पंचांग की सही पहचान


आम जनों की परिचित भाषा में जो पंचांग है उसी को परिष्कार पूर्वक अधिक सार्थकता की दृष्टि से हम तिथि पत्रक कहते हैं। सही तिथि -पत्रक कहने से लगता है जैसे कि गलत तिथि पत्रक भी होते होंगें क्या ? दुर्भाग्य की देन समझिये इस विडम्बना को कि भारत के सन्दर्भ में यह शंका, शंका ही नहीं सच्चाई भी है। संवत् 2064, जब से कि श्री मोहन कृति आर्ष तिथि-पत्रक मैंने समस्त भारत की हिन्दू जनता के सामने रखा है तब से इस दिशा में बड़ी जन जागृति उभरी है। इस जागृति को अब टालू प्रयासों से तुष्ट कर पाना किसी के लिये भी सम्भव नहीं होगा। यद्यपि विषय जटिल और तकनीकी आधार की व्याख्या का है फिर भी मैं चाहूॅंगा कि सरल से सरल भाषा में एक सही तिथि-पत्रक के आवश्यक आधार को स्पष्ट कर सकूँ।  तिथि-पत्रक (पत्र या पंचांग) के न्यूनतम आवश्यक अंग हैं-(1) अयन, (2) विषुव, (3) ऋतु, (4) मास (सौर एवं चान्द्र), (5) पक्ष, (6) तिथि (सूर्य एवं चन्द्र उदयास्त सहित), (7) दिनमान एवं रात्रिमान और (8) नक्षत्र। ये सारे तथ्य गणितीय हैं अर्थात अनुमान्य नहीं अपितु प्रत्यक्ष हैं। सौर मास से संक्रान्तियां और चान्द्र मास से पाक्षिक तिथियां जुड़ी हुयी हैं और ये भी प्रत्यक्ष हैं। उनकी भूगोल से लेकर खगोल तक में व्याप्ति की पहचान है। कालान्तर में फिर षष्ठि संवत्सर और वारों के आकलन को भी इस व्यवस्था से जोड़कर तिथि-पत्रकों की विषयवस्तु बढ़ा दी गयी। वैदिक व्यवस्था में इनका कोई सन्दर्भ नहीं है। कालगणना में एक आवश्यक सहायता के लिये इनको अपनाया गया है।       ऋग्वेद में 'उक्षा दाधार पृथ्वीमुत द्याम' कहा गया है। अर्थात सूर्य पृथ्वी को धारण किये हुये है। यह वैदिक सत्य प्रत्यक्ष में भी अनुभूत है। सूर्य के आकर्षण से निर्धारित एक नियत मार्ग में पृथ्वी सतत विचरण करती है। पृथ्वी पर से हमें सूर्य जिस मार्ग पर चलता हुआ भासता है उसे ज्योतिष की पारिभाषिक शब्दावली में क्रान्तिवृत्त कहते हैं। इस क्रान्तिवृत्त मार्ग के इधर-उधर 9 अंश से बने विस्तार को भचक्र कहते हैं। पृथ्वी अपनी नियत गतियों के अनुसार अयन-विषुव, ऋतु एवं दिन-रात का निर्माण करती है। अयन और विषुव तिथियों का संक्रान्तियों के निर्धारण में अति महत्वपूर्ण योगदान है और तिथि-पत्रक को सही-स्वस्थ्य रखने में इन तिथियों का ही सारा कमाल है।   जिस प्रकार पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य क्रान्तिवृत्त में रहता है उसी प्रकार पृथ्वी के सापेक्ष चन्द्रमा अपने विमण्डल में भ्रमण करता है। हम चूंकि पृथ्वी में रहते हैं इस कारण हम अपनी स्थिति को सूर्य-चन्द्रमा को देखते हुये व्यक्त करते हैं। हमें पृथ्वी का नहीं सूर्य और चन्द्रमा का चलना और चलते रहना दिखता है। चन्द्रमा अधिक गतियुक्त है और वह जब भी सूर्य की तुलना से 12 अंशों का अन्तर बना लेता है तो एक तिथि का निर्माण पूरा करता है। इस प्रकार किसी भी तिथि -पत्रक की विषयवस्तु मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी ही हैं। एक चैथा भी घटक है, और वह है नक्षत्र, जो कि हैं तो बेहिसाब परन्तु पत्रक की दृष्टि से वैदिक मार्गदर्शनानुसार ग्राह्य केवल 28 ही हैं (देखें अथर्ववेद काण्ड 7, सूक्त 19 मंन्त्र 2-5)। लगता है कि फलित ज्योतिष के लिये जो काल्पनिक भचक्र लिया गया है उसको भाग (विभाजन) की सुविधा से 27 भागों में बाँटकर एक भाग को 13 अंश 20 कला के बराबर लिया गया है और इस एक बात को स्वयं श्री नि0चं0 लाहिरी ने भी माना है। यह एक गम्भीर विसंगतिपूर्ण दोष है। इस दोष के लिये किसी को जिम्मेदार तो नहीं ठहराया जा सकता परन्तु यदि पंचांगों का 'दृग्गणित मतेन' लिया जाना शास्त्र सम्मत है तो किसी भी तिथि-पत्रक के गणितकर्ता को इस असत्य स्वीकृति से बचकर ही सत्य कथन करना आवश्यक होगा।    सत्य यह है कि चित्रा नक्षत्र मात्र एक अंश का भी नहीं है और उसकी सीध में बने रहने हेतु चन्द्रमा अधिक से अधिक 50 मिनट तक रह सकता है। पुष्य नक्षत्र 3 अंश 37 कला के लगभग का तो अश्लेषा साढे़ सत्रह और यहां तक कि रेवती 20 अंशों के लगभग का है। एक खास बात यह है कि मेषादि राशियां भी काल्पनिक व्यवस्था की उपज हैं। अस्तु, वैदिक व्यवस्था में नहीं हैं। ये नक्षत्रों से स्थायी तौर पर सम्बन्धित भी नहीं हैं। उदाहरण के लिये आजकल अश्वनी नक्षत्र वृषभ राशि के पंाचवे अंश से शुरू होता है और मेष राशि पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के समीप से शुरू हो रही है। मिथुन राशि में कृतिका और आद्र्रा के भाग सहित रोहिणी और मृगशिरा सहित चार नक्षत्रों को योग बनता है। अब यदि तिथि-पत्रक सही हैं तो उसे ये तथ्य ऐसे ही स्पष्ट करने होंगें। नहीं कर पाता तो उसे आप सही तिथि-पत्रक नहीं जान सकते। मान भले ही लें क्योंकि मानने का तो कोई पैमाना नहीं है, कुछ का कुछ भी मान सकते हैं परन्तु तब तिथि-पत्रक एक वैज्ञानिक विधि का अभिलेख ( क्वबनउमदज ) नहीं रह जायेगा। एक बात और भी ध्यान देने की है कि किसी भी राशि की आकृति का, उसके अन्तर्गत दर्शायी गई एकीकृत नक्षत्र आकृति से केाई तालमेल नहीं है। उदाहरण के लिये मेष राशि के अन्तर्गत तथाकथित अश्वनी, भरणी और कृतिका के प्रथम चरण को ही लीजिये। अश्वनी को अश्वमुख, भरणी को योनिमुख तथा कृतिका को छुरे के समान माना गया है। इन सब से मिलकर मेष राशि की मेढ़ा आकृति कैसे हो जायेगी? मेरी सम्मति में यह ग्रीक और भारतीय संस्कृतियों के सम्मिश्रण का एक परिणाम है। नक्षत्रों को राशियों के साथ जोडकर देखना और सारे ही भचक्र को मनमर्जी के ढ़ंग से ले लेना, यह सब फलित ज्योतिष के चक्कर में हुआ लगता है। स्पष्ट सिद्ध हुआ कि राशियां बहुत बाद में नक्षत्रों पर थोपी गई हैं और इस एक बात को कै0रि0क0 के विद्वानों ने भी माना है। 
संक्रान्तियां पूरे 12 मासों की, मधु-माधव (वसन्त), शुक्र-शुचि (ग्रीष्म), नभस्-नभस्य (वर्षा), ईश-ऊर्ज (शरद), सहस्-सहस्य (हेमन्त) एवं तपस्-तपस्य (शिशिर), वैदिक व्यवस्था है। किसी भी आर्ष (वेदों के प्रति आस्था युक्त ) तिथि पत्रक हेतु ऋतु सम्बद्ध व्यवस्था अपनाना अनिवार्य है। पूरी छः ऋतुओं को उत्तर तथा दक्षिणायण और वसन्त तथा शरद सम्पात के विषुव बिन्दुओं से नियन्त्रित किया गया है। ये सभी बिन्दु सही पंचांग की कसौटी हैं। विष्णु पुराण में एक श्लोक आता है -
अयनस्योत्तरस्यादौ मकरं याति भास्करः।
ततः कुम्भं च मीनं च राशे राश्यान्तरं द्विजः।।
अर्थात् उत्तरायण के शुरूवात के साथ भाष्कर का मकर में प्रवेश जाना जाये, और यह जानकारी गणितीय तौर पर भी सिद्ध की जा सकती है। इसी प्रकार शिवमहापुराण का कथन 'तस्माद्दशगुणंज्ञेयं रवि संक्रमणेबुधाः। विशुवे तद्दशगुणमयनेतद्दशस्मृतम्।।'' में यही बात अधिक स्पष्ट करते हुये भगवान शिव ने विषुुव और अयन तिथियों को संक्रान्तियों के साथ जोड़कर कहते हुये उपदेश किया है। यही नहीं और भी बहुत से आर्ष वचन उपलब्ध हैं, जैसे कि वाराहमिहिर के प्रमाण से -
 उद्गयनं मकरादौ ऋतवः शिशिरादयश्च सूर्यवशात्।
 द्विभवनं काल समान दक्षिण मयनं च कर्कटकात् ।25।
सार यह है कि उत्तरायण घटित होते ही सूर्य की मकर संक्रान्ति भी होगी। वास्तव में उत्तरायण सूर्य की परमक्रान्ति (दक्षिण) का फलित है और इस परमक्रान्ति का फलित है सूर्य का 270 अंश पर पहुँचना। इसी परमक्रान्ति के कारण पृथ्वी पर दो पहचान बनती हैं -
1)उस दिन उत्तरी गोलार्द्ध में दिनमान न्यूनतम और रात्रिमान      अधिकतम होता है।
2)उस दिन सूर्य मकर वृत्त पर होगा अर्थात् प्रतिछाया के रूप में    निर्धारित मकर रेखा के उपर खड़े होने पर आपकी छाया का लोप होगा। 
ये सब बातें हम पाठकों को गणितीय तौर पर भी समझा सकते हैं लेकिन उससे यह लेख जटिल हो जाने का डर है। फिर भी जिज्ञासु जन इसके लिये वर्तमान संवत् 2069 का श्री मोहन कृति आर्ष तिथि-पत्रक देख सकते हैं। आसमान में परमक्रान्ति, धरती पर प्रत्यक्ष अधिकतम असमान दिनरात और साथ ही साथ मकर या कर्क संक्रान्ति के दिन मकर या कर्क रेखा पर छाया लोप, ये तीन बातें मकर या कर्क संक्रान्ति और उत्तरायण या दक्षिणायन की साक्षात पहचान हैं। जो लोग तनिक भी खगोलिकी की दृष्टि से सुशिक्षित हैं वे इस तथ्य को नहीं नकार सकते हैं। ग्रेगोरी कैलेण्डर के अनुसार ये तिथियां 21/22 दिसम्बर या 21/22 जून बनती हैं और इसी दिन शुरू होते हैं शिशिर ऋतु एवं तपस् मास तथा वर्षा ऋतु एवं नभस् मास। चन्द्रमास निर्धारण इन संक्रान्तियों की अनुवर्ती (पिछलगू) व्यवस्था है। अर्थ ये है कि तपस् मास की उक्त संक्रान्ति घटित हो जाने पर जो शुक्ल पक्ष आयेगा, वह ही होगा माघ शुक्ल पक्ष। इसी प्रकार नभस् संक्रान्ति से श्रावण शुक्ल पक्ष को समझियेगा। स्यात्दादि युगं माघ स्तपः शुक्लो दिनंत्यचः।।६।। (यजुर्वेदंग ज्यो0)
यहां पर यह भी जान लेना चाहिये कि जनवरी मंे कभी सूर्य का परमक्रान्ति पर पहुँचना सम्भव नहीं है अस्तु वहाँ ( जनवरी में किसी भी दिन 1 से 31 तारीख तक) मकर संक्रान्ति भी असम्भव है। अगर कोई पंचांग या तिथि-पत्रक 21/22 दिसम्बर से हटकर कभी भी मकर संक्रान्ति दिखावे तो उपरोक्त मानकों पर वह असफल कहा जायेगा और उसे हम एक सही तिथि-पत्रक कभी नहीं कह सकते। आप उस पंचाग में दिनमान और रात्रिमान देखें। अगर लघुतम दिनमान से हटकर मकर संक्रान्ति दिखायी गई है तो उस पंचांग के गलत होने में कोई शक नहीं। उसी प्रकार उत्तर से दक्षिण क्रान्ति को आते हुये या दक्षिण से उत्तर क्रान्ति में जाते हुये सूर्य पृथ्वी के सापेक्ष दो बार शून्य क्रान्ति पर आता है। सूर्य उस दिन विषुवत रेखा पर होगा। इसी से उस दिन को विषुव, विषुवत या पहाड़ी बोली में बिखोत भी कहा जाता है। इस दिन सारे भूमण्डल में दिनरात का बराबर होना आवश्यक है और यही नहीं धरती में भूमध्य रेखा पर खड़े व्यक्ति का छायालोप भी होगा। यह इतनी प्रामाणिक तिथि है कि ठीक मध्यान्ह में आप अपने स्थान पर किसी भी छड़ी की छाया से अपने स्थान का शुद्धतम भूपृष्ठीय अक्षांश भी जान सकते हैं। ये दिन वसन्त या शरद ऋतु के मध्य बिन्दु होते हैं। अंग्रेजी कैलेण्डर की वर्तमान व्यवस्था के अनुसार ये दिन  20/21 मार्च अथवा 22/23 सितम्बर होते हंै। वसन्त ऋतु के सन्दर्भ का उक्त प्रथम दिन (20/21 मार्च) ही वैशाखी कहलाता है। अस्तु किसी भी तथाकथित पंचांग में दिनमान और रात्रिमान का बराबर होना देखें। यदि वह 20/21 मार्च को  ही है और वैशाखी या वैशाख संक्रान्ति वही पंचांग अप्रैल में बता रहा है तो निश्चित जानिये कि वह तथाकथित पंचांग सर्वथा गलत है। यहां पर आप वैसे भी यह जान सकते हैं कि अयन और विषुवों की चार संक्रान्तियां ईस्वी कैलेण्डर में कहाँ हो रही हैं। नोट करें कि एक भी संक्रान्ति अगर किसी भी माह की 21/22 तारीख में होगी तो कोई भी अन्य संक्रान्ति किसी भी अन्य माह की 14/15 तारीख को नहीं हो सकती या फिर तब ही हो सकती है जबकि अगला महीना कम से कम 23-24 दिन का या कि 53-54 दिनों का हो जो कि व्यवस्थान्तर्गत नहीं है। आजकल हम आचार्य मुंजाल की तरह ध्रुवांको की मदद से गणित करते हुये ग्रहों की स्थिति प्राप्त नहीं कर रहे हैं जैसे कि लघुमानस के ये ग्रन्थकार अपने समय में करने को मजबूर थे। उन्होंने पाया कि गणितागत स्थितियां वास्तविक अयन एवं विषुव बिन्दुओं में सूर्य की स्थिति से मेल नहीं खा रही थी अपितु एक निश्चित अन्तर वर्ष भर बना रहता था। समसामयिक तकनीकी अभाव के कारण सही गणित में न पहुँच पाने से आचार्य मुंजाल को एक नियम बनाना पड़ा जिसमें कि इस उपरोक्त अन्तर को नियमानुसार घटा करके ही दृक स्थिति के तुल्य परिणाम हासिल करना होता था। यदि हम भी आज गणितागत स्थितियों को ले रहे होते तो हमको भी वही कुछ करना पड़ता जो कि उन्होंने किया। किन्तु हम आज गणितागत नहीं अपितु आधुनिक सूक्ष्म वेधशालाओं से प्राप्त दृक स्थितियां ही लेते हैं, जिनमें किसी प्रकार के ध्रुवांक संशोधन (बीज संस्कार) की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस प्रकार यदि कोई पंचांगकर्ता वेधशालाओं से दृक स्थितियों को लेकर पुनः उसमें किसी भी तरह का संशोधन करता है तो वह तथाकथित संशोधन सुधार के निमित्त न होकर वास्तव में विकृति का हेतु बनता है। ऐसी विकृत स्थितियों पर आधारित पंचांगों को आधुनिक भाषा में निरयन पंचांग कहकर पुकारा जाता है जो कि कभी भी सही नही कहे जा सकते। अस्तु सही पंचांग के लिये दृक स्थिति का अर्थात सायन होना आवश्यक है। इस प्रकार जो तिथि-पत्रक या पत्र आपको संक्रान्तियों की सही जानकारी देवे, चान्द्र मासों और नक्षत्रों की यथार्थ पहचान के साथ जानकारी देवे वह ही सही तिथि-पत्रक होगा और वह ही आपको सही व्रत-पर्व और त्यौहारों की जानकारी दे सकता है। यही नहीं, सही ऋतुबोध एवं मलमासादि की सही जानकारी भी ऐसे ही किसी सही तिथि-पत्रक से मिल सकती है। सभी हिन्दूओं में एक सही पंचांग अथवा तिथि-पत्रक की ललक होनी चाहिये। गलत पंचांगों को समाज से बाहर करने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति और सत्यनिष्ठा के साथ संकल्प बद्ध होकर चलने की अतीव आवश्यकता है। वर्तमान के सभी फलितियों से प्राप्त मार्ग दर्शन इन्हीं गलत पंचांगों पर       आधारित होने से सही नहीे कहा जा सकता है।