शिवशम्भो का चिट्ठा है हलन्त


मैंने शाक्त ध्यानी को पढ़ा है, उसका बाल्यकाल सगरपुत्र तारिणी भागीरथी और अलकनन्दा के संगम की ओर टकटकी लगाकर बीता है। बड़ा अजब/गजब है इस नाम में और उसके क्रिया-कलापों में जिन्हें 'हलन्त' के माध्यम से उनकी पत्राकारिता हवा देने से नहीं चूकती, कैसे करंेगे आप इस नाम की व्याख्या, यह तो आप ही जानें, पर मेरी सोच के मुताबिक, इस ध्यानी नामक शाक्त में वह सब कुछ है, जो धूर्जटी में है- गंगा की अमृतमयी धारा से लेकर वासुकी के गरल तक और चन्द्रमा की शीतलता से लेकर तीसरे नेत्रा की आग्नेयता तक। जिस व्यक्ति के नाम मात्रा में ही भूतभावन पशु-पतिनाथ समाये हुए हों, उसका शास्त्राीय विधान कैसा होगा, पत्रिका की भूमिका कैसी होगी, खोज का विषय है। खोज की आधारशिला मैं रख रहा हूँ, हो सके तो इस आधारशिला पर इमारत आप बनाइये।
पत्रिका का नाम 'हलन्त' ही क्यों? इस पर भी गंगाधर का साया है। ज्ञान, विज्ञान और भक्ति के इस ट्राईएंगल मंे अनेक सुंदर एवं तथ्यपरक नाम मौजूद हैं, जिनमंे से किसी एक को पत्रिका के लिए अपनाया जा सकता था पर ऐसा इसलिए नहीं हो पाया कि उस खरपुफका जोगी के साथ तालमेल नहीं बैठ रहा था- 'हलन्त' में वह तालमेल बैठ रहा है। जैसा कि सर्वविदित है, भोलेनाथ के डमरू से प्रस्पुफटित 14 माहेश्वर सूत्रा समस्त वाघõमय के वैयाकरणीय आधार माने गये हैं जो अ, ई, उण से शुरू होकर हल् पर समाप्त होते हैं। अ से लेकर अः तक के स्वर तथा क से ज्ञ तक के अक्षर व्यंजन कहे जाते हैं, पर ये व्यंजन तभी पूर्णता प्राप्त करते हैं जब इनमें स्वरों का योग होता है और क्योंकि यह योग स्वतंत्रा के रूप में होता है-इसीलिए हलन्त, वजूद में आया और पत्रिका का 'मोटो' बना- 'अक्षर ब्रह्म है, ब्रह्मास्त्रा भी।' देखा गया है कि पत्राकारिता सामाजिक तथा राजनैतिक जीवन के सच-झूठ, दृश्य-अदृश्य, अच्छी-बुरी छवियों, घटनाओं व प्रशासनिक गतिविधियों को उजागर करने वाला आईना है अतः पत्राकार को खास तरह की भाषा-शैली अपनानी होती है जो आग तथा मरहम का काम करती है। 'हलन्त' में आप पायेंगे कि सम्पादक कड़ी से कड़ी से बात कहने से न तो गुरेज करते हैं और ना ही झिझक। उनकी टिप्पणियों में चाहे शासन/प्रशासन के अनौचित्य हों या सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाओं के अनौचित्य, उनकी तल्ख शब्दों में भत्र्सना होती है। बड़े निर्भीक ढंग से जो अन्याय और अनौचित्य का पर्दापफाश करते हैं। संचार माध्यमों के घर-घर स्थापित हो जाने के कारण यह युग सूचनाओं व लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ-साथ धार्मिक, साहित्यिक और कलात्मक मूल्यों के विश्लेषण का सशक्त माध्यम बन गया है जिसे हलन्त पत्रिका में पढ़ने, समझने और विश्लेषण करने के अनेक मौके हाथ लगे हंै, अब वो चाहे 'राजा का बाजा' रूपी आलेख हो या 'कुम्भ पर्व व गंगा-अवतरण' से सम्बन्धित आलेखऋ 'शैतानों का शहर' रूपी सम्पादकीय हो चाहे 'दक्षिणावर्त' रूपी आलेखऋ 'कौआ करे हंस की बात' रूपी आलेख हो चाहे 'संस्कृति के भड़ुवे' नामक आलेखऋ शाक्त ध्यानी ने समय, समाज, राजनीति व उत्तराखण्ड राज्य की शासन नीति के संदर्भ में सजग रहकर, नागरिकों में दायित्व बोध को जगाने का सपफल प्रयास किया है। इनकी सम्पादकीय नीति और आलेख नितान्त अपने होते हैं। अधिकतर सम्पादकीय, जनतांत्रिक मूल्यों को उभारते हैं। जनसंघर्ष को प्राथमिकता देते हुए शाक्त ध्यानी को समाज में जागृति पैफलाते हुए देखा जा सकता है। 'हलन्त' एक निर्भीक पत्रिका है। भ्रष्टाचार मंे लिप्त, भाषा, साहित्य और कला की परख न रखने वाला व्यक्ति चाहे वह शासन/प्रशासन से जुड़ा हुआ हो अथवा जनसेवक ;विधायक आदिद्ध, इनकी कथनी और करनी के विरु( लिखने में इस पत्रा ने कभी कोताही नहीं बरती। उपरोक्त संदर्भों से जुड़े कुछेक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हँू- 'राजा का बाजा' आलेख में लेखक ने उत्तराखण्ड की कांग्रेस सरकार की उन घृणित करतूतों को उभारा है, जो न केवल समाज विरोधी रहीं हैं बल्कि जाति विरोधी और ललित कला विरोधी भी रही हैं। लेखक का कुछ इस तरह कहना है- 'इस राज्य में बड़े सुनियोजित ढंग से समझाया जा रहा है कि पहाड़ियों तुम लोग एक नाचने/गाने वाली प्रजाति होऋ तुम किन्नर प्रदेश के यक्ष-गंधर्वों के संवाहक हो, अतः तुम्हारा एक ही काम है नारायण और नारायण की राजनैतिक अर्घाघõ इंद्राणी रूपी सुपरहिट जोड़ी के सम्मुख ठुमका लगाकर नाचना। और हाँ, विशेष ध्यान रहे- नाच-गाने का यह सिलसिला केवल सपेफद टोपी व लाल कलगी लगाये हुए- नरो{वा व कंुजरो{वाओं के सम्मुख ही होना चाहिए, साथ ही यह देवबंदी पफतवा भी जारी किया कि यदि किसी कल्दार हजम करने वाली पार्टी ने, किसी ऐसे गवैये अथवा ठुमका लगाने वालों को जिनका हुक्का-पाणी बंद कर दिया गया हो, अपने कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए दावत दी तो उसे उसकी औकात बता दी जायेगी।' यही वह धमकी थी, जिसका दण्डवत पालन करते हुए रीच संस्था ने श्री नरेन्द्र सिंह नेगी को अपने कार्यक्रम से न केवल दूर रखा, बल्कि उनको अपमानित भी किया।
'दक्षिणावर्त' में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकलापों की बखिया उधेड़ते हुए शाक्त ध्यानी का कथन कुछ इस प्रकार है- 'वह संघी चरित्रा ही क्या हुआ जो व्यसनी से विचलित हो जाये ;यह वाक्य उन्होंने अपने पुराने दिनों की याद करते हुए कहा जब वो 'वायु-जल' सेवनी थे और एक दिन उन्होंने श्रीनगर, गढ़वाल के गोला बाजार में एक गंगाजल सेवनहार संघी को हड़काया थाद्ध? आज के संदर्भ मंे वे आगे लिखते हैं- संघ के सांचे में स्त्रिायों की अनुपस्थिति एक रूक्षता पैदा करती है। संघ के चिंतकों को नारी की भूमिका की पुनः समीक्षा करनी होगी। संघ के पास अनेक राजनैतिक, सामाजिक समाधान हैं। इस संघ की वृक्ष की जड़ें, भारतीय चिंतन की मिट्टी के रसायन से परिचित हैं। संघ जो अब तक जन-जन का आन्दोलन नहीं बन सका तो उसका कारण उसकी कार्यशैली है, जब कि रंगमंच और नुक्कड़ नाटकों के जरिये माक्र्सपुत्रों ने समाज में पैंठ बनाई है उसका उत्तर भारतीय दर्शन की गरिमा को दिखाने वाले रंगमंच से देना चाहिए....हमें पौराणिक, दार्शनिक कथाओं की नये वैज्ञानिक ढंग से समीक्षा कर, उपनिषदों के सौन्दर्य से कमाल पैदा करना होगा। भारतीय चिंतन एक वृह्द रेखा है, जिसके आगे वामपंथ को छोटा होना ही होगा....यही उसकी स्थिति है।.....हम कार्ल माक्र्स की किताब पढ़ने को स्वतंत्रा नहीं हुए थे।......वैचारिक स्वतंत्राता का यह अर्थ नहीं कि यदि संकीर्ण धार्मिक, वैचारिक आग्रहों को नहीं सुना जायेगा तो हमारे राष्ट्र को वे जिलेटिन की छड़ों से धमकायें, वामपंथ के नाम पर सामूहिक हत्यायें आयोजित करें, खतरनाक संगठनों से हाथ मिलाकर, धरती के नीचे सुरंग बनाकर नरक बसा लंे।'
'कौआ करे हंस की बात'- शाक्त ध्यानी का एक ऐसा सम्पादकीय है, जिसे पढ़ने के बाद, यदि आप लेखक हैं तो कपाल पकड़कर बैठने पर मजबूर हो जायेंगे और यदि आप गाँधीगिरी वाले राजनीतिज्ञ अथवा दास कैपिटल के पाठक हैं तो, दोनों ही दशाओं में आपको अपने लिए उचित ठिकाना ढूढ़ना होगा। गाँधी वाघõमय के कुछ खण्डों के सम्पादन कार्य ने धस्माणा जी के अंतस में इस बात को बहुत गहरे बैठा दिया कि- गाँधी का साध्य तो सत्य था....पर उनके साधन में त्राुटियाँ थीं। हलन्त के सम्पादक महोदय का कथन है- वामपंथियों ने साध्य को पाने के लिए जिस कत्लोगारत का मार्ग चुना, वह पशुदर्शन कार्लमाक्र्स द्वारा ही प्रतिपादित है....वामपंथियों के लिए सत्ता ही साध्य है चाहे वह जिस मार्ग का अनुसरण कर प्राप्त की जाए।.....उमेश डोभाल की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में धस्माणा जी, सत्य की राजनीतिक अर्थों में ही व्याख्या कर रहे थे।.........धस्माणा जी ने 'सदाग्रह' शब्द को रेखांकित किया......और वे एक सच्चे माक्र्सवादी की तरह 'साध्य' के लिए किसी भी 'साधन' को अपनाने में हिचके नहीं।........क्षेत्राीयता और स्थानीयता को परिभाषित करते हुए धस्माणा जी ने पादपों, कीट-पतंगों और पक्षियों का उदाहरण देते हुए उन्हें एक क्षेत्रा विशेष की पहचान बताया, उन्होंने क्षेत्राीय समाज की अन्तर्रचना, उनके संस्कार, रीति-रिवाज, देवालयों-शिवालयों का जिक्र जानबूझकर नहीं किया, क्योंकि यहीं पर कार्ल माक्र्स के चिंतन का अधूरापन सामने आता है।
धस्माणा जी, काव्य प्रकाश के मम्मटाचार्य द्वारा वर्णित रसानुभूति का जिक्र मात्रा बौ(िक आक्रामकता दिखाने के लिए करते रहे। बिना प्रसंग गढ़वाली भाषा पर कुछ विद्वानों द्वारा किये जाने वाले सराहनीय प्रयास को कूड़े में डालकर वे लोकभाषा के लिए न तो व्याकरण, न साहित्य, न लिपि, किसी को भी आवश्यक नहीं मानते। शाक्त ध्यानी का कहना है- धस्माणा जी, भूमण्डलीकरण को कोसते हुए क्षेत्राीयता पर लादी जाने वाली आर्थिकता से चिंतित हैं। बड़े शहरों की गोष्ठियों में क्षेत्राीय जनता की संरचना को समझे बिना, जिन दैत्याकार विचारों को रोपा जाता है वह निश्चय ही हास्यास्पद है, उतना ही हास्यास्पद जितना बुर्जुआ, पोलित ब्यूरो, प्रगतिशील जनवादी जैसे शब्द ग्रामीण जनता को रटाये जाते हैं।........वामपंथ का आन्दोलन अमरीकी दादागिरी से भी अधिक खतरनाक है.....वरना जो लोग हमारी मूर्तियों का मजाक उड़ाते हैं, वे लेनिन के शव पर मसाला लगाने वालों पर क्यों नहीं हंसते। यदि जीवन दर्शन को मूर्तियों में नहीं उकेरा जा सकता तो माक्र्स का दर्शन शव के समोसे में कैसे गरम रखा जा सकता है।
अपने, इस अति विस्तृत संपादकीय को विराम देते हुए लिखते हैं- 'वामपंथी जिन शक्तियों के राजनैतिक प्रपंच के कारण 'कामायनी' पर तंज कसते हैं, उसके भारतीय समाज में दूरगामी परिणाम होंगे। वेद हमारे ज्ञान का बीज है....उपनिषद् उसका अंकुरण है, पुराण उसका वृक्ष है। यदि जयशंकर प्रसाद शैव दर्शन को कविता बनाकर गाते रहे थे, तो वे भारतीय ज्ञान पर जयमाला ही पहना रहे थे.... उमेश डोभाल स्मृति समारोह में 'जूते-चप्पल' वाली कविताओं को पूफल-पत्तियाँ पहनाकर आपने दीवारों पर क्यों टांगा था? क्या ऐसी अम्लीय कवितायें पढ़कर लोग माक्र्सवाद को वैज्ञानिक दर्शन मानने लगेंगे?'
'संस्कृति के भड़ुवे'- नामक आलेख में शाक्त ध्यानी ने जिस उग्र, निर्भीक और जुझारू पत्राकार को मूर्त रूप प्रदान किया है, उसके सामने वे सब सम्पादक बौने नजर आते हैं जिनकी दृष्टि सत्ता के गलियारों में बांटी जाने वाली रेवड़ियों पर रहती है। 'ध्यानी' का कहना है- 'संस्कृति के पूरे दर्शन को लेकर नवोदित राज्य उत्तराखण्ड में मीमांसायें चल रही हैं। कई पहुँचे हुए सुसंस्कृत लोग अपने पूरे समय के ही नैतिक क्षरण पर छातियाँ कूट रहे हैं। कहा गया है कि परिष्कृत, शोधित और संस्कारित जो भी है वह सुसंस्कृत है। सम्भवतः यही सोचकर राज्यों के विधान में एक मोटी रकम इन सपेफद हंस माने जाने वाले भद्र पुरुषों के हवाले करने की सोची गई होगी कि वे साहित्य, कला, शिल्प विधाओं को सहेजने का काम करें और आने वाले भविष्य को एक निथरा हुआ शु( विचार सौंपें, पर हा भाग्य! ये पईसा बड़ी कुत्ती चीज है.......सारे हंसों ने अपने पुट्ठे चढ़ा कर खीसे बना दिये। सरकारी मलाई पर हाथ सापफ करने में नीर-क्षीर सब चोंचे गजभर की हो गईं। सब बगुले भये। नरेन्द्र नेगी की कैसेट असल में संस्कृति के इसी भांडे में छेद कर बैठी।.......इसीलिए देश-विदेश से ऐसे कथानक और विचार मंच पर सजाये जाते हैं जिससे संस्कृति लगातार कैबरे करती रहे, नोट बरसते रहें, वामपंथियों के खीसे भरते रहें। बहुत भयावह, दिल दहलाने वाली और अपनों की अपनों पर ही कपटपूर्ण हथकण्डों की है आगे की कहानी, जिसे शाक्त ध्यानी ने उपरोक्त आलेख में सिलसिलेवार व्यक्त किया है। पढ़कर देखिये हलन्त के दिसम्बर, 2006 के अंक में।
शिवशम्भों के चिट्ठे को विराम देने से पूर्व मैं कहना चाहूंगा- उत्तराखण्ड की राजनीतिक स्थिति एक मजाक बन कर रह गई हैऋ दलबंदियाँ सिर उठा रही हैंऋ आत्मविश्वास कलेजा थामकर बैठ गया हैऋ सच को नंगा किया जा रहा हैऋ चरित्रा की धोती खोली जा रही हैऋ ईमान के वस्त्रा उतारे जा रहे हैंऋ संस्कार तार-तार हो रहे हैंऋ संस्कृति की अर्थी ढोई जा रही है। ु