तुम जाओ ओम (कहानी )


अपना सूटकेस पैक करते हुये ओम ने अपनी बिटिया को आवाज लगाई,...नुपुर मेरा सेविंग किट लाना...नुपुर नौवीं कक्षा में पढ़ती है। सेविंग किट लेकर नुपुर आई तो छठवीं कक्षा मंे पढ़ने वाला उसका भाई तन्मय भी आ धमका और पिता के साथ गांव जाने की जिद करने लगा... ओम ने 'न' कह कर उसे चुप कराने का प्रयास किया और नुपुर से कहा तुम्हारे कमरे में ही दादी का बेड लगेगा..अपनी किताबें सब 'बुकसेल्फ' में लगा दो। पापा आप कितनी बार ये बात कह चुके हैं...मैं कर दूंगी...बेटा दादी को...नुपुर बीच में बोल उठी...दादी एक-दो महिने रहेंगी,मुझे कोई प्रोब्लम नहीं है। तन्मय बीच में बोल उठा..दादी हमेशा अब हमारे साथ रहेंगी। हम दादी को लेने कल गांव जा रहे हैं।...नहीं तन्मय तुम नहीं जा रहे हो, ओम ने कहा।
अरे बाबा पैकिंग हो गई, दो दिन के लिये जा रहे हो...सुबह आपको जल्दी निकलना है, अब सो जाओ...। ओम को अपनी पत्नि शैलजा का स्वर कर्कश सा लगा। तुमसे किसने कहा कि मां एक दो महीने यहाँ रहेंगी...बच्चों को समझाने, एडजस्ट करने के लिये बोल दिया है। ओम बिफर सा गया, क्या एडजस्ट करना है? अपनी मां को साथ रखने के लिये इतना सोचना पड़ेगा....! बच्चे जाने कब अपने बिस्तर में सो गये..शैलजा ने एक अलग बैग में स्वेटर, गर्म शाल और सादी साड़ियों के साथ मिठाई का एक बड़ा पैकेट रखते हुये कहा..वहां अभी ठण्डा ही रहता है, जैकेट जरूर रख देती हूँ। ओम सोने के प्रयास में सोचने लगा,  दिल्ली में रहते हुये 22 साल हो गये मुझे, पिता की मुत्यु को 17 साल हो गये, माँ को कितनी बार कहा हमने कि वो यहाँ आकर रहें किन्तु गांव का वो सारा फैलाव अपने खेत, जंगल सारी गायें, कुत्ता, बिल्ली और तमाम स्मृतियां उन्हें छोड़ने की हिम्मत कभी मां नहीं जुटा पाई। पिछले साल राघव के साथ आने को मां ने फोन पर हाँ कह दिया था पर फिर कहला भेजा था कि घर का कितना सम्भाल करना है, मैं फिर कभी आऊंगी...राघव भाभी जी का भाई है जो दिल्ली में ही अपना स्कूल चलाता है, उसकी ससुराल गांव के पास के गांव की है।  शैलजा कहने लगी गांव के बुड्ढ़े लोगों को यहां हमेशा रहना मुश्किल होता है वहाँ खुला आंगन, चैक..गांव भर में मिलने जुलन,े बातें करने को लोग, खेत, गायंे जंगल इतनी खुली हवा..यहाँ चार कमरों के फ्लैट, चैथी मंजिल पर मन घुट सा जाता है। आपको याद है ना तीन साल पहले उत्तरकाशी से दिलीप सिंह रावत की माँ यहाँ हमेशा रहने आई थी पर तीन महीने में ही अपना बैग लेकर वापस गांव चली गई... कोई अभाव थोड़े रहा होगा...
धीमी रोशनी में छत देखते वो सोचता ही रहा। शैलजा नींद में गहरी सांसे लेने लगी। ओम को नींद नहीं आ रही थी। क्या हो गया गढ़वाल के गाँवों का हाल? जब सड़क नहीं थी, बिजली नहीं थी, पानी के नल नहीं थ,े राशन की दुकानें दूर दराज थीं, स्कूल मीलों पैदल जाना पड़ता था, तब गाॅँव में रहने वालों की संख्या और रौनक कितनी थी, उत्तराखण्ड राज्य बन गया...नौ साल बीत गये...पलायन का धीरे-2 चलता रूख, भयंकर बाढ़ सा उमड़ रहा है, गांव के गांव खाली हो गये/पहाड़ के गांवों में सुविधाओं और संसाधनों का जबरदस्त अभाव भले रहा हो पर राजनैतिक समझ और स्कूली साक्षरता के साथ सभ्यता और व्यक्ति की समझ की परख अभूतपूर्व है। यह तुलना साधन सम्पन्न मैदानी गाँवों से तुलना करने पर आज भी दिखती है, मुख्यमंत्री की मंशा गाँव के पलायन को रोकने, स्थानीय रोजगार बढ़ाने व लूटतन्त्र को समाप्त करने की दिखती है पर असर कब करेगी? यह सवाल भी बहस बनकर खड़ा है?राजधानी, हाईकोर्ट, सिडकुल सचिवालय उच्चशिक्षण संस्थान, बड़े अस्पताल ये सब किसके हिस्से हैं? नये राज्य का लाभ कौन उठा रहे हंै? जिन्होंने राज्य निर्माण का विरोध किया, जो आज भी इसके सरोकारों से स्वयं को नहीं जोेड़ते, जो लड़े-मरे-लूटे उन्हें क्या मिला?जरूर यह सवाल पलायन का बड़ा कारण बना होगा....देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, नैनीताल, ऋषिकेश, कोटद्वार और उधमसिंहनगर अगर यहाँ सब कुछ है तो यहां का लाभ लेने... क्यों ठगे रह गये हम पहाड़ व पहाड़ के गांव?झपकी लगी कि शैलजा ने उठा दिया टैक्सी आने वाली है। क्या नाश्ता बनाऊँ? कुछ नहीं.../टैक्सी का हार्न सुनाई दिया दोपहर तक ऋषिकेश पहंुच गया...ओम ने वहां से अपने दोस्त की कार ली और सीधे चमोली...रास्ते भर गंगा के साथ-2 चलती सर्पीली चैड़ी सड़क पर दौड़ना उसे लुभाता रहा। कल होली है। दो दिन बाद उसे वापस लौटना है। गांव के एक फोन पर 15 दिन पहले मां से बात की थी कि वह मां को लेने आ रहा है अपनी गायें, कुत्ते, बिल्ली देने के लिये बात कर लेना, खेत सारी जंगल भी किसी को सौंप देना ताकि देखरेख हो सके। महीनों तक फोन खराब रहता है। कुछ दिन पहले ही श्रीनगर से ओम की दीदी का फोन आया कि वो मां को अपने साथ ला रही है। मां बूढ़ी हो गई, अकेली व बीमारी में दिक्कतें रहती है...तभी ओम ने निर्णय लिया कि मां अब उसके साथ दिल्ली रहेगी...घर में हमेशा के लिए ताला लगाकर...सड़क चैड़ी करने के लिये पहाड़ों को तोड़ा जा रहा है। एक जगह मलबा साफ करने के लिये टैªफिक रोक दिया गया, चाय की छोटी सी दुकान पास थी, उतर कर ओम चाय पीने लगा..लोग राजनैतिक चर्चायें करते चाय पी रहे थे। आगे खड़ी बस में गढ़वाली गीत नरेन्द्र सिंह नेगी की आवाज में बज रहा था... ''ना द़ौड़ ना द़ौड़ उन्दरूयँु का बाठा.....सांझ होते गांव की उबड़-खाबड़ सड़क पर कार रेंगनंे लगी, इक्का-दुक्का जीप गांव की ओर से वापस आ रही थी, कहीं 15-25 साल के लड़कों के समूह रंग लेकर होली का चन्दा मांग रहे थे। बकायदा गाड़ी रोककर...। एक धार के बाद सामने अपना गांव दिखाई देता है। सबसे पहले दिखाई देता है गांव के मन्दिर का ध्वज। बचपन से ही उसी धार से अपने गांव को प्रणाम करने का संस्कार पिता से मिला था। ओम का घर गांव से थोड़ा हटकर है, आस-पास थोड़ा सन्नाटा...कार सड़क के एक चैड़े स्थान पर लाॅक कर अपने घर की पगडंडी उतरने के लिये अपना सूटकेस और बैग ओम ने उतार लिया। गांव का ही सोमेन्द्र पहचान कर पास आया और भैजी प्रणाम बोलकर बैग उठाने लगा तभी नारायन काका शिवालय से लौट रहे थे। ओम प्रणाम के लिये झुकता इससे पहले ही बोल उठे...हीरा दा गी नौनो ओमी च ना? ओम ने हामी भरी और पैर छू लिये-थोड़ी बातों के बाद आगे बढ़ गये घर कीे मुण्डेर पर एक बिजली का बल्ब धीमा-2 जल रहा था। आहट सुन कर अपना कुत्ता बादल भौंकने लगा। मां प्रतिक्षा में बाहर ही खड़ी थी...चैक में पड़ी कुर्सी में ओम बैठ गया, मां सबकीे कुशलक्षेम पूछ रही थी...गौशाला से गायों के गले की घण्टी का मन्दिर स्वर सुनाई पड़ा। ओम ने कहा, गायंे अभी दी नहीं क्या माँ...? माँ बोली, दो दिन हैं ना अभी...तु यहाँ? कांसे के गिलास में चाय पकड़ाते पूछ बैठी/ बच्चे-ब्वारी नी ल्हाई तु? मैने कहा स्कूल हैं...माँ तमक गयी..अरे स्कूल के बहाने शरद अपने बच्चों को बोर्डर-2 नचा रहा है। यहां बच्चे पढ़ नहीं रहे क्या? शरद ओम का छोटा भाई है,सेना में सेवारत है, खुद राजस्थान में पोस्टेड है, बच्चे देहरादून किराये में रहते हैं...। माँ के बारे में सब कहते हैं, जरा पढ़ी लिखी होती और घर की जिम्मेदारी कोई निभाने वाला होता तो ग्रामप्रधान होती...उसी अदांज में माँ कहने लगी, पितरूँ की धरती देखो..नेपाली, बंगलादेशी मुसलमान सब यहाँ आ रहे हैं, काम धंधे कर रहे हैं,नेपाली व्यापार कर रहे हैं, गढ़वाल उनका ही हो जायेगा.. माँ कड़क होकर कहने की परवाह नहीं करती, किस काम की है तुम्हारी अफसरी? गांव का एक बच्चा तुमने नौकरी नहीं लगाया? ओम चुप था...थोड़ी थकान, थोड़ी चिन्ता, थोड़ी आत्मग्लानि...माँ ने गर्म पानी रखा, कपड़ा बदल और खाणु खा...।
गहरी नींद से उठा तो मां चाय लेकर खड़ी थी। ओम ने सिरहाने की खिड़की खोली सूर्यनारायण शिखरों को लांघ रहे थे। चिड़ियों का यह कलरव आनन्दित कर रहा था, जिसे सुने महिनों बीत गये थे। दाणिम, आड़ू और पइयाॅँ के पेड़ों पर नई कोपलें और फूल सुन्दरतम कृतित्व ओढ़े थे। कुत्ता आंगन के किनारे बंधा था। नुपुर ने यह नाम उसे दिया जब जोशीमठ से चार साल पहले इसे लेकर आये थे भोटियों के पास से। दिन उतरते हुये वह अपनी स्मृतियों में अन्तिम बार गांव भरना चाहता था। बुराँस के पेड़ रक्तवर्ण में दहक रहे थे। गदेरे का स्वर कभी धीमा और कभी  हवा के साथ तेज होता था। यह देवदार का पेड़ पिता ने ओम के हाथों उसके पाचवें जन्मदिन पर लगवाया था उसके नीचे बैठ कर ओम अश्रुधारा में नहा गया। पिता कभी दिल्ली नहीं गय,े इस भूमि से लगाव के कारण उन्होंने बीमारी में भी इसे नहीं छोड़ा, अन्तिम समय में ओम आ जरूर गया था... पिता ने हंसते हुये कहा..मां को साथ ले जाना पर घर मत छोड़ना...! अतीत की स्मृतियों में पिता की यादें हिमनदी सी पिघलने लगी थी तभी, एक घसियारिन का हवा में तैरता खुदेण गीत उसकी तन्द्रा तोड़ गया। माँ चैंक के किनारे से आवाज दे रही थी ओम..! ऐ ओमी! खाना खालो..वापस आया तो गांव के कुछ लोग आये थे। कुछ महिलायें, बूढ़ी औरतें... बच्चों को ला जाते तो मन्दिर में कुलदेवता की पूजा भी हो जाती...। कोई बिल्ली लेने को तैयार था तो कोई कछड़ी..कुत्ते को शिवालय के कमरे में रहने वाले बिशम्बर काका ने मांगा था। बाकी गायों को अपने घर का पुराना सेवक बलवन्त लेने कल आयेगा, यह मां ने बताया...सभी कल आयेंगे...दोपहर एक बजे निकलना था ओम को मां के साथ...। होली की हुड़दंग गांव में अपने अलग तरह की थी, उसी केे लिये वह गांव गया...सुबह हुई, चलने की तैयारियों के साथ... मां ने गहथ, कोदे का आटा, गाय का घी, अखरोट जाने क्या-2 बैग में भर दिया था, मैं चुप रहा। सोचने लगा कही रावत जी की मां की तरह मां को दिल्ली असहज तो नहीं लगेगी? दिलीप ने बताया कि मां यहीं रहना चाहती थी पर न जाने उसकी पत्नि या बच्चों ने ऐसा क्या कहा कि वो तुरन्त गांव जाने की जिद पर अड़ गई...कोई शिकायत किये बिना/,शैलजा ऐसी नहीं है, नुपुर भी समझदार है, ओम खुद को समझाने लगा। मां बातंे करती है, शैलजा कम बोलती है। शैलजा ने सायं ही फोन कर बताया कि नुपुर के अपना रूम दादी के लिये मेन्टेन कर दिया है...कुछ अस्वस्थ होकर वह मां के कपड़ों का बैग लगाने लगा। बलवन्त, विशम्बर काका और राधे की पत्नी, ये सब गाय, बछड़ों, कुत्ता, बिल्ली इनको लेने आ गये। गांव के सबसे वरिष्ठ नारायण का और तेजा दादा भी आ गये। तेजा दादा की आवाज कड़क थी...जाणा च ब्यारी (बहु जा रही है) खोली पर ताला लगा कर! मां ने दूर से ही प्रणाम किया, मां सुबह से ही रो रही थी। तेजा दादा बोल,े अभी शरीर मन तुम्हारा स्वस्थ है। 15-18 साल कोई समस्या नहीं होगी। अपने बाडे़ का साग, गाय का दूध कहां मिल रहा दिल्ली में? नाले का पानी साफ करके पिला रहे हैं....सब तैयारी हो गई, दादाजी! मैने बीच में बोला, माँ बीमार होती है तो...गाँव में सिर्फ तेरी मां थोड़ी बूढ़ी हो गई है। तुम्हारी जिम्मेदारी पूरे गांव की भी तो है दादा बेधड़क बोल रहे थे। गाँव श्मशान हो रहे हैं तुम बच्चों के साथ मंगल मनाओ..फिर अचानक चुप होकर बोले, जाओ...मैं तो ऐसे ही मुंहफट हूँ....
गायों को विदा करने के लिये सिगों  पर तेल लगाते हुये माँ फफक कर रो पड़ी जमुना नन्दनी.!. नाम ले लेकर रोने लगी, बादल  को अपने हाथ का निवाला खिलाना चाहती थी बादल ने मुँह फेर लिया। बलवन्त मेरा सूटकेश और बैग और माँ का बैग कन्धे में डालने लगा। बलवन्त की पत्नि गायों को खोलने लगी। खोली पर बड़ा सा ताला जड़ कर देहरी को प्रणाम कर चाभी मैने माँ का सौंप दी। मां देर हो जायेगी, शाम तक श्रीनगर पहंुच कर दीदी के यहां रहेंगे सुबह वहीं से दिल्ली के लिये...गायंें रम्भाने लगी, बादल घर के चैक को छोड़ने को तैयार न था माँ की आंखें आसुंओं से भरी हुयीं थीं। यकायक मां ने घर की खोली पर लगा ताला चाभी से खोल कर दरवाजा खोल दिया। बलवन्त  के हाथ से अपना बैग उसके कन्धे से उतार कर जमुना, नन्दनी और बादल के रस्से अपने हाथ में वापस ले लिये। मुस्करा कर बोली, ओम तु जा.....मैं कभी फिर देखूंगी...ठीक से जाना..कहती हुई मां मुझे विदा करने को खड़ी हो गई।