हिंदी दिवस




(आकाशवाणी देहरादून से आज 14.09.2020 को महिला जगत कार्यक्रम में प्रसारित लेख )

आज 14 सितंबर यानी हिंदी दिवस है। हिंदी दिवस मनाने का औचित्य हिंदी के उपयोग को और अधिक बढ़ावा देने से पूर्ण होता है। 

 हिंदी साहित्य अपनी सभी विधाओं में इतना समृद्ध है कि यहां पर उन सबका एक साथ जिक्र कर पाना संभव नहीं होगा। इसलिए इसे सीमित करती हूं  "हिंदी साहित्य में ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी कुछ लोकप्रिय और कालजयी कहानियों" तक। 

          तो ..कहानियों में जब भी गांव का जिक्र आएगा प्रेमचंद को सबसे पहले याद किया जाएगा।  प्रेमचंद ही वह कथाकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी को राजा, रानी, परियों और तिलिस्मों की दुनिया से निकालकर गांव के खेत, खलिहान और पगडंडियों पर खड़ा किया।

   पूस की रात, सुजान भगत, सवा सेर गेहूं, सद्गति,घासवाली, ठाकुर का कुआं,दो बैलों की कथा और ईदगाह जैसी अनगिनत कहानियों को पढ़ने से पता चलता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का यथार्थ क्या है?

      स्त्रियों के स्वभाव और मनोविज्ञान का जैसा सटीक और जीवंत वर्णन प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में किया है,  'अलग्योझा' कहानी की इन पंक्तियों में आइए हम भी  महसूस करते हैं। 

     '"मुलिया की आंखें बहती ही जा रही थीं । पन्ना की बातों में आज सच्ची वेदना, सच्चा ढ़ाढस और सच्ची चिंता भरी हुई थी ‌। इससे पहले मूलिया का मन कभी  इतना आकर्षित न हुआ था पन्ना की तरफ़।  जिनसे व्यंग्य और प्रतिकार का भय था वे  इतने दयालु और शुभेच्छु हो गए थे। आज पहली बार अपनी स्वार्थपरता पर लाज आई मुलिया को।  पहली बार आत्मा ने अलग्योझा पर धिक्कारा"।

    अलग्योझा का मतलब तो समझते हैं ना आप लोग ? ब्याह के बाद एक ही घर में जब सगे भाई अपना-अपना चूल्हा अलग कर लेते हैं तो यही तो अलग्योझा कहलाता है। 

  गांव की हर बात, हर विचार, हर कार्य, हर परिस्थिति से प्रेमचंद की कहानियां जितनी सच्चाई से जुड़ी हुई हैं, वही अपनापन हमें नजर आता है एक और महान साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियों में।

      आंचलिकता उनकी कहानियों में कूट-कूट कर भरी हुई है । रेणु जी की आंचलिक कहानियों ने हिंदी साहित्य को जो समृद्धि दी है वह अन्यत्र मिल पाना आसान नहीं है।    रेणु की कहानियां हमें सोचने को विवश करती हैं कि इतनी विषमताओं के बावजूद भी भारत के गांव जिंदा कैसे हैं?  रेणु के कथाशिल्प में मिट्टी का संगीत लयबद्ध हुआ है। 

  वह संगीत जो जन्म से मृत्यु तक हमारी जीवनशैली में पसरा हुआ है। 'पहलवान की थाप' और 'रसपिरिया' में यह भरपूर दिखाई पड़ता है । 

सुनिए ना ! ..पहलवान की थाप में जब वो लिखते हैं कि "रात्रि अपनी भीषणताओं के साथ चलती रहती तब समस्त भीषणता को ताल ठोककर ललकारती  रहती थी सिर्फ पहलवान की ढोलक।  संध्या से प्रात:काल तक एक ही गति से बजती रहती चट-धा, गिर- धा, चट-धा, गिर-धा ! यानी आजा भिड़ जा आजा भिड़ जा।

  बीच-बीच में चटाक - चट धा ,चटाक चट धा  यानी उठाकर पटक दे, उठाकर पटक दे" । 

    गांव में प्लेग फैलने और अपने बेटों के काल के गाल में समा जाने के बावजूद भी लुट्टन पहलवान ढोल इसलिए बजाता रहा कि गांव के लोगों को अपनी हिम्मत न टूटने देने का परिचय दे सके। 

       वर्षों पहले लिखी यह कहानी वर्तमान महामारी के इस दौर में भी कितनी प्रासंगिक है।   

   बात कुछ गंभीर होती चली जा रही है। चलिए फिर से सामान्य और सहज बनाने के लिए जिक्र करती हूं उनकी ही एक बेहद लोकप्रिय कहानी 'पंचलाइट' की।  कितने हल्के-फुल्के और खूबसूरत तरीके से कहानी का नायक गोधन   पंचायत और पाठकों के दिल में जगह बना लेता है। 

       "गोधन कभी मुंह से फूंकता तो कभी  पंचलैट की चाबी घुमाता। थोड़ी देर बाद पंचलाइट से सनसनाहट की आवाज आने लगी और रोशनी होनी लगी। लोगों के दिल का मैल दूर हो गया । गोधन बड़ा काबिल लड़का है मुनरी ने हसरत भरी निगाहों से गोधन की ओर देखा। आंखें चार हुईं और आंखों आंखों में बातें हुई। 

कहा सुना माफ करना । मेरा.. क्या कसूर! 

सरदार ने गोधन को बहुत प्यार से पास बुला कर कहा तुमने जाति की इज्जत रखी है। तुम्हारा सात खून माफ।

खूब गाओ सनीमा का गाना" ।

    कहानी में ही रेणु यह भी बताते हैं कि गुलरी काकी की बेटी मुनरी को देखकर  "हम तुमसे मोहब्बत करके ओ सनम" गाना गाने के कारण ही  गोधन को पंचायत ने बाहर कर दिया गया था। 

        थोड़े से मनोरंजन के बाद चलिए अब  बात नये भारत के गांवों में खत्म होती  पुरानी परंपराओं को महसूस कर टूटते मन की व्यथाओं की कर ली जाये ! 

इन कहानियों में एक  प्रमुख कहानी का नाम है -दूबधान ।  लेखिका हैं उषाकिरण खान।

कहानी में  ब्याह के बहुत समय बाद शहर से गांव आई केतकी को देखकर पुरानी परिचित  बुजुर्ग सुबुजनी कहती हैं - " अच्छा हुआ गांव समाज को देखने आ गई तू । बिना मां की बेटी, हम सब की बेटी।

 अरे कहां गई सुलेमान की कनिया। जरा सोना-सिंदूर तो ले आ । केतकी की मांग भर। ‌ एक चुटकी दूब-धान ले आ ।  खोइंछा भर दे" ।  

एक बहू  दौड़ कर अंदर से सब सामान ले आई।   भाभी तो खोइंछा  देना भी भूल गई थीं। रेशमी आंचल की खूंट आप से आप खुल गई। दूब-धान के लिए मन उदास था।

और फिर जैनबी को गिलास मांजकर पानी और गुड़- भेली लाने का निर्देश देती सुबुजनी कमर से दो रुपए का का तुड़ा- मुड़ा नोट निकालकर नये सींक की पौती में बंद कर मेहमान की सलामी यानी केतकी के पति के लिए दक्षिणा उसके हाथ में थमा देती हैं।

       मिथिलांचल में दामाद को मेहमान कहने का चलन है।  और फिर गले लगाकर विदा करती सुबुजनी के स्नेहिल आदर सत्कार से उद्भ्रांत केतकी ने सिर टेक दिया। हौले- हौले उसकी पीठ सहलाती सुबुजनी कहती जा रही हैं - रो ले बेटी ! रो ले !  मन में कुछ ना रखना। कहा सुना छिमा करना। गांव जवार को अशीसती जाना।

 दिल कुछ भारी सा हो गया है ना ! दूबधान के लिए तरसती केतकी का मन पढ़कर। 

     "लाल रंग डोलिया सबूज रंग ओहरिया" गाती बुजुर्ग  सुबुजनी  और मिथिलांचल की बेटी केतकी विदाई की इस भावुक कहानी के बाद  मुझे बरबस  याद आने लगी है  मैत्रेयी पुष्पा जी की कहानी 'ललमनियां' की। ललमनियां एक लोक नृत्य है जो बुंदेलखंड के गांव घरों में  ब्याह-लगन के मौके पर बारातियों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत किया जाता था। थे। कहानी की नायिका मौहरों इसे जारी रखना चाहती है क्योंकि उसकी मां चंद्रकला ने इसी नाच के सहारे आजीविका चलाकर अपने दोनों बच्चों का पालन- पोषण किया था और इज्जत भी कमाई थी। लेकिन लाख चाहने पर भी मौहरों अब इस कला को जीवित रखने में असमर्थ है। 

     " जीजी अजब- गजब खेल तमाशे चल गये हैं। नित रोज दुनिया बदल रही है । शहर के लोग तो बीडुआ चलाएंगे और शहर से नचनी भी लाएंगे'

   यही सब नवीन प्रगति है कि स्त्री कलाकार मौहरों ने उपेक्षित होकर ललमनियां नृत्य छोड़ दिया है। कलात्मक सौंदर्य से भरे नाच गीत के स्वस्थ वातावरण को लील गयी हैं नई पीढ़ी की सस्ती और संवेदनहीन रुचियां।

         मिथिलांचल और बुंदेलखंड के बाद अब थोड़ी  बात उत्तराखंड की भी हो जाए।

    कठिनाइयों का दूसरा नाम ही पहाड़ है। विपन्नता तो जैसे सदैव की सहचरी है, और अगर संपन्नता कहीं है तो वो आफत की गठरी भी अपनी कांख में साथ लिए आती है। 

 इस पर  विद्यासागर नौटियाल जी की कहानी है 'सोना' ।  नौटियाल जी लिखते हैं कि- नाम सोनी था मगर प्यार से लोग सोना कहते थे उसे। बचपन से ही पिता कहा करते थे कि वहां ब्याह करूंगा सोना का जहां  दस तोले की नथ पहन सके मेरी सुंदर बेटी।  पिता की इच्छा पूरी हो गई जब शगुन में छः तोले की नथ देने वाले वाले ठेकेदार से उसका ब्याह हो गया । किस्मत की धनी सोना का पति ब्याह के बाद दिन-दूनी कमाई कर रहा है और ठेकेदारी में हो रहे हर मुनाफे के साथ सोना की नथ का वजन पहले से एक तोला अधिक बढ़ाता जा रहा है । इधर एक बेटा भी हो गया है तो अब तक नौ तोले की हो चुकी है सोना की नथ । इतनी बड़ी नथ के बोझ और गोद में बच्चे की उछल कूद और  प्यार से बार-बार सोना की दुखती नाक ! फिर भी घर में किसी को मंजूर नहीं है  कि सोना नथ उतार कर  सिर्फ बुलांक में रहे ।

   ठेकेदारी में अगले मुनाफे के साथ नथ का वजन भारी करने से पहली सुबह ही सोना की नाक झड़कर तड़ से जमीन पर गिर गई।   सास कहती है - नाक सिलवा दो।  ससुर कहते हैं- नथ में  एक तोला सोना और जड़वा दो  पूरे दस तोले की हो जाएगी । 

तो यह है पहाड़ !  जहां की सुहागिनों की नथ ने  वैभव और आकार में चांद को भी पीछे  छोड़ दिया है।

       मगर सोना जैसा किस्सा इक्का-दुक्का लोगों का ही बन पाता है।  गांव के अधिकतर लोगों की गरीबी को करीब से महसूस करना हो तो जरूर पढ़नी चाहिए महादेवी वर्मा की 'जंग बहादुर' और 'लछमा' ।

नेपाल के सुदूर  किसी ग्राम के दो भाई जंग बहादुर और धनिया की कहानी में वो लिखती हैं -

   "जंग बहादुर ने आंसू रोकने का प्रयास करते हुए कहा "मां जी जीता रहना । फिर आना । जंगिया के नाम चीठी भेजना" ।  

वाकई!  हम पहाड़ वासियों के प्राण तो परदेशियों  की चिट्ठी में ही बसते हैं,  तभी तो लछमा कहानी की पहाड़ी अनपढ़ लड़की से चिट्ठी की बात पूछने पर उन्हें अटपटी बोली में जवाब मिलता है- " हम तो अपनी जैसी लिख लेते हैं!  एक टीले पर बैठकर सोचते हैं यह लिखा, वह लिखा। यह  ठीक लिख गया, वह लिखना अच्छा नहीं हुआ। जब मन में आता है कि चिट्ठी गई तब उठकर घास काटते हैं। लकड़ी तोड़ते हैं। क्या हमारा लिखा हुआ नहीं पहुंचता है ? कागज,  कलम, स्याही,  और  पोस्ट ऑफिस की सहायता के बिना भेजी गई चिट्ठी पर किसे हंसी न आएगी।    

   लछमा की मासूमियत पर हंसी तब और आती है जब मार्ग में आने जाने वाले सभ्य  चरने वाली भैंस और चराने वाली लछमा के साथ उपेक्षा भरा व्यवहार करते हैं। तब वह रुष्ट नहीं होती है । उल्टे उनकी सफाई देने लगती है।                                       

 

       " हम तो आदमी जैसे नहीं । वे बहुत अच्छे हैं।  फिर हमसे कैसे बोलें ?  हम भी नहीं बोलते। तुम बहुत अच्छा नहीं करते । क्योंकि हमसे बोलते हो । पर तुम हमसे अच्छा बोलते हो। तभी तो हम तुमको घेरते हैं"  । इन टूटे-फूटे वाक्यों में जो गहरा अर्थ छिपा है उसका भेद आसानी से नहीं मिल पाता हर किसी को ।

उसके लिए लछमा सा जीवट और साफ हृदय वाला इंसान चाहिए।  जो खाए, न खाए जाने योग्य थोड़े बहुत  सेब  गले के नीचे उतार लेती है और फिर काम में लगी रहती है दो दिन तक निराहार ।  मातृहीन भतीजा, भतीजी के पालन पोषण, अंधे पिता और विकलांग मां की देखभाल का जिम्मा भी तो है उसके ऊपर।  ससुराल वालों ने मारपीट कर घर से निकाल दिया और तीन दिन तक जब मार्ग में कुछ खाने को नहीं मिला तो पीली मिट्टी का एक गोला बनाकर मुंह में रखा और लड्डू खाया , लड्डू खाया सोच कर खूब सारा पानी पी लिया। 

यह सब बताते हुए लछमा हसंते हुए कहती है - फिर सब ठीक हो गया। गांव के बुरे से बुरे व्यक्ति की भी चर्चा चलते ही वह सरल भाव से कह देती है-  आपने  आप रहेगा । इस 'आपने आप' का मतलब है कि - रहने दो, जो जैसा करेगा वैसा पाएगा। 

      यूं ही नहीं महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य का इतना बड़ा नाम हुई हैं।   वास्तविक अर्थों में  'लछमा' ही पहाड़ की स्त्रियों का जीवनदर्शन और मर्म है ।  बाकी जो है, तो वो .. 'आपने आप' रहता है ! 

                                        

 

 














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