग को और नजर रखनी होगी। उनमें से एक है पेड न्यूज और दूसरी है वोटरों में नगदी, उपहार और शराब बंटवाने की समस्या, इसकी निगरानी और कड़ी करनी पड़ेगी। तो क्या राजनीति में नोटबंदी और चुनाव सुधारों की तरफ हमारा पहला कदम उठेगा? क्या सरकार और राजनीतिक दल राजनीति को कालेधन से मुक्त कराने के लिए इस जरा से बदलाव को स्वीकार करेंगे? हमारे राजनीतिक दल कालेधन की सबसे बड़ी मंडियां हैं। आम जनता को केन्द्र सरकार डिजिटल का पाठ तो बखूबी पढ़ा रही है लेकिन वह राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के लेन-देन को डिजिटल क्यों नहीं करवा देती?