भारत की बढ़ती  स्वीकृति        

 

चीन को भारत के प्रति अपनी आक्रामकता त्यागनी होगी। मित्रता का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ही एकमात्र रास्ता है,जिस पर चलकर संयुक्त राष्ट्र स्तर पर आपसी विवादों का हल तलाशा जा सकता है।....भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जिस समय गलवान घाटी व पैंगोंग झील के पास पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की हरकतों और मॉस्को में चीनी रक्षा मंत्री से बातचीत का वृतांत संसद में सुना रहे थे, उसके कुछ समय पूर्व संयुक्त राष्ट्र से देश के मनोबल बढ़ाने वाला एक नया समाचार आया कि चीन को पछाड़ते हुए भारत ने ‘यूएन कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ वुमन’ (सीडब्ल्यूएस) में अपनी जगह बना ली है। 

‘यूएन कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ वुमन’ संयुक्त राष्ट्र की एक ऐसी संस्था है,जो लैंगिक समानता और नारी सशक्तीकरण के लिए नियम-कानून बनाती है। ऐसे समय में इस जीत की अहमियत इस तथ्य की रोशनी में ज्यादा महसूस की जा सकती है,जब चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है। इसके बावजूद भी 54 सदस्यीय ‘इकोनॉमिक ऐंड सोशल कौंसिल’ में उसे मात्र 27 मत ही मिले,चीन संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य होने के बाद भी वह अपने पक्ष में साधारण बहुमत भी नहीं जुटा सका। 

 

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्य के रूप में भारत और अफगानिस्तान सदस्य चुन लिए गए,जिनका  कार्यकाल 2021 से 2025 तक का होगा।डब्ल्यूएचओ में कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष पद पर भारत की ताजपोशी, फिर सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्य के रूप में चयन और अब सीडब्ल्यूएस की सदस्यता यह  बताती है कि भारत की विश्व मंच पर साख मजबूत हुई है साथ ही बीजिंग की अनिच्छा के बावजूद दुनिया भर के देश भारत के साथ अपने रिश्तों को लेकर अधिक मुखर हुए हैं।

चीन की बौखलाहट की बौखलाहट का दूसरा कारण यह भी है कि भारत की वैश्विक स्वीकृति दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। जो देश  कल तक भारत के प्रति तटस्थ रुख अपनाते थे वे देश अब खुलकर आज भारत के साथ खडे़ होने लगे हैं। 

 

पहले भी अनेकों बार भारत को घेरने के लिए बीजिंग ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पर दबाव बनाया,मगर बीजिंग

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में

भी बुरी तरह अलग-थलग पड़ा दिखा। उसके बाद बीजिंग ने पाकिस्तान के जरिए खाड़ी के इस्लामी देशों को भड़काने की भरसक कोशिश की, लेकिन वहां भी उसका दांव विफल हो गया, उल्टे इस्लामाबाद को इसकी कीमत चुकानी पड़ी है।

 

चीन के मामले में भारत पहले से ही काफी सावधान कूटनीति का दांव-पेंच करता आ रहा था,बल्कि डब्ल्यूटीओ और पर्यावरण के मुद्दों पर पश्चिम के खिलाफ दोनों देशों ने एक-दूसरे के हितों का पोषण भी किया। बल्कि भारत की विनम्रता और उसके शांति-कामी स्वभाव का बीजिंग गलत आकलन करता रहा जिस वजह से वह लगातार एक के बाद दूसरी गलतियां करता रहा। अंतत: गलवान घाटी में भारत को उसी की भाषा में जवाब देने को विवश होना पड़ा है। पूर्वी लद्दाख में भारत अपनी आक्रामक भूमिका तब तक नहीं छोड़ सकता, जब तक कि बीजिंग अपनी कुटिलताओं का परित्याग नहीं करता। बीजिंग को दीवार पर लिखी इबारत पढ़नी चाहिए। 

 

आज भारत की विश्वसनीयता उससे कहीं अधिक है और नई दिल्ली ने यह भरोसा पिछले सात दशकों में अपनी शालीनता का परिचय दिया है। लगातार विश्व मंचों पर बीजिंग को मिल रही मात का यह साफ संकेत है,कि उसे भारत के प्रति अपनी आक्रामकता त्यागनी होगी। आज की दुनिया किसी की धौंस पट्टी व धमकियों के आगे झुकने वाली नहीं, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ही एकमात्र रास्ता है, जिस पर चलकर देश आपसी विवादों का हल तलाश सकते हैं। अब तय बीजिंग को करना है कि वह अक्लमंदी दिखाएगा या किसी नई भूल के खामियाजे को जन्म देगा?