महाभारत का रहस्यार्थ...1
(गुरुवाणी...आध्यात्मिक गुरु श्री श्री प्रभुस्वरूप जोशी जी* के दिव्य व्याख्यानों से उद्धृत:


*नोटः* कोरोना काल में हर घर में महाभारत देखी गयी और देखी जा रही है... महाभारत हमारे इतिहास का यथार्थ ही नहीं ... बल्कि यह हमारे भीतरी जगत् का प्रतिबिंब भी है.... यह अकाट्य सत्य है कि महाभारत का युद्ध हमारे इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना है... परन्तु यह भी उतना ही प्रामाणिक सत्य है कि यह घटना... यह कथा, हमारी सोच...विचार और भावों का भौतिक जगत् में प्रकटीकरण मात्र है...

विश्व के सर्वश्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक महर्षि पतंजलि ने मनुष्य के भीतरी जगत् के सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों का विश्लेषण अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ योगसूत्र में किया है... इन्हीं मनोभावों को महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के पात्रों के रूप में प्रतिबिंबित किया है...

क्योंकि सृष्टि में हमारे भीतरी जगत् का ही प्रकटीकरण होता है ... *इस कथा के हर पात्र को अब अपने भीतर खोजने का समय आ गया है*... यदि हम ऐसा करने में सफल होते हैं तो जीवन में आने वाली सभी समस्याओं... सभी प्रकार के डरों... भयों से आसानी से मुक्ति पा सकते हैं...

हम सबका जीवन खूबसूरत हो...हम आरोग्यता प्राप्त करें... सभी रोगों और क्लेशों से मुक्त हों इसी उद्देश्य से ध्यान की तुरीयातीत अवस्था में पहुँचकर प्राप्त किये अमूल्य ज्ञान को पूज्य गुरुदेव हम सभी के समक्ष प्रकट कर रहे हैं... जिस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए जन्मजन्मान्तरों का तप चाहिए... वह हमें सरलता से प्राप्त हो रहा है...

*हमें इस गुरुवाणी को गहरी श्रद्धा और पूर्ण विश्वास के साथ एक एक शब्द पर ध्यान देते हुए पढ़ना है... इसे समझना है... इस पर चिन्तन करना है.. इसे अपने आचरण में उतारना है...*

*कर्ण और विकर्ण महाभारत के कौरव पक्ष के महत्वपूर्ण योद्धा हैं... इन्हें अपने भीतर कैसे खोजना है...जरा ध्यान दीजिए...*

हमारे भीतर जो राग और द्वेष के भाव हैं.. वही कर्ण और विकर्ण हैं...

 महर्षि पतंजलि *सुखानुशयी रागः* अर्थात् सुख का अनुशरण करने का भाव राग नामक क्लेश को बताते हैं...

और *दुखानुशयी द्वेषः*..अर्थात् प्रतिकूलताओं के अनुभव का नाम द्वेष नामक क्लेश बताते हैं...

इसका अर्थ यह है कि सुख और दुख हमारी धारणाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं है... जो हमारी धारणा में सुख है उसके प्रति लगाव होना राग है...कर्ण को मान ...सम्मान.. बहुत पसंद है...

*यदि साधक को यह मालूम हो जाय कि उसे क्या क्या पसन्द है..तो वह अपने भीतर के कर्ण के भाव को आसानी से पहचान सकता है ...*

*और यदि यह मालूम हो जाय कि उसे क्या क्या नापसन्द है...तब वह भीतर के विकर्ण के भाव को पहचान लेगा...*

यदि कोई सचमुच कर्ण को भीतर देख ले...तो कर्ण तत्क्षण मर जायेगा...अपनी कमियों को स्वीकार कर ही हम उन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं...

यदि हम अपने भीतर के पशु भावों को देख लें तो  इनका नष्ट होता निश्चित है...

*इसका अर्थ यह हुआ कि हमें कर्ण को मारने के लिए कठोर परिश्रम करने की जरूरत नहीं बल्कि कर्ण को देखने की दृष्टि पैदा करने में मेहनत करने की जरूरत है*...

*महाभारत देखते हुए इन दिनों  दर्शकों के भीतर भी  महाभारत का युद्ध अवश्य हो रहा होगा...क्योंकि कहीं न कहीं ये पात्र हमारे भीतर भी उपस्थित हैं... और परदे पर आये पात्र इन्हें जागृत कर हमारे भीतर हलचल पैदा कर देते हैं* 

*यदि ऐसे न हो रहा हो तो समझ लीजिए...हममें एकाग्रता की कमी है...हम महाभारत को सिर्फ केवल एक नाटक के रूप में देख रहे हैं...*

जब भीतर युद्ध होगा तो हमें कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ेगा...

हमको सिर्फ अपने भीतर के इन योद्धाओं को पहचानना है...

और यदि इन्हें हमने पहचान लिया तो हमारे शरीर रूपी हस्तिनापुर के सिंहासन पर जिन आसुरी शक्तियों ने अवैध कब्जा कर रखा है...

हम उनको बाहर खदेड़ने में सफल हो जाएंगे...

इसका अर्थ यह है कि यदि हम अपनी आदतों... पसंद.. नापसंद.. सोच.. विचारों और भावनाओं के प्रति निरंतर जागरूक हैं ....तो अपने स्वभाव में पूर्ण परिवर्तन कर स्वस्थ हो सकते हैं...सबकुछ प्राप्त कर सकते हैं...।

*महाभारत का जो उत्कीलन किया जा रहा है...यह ब्रह्मास्त्र है...इसका एकाग्रता के साथ अध्ययन हमारी चेतना के उत्थान में अवश्यमेव सहायक होगा..*

*यह तन्त्र और मन्त्र का मिश्रण है...ज्ञान और भक्ति का बेजोड़ जोड़ है...यह मनोविज्ञान , साहित्य और आध्यात्म का वह तीर है...जिससे बच पाना सम्भव नहीं है*

कई जन्मों के अनगिनत प्रश्न जो  हमारे अवचेतन में घूम रहे थे...हर प्रश्न का जवाब मिलेगा...

अन्यथा उन प्रश्नों के जवाब ढूंढने के लिए न मालूम कितने जन्म लेने पड़ जाते हैं...

*अनेक जिस्मानी व्याधियां(शारिरिक रोग)  सिर्फ इस गुरुवाणी को श्रद्धा पूर्वक पढ़ने मात्र से ठीक हो जाएंगी*

*ब्लड प्रेशर , थाइराइड , गठिया...अनेकों ऐसे रोग हैं...जो कब ठीक हो गए ...पता भी नहीं चलेगा*

लेकिन हमको उन अहसासों के स्तर पर आना पड़ेगा.. सारे पूर्वाग्रह.. दुराग्रह छोड़ने होंगे.. अपने भीतर श्रद्धा और विश्वास पैदा करना होगा...। एक एक बात जब भी हमें हैरान करेगी तब तब हमारे ऊपर शक्तिपात होगा...यह सत्य है..

आप जो भी प्राप्त करना चाहते हैं...वह आपको प्राप्त होगा लेकिन आपको रिसीव करने की फ्रिक्वेंशी पर आना होगा...

*कितने भी पुराने रोग या तनाव  हों सब खत्म हो जाएंगे...*

आपका पूरा जीवन जादुई हो जायेगा तो...लेकिन आपको दिलचस्पी तो लेनी पड़ेगी...

यदि यहां कुछ लिखा जाए और आप उससे हैरान न हो रहे हो...तो समझ लीजिए...अभी आपको समझने की जरूरत है...फिर लाभ न होगा...

हम जानते हैं...आप रात दिन बैठकर साधना या चिंतन नहीं कर सकते...*

*इसलिए रात रात बैठकर जो प्राप्त हुआ...वह आपको दिया जा रहा है...ताकि आपकी प्रगति तीव्र गति से हो...*

लेकिन आपको सीखने ,समझने और जीवन को बेहतरीन बनाने के लिए समर्पित होना होगा...

*आपको इस बात पर गर्व होना चाहिए कि आपके पास वेदों उपनिषदों और पुराणों का दिव्य ज्ञान इतने सहज और सरल रूप में पहुँच रहा है... आप जितना आभारी होंगे...आपको उतना अधिक लाभ होगा...*

*कई बार हमारे दिमाग में प्रश्न आता है कि... मुझे तो नौकरी चाहिए...मुझे महाभारत से क्या लेना देना...??*

*लेकिन सोचिये...क्या हम आपके इस अहसास से वाकिफ नहीं होंगे...और अगर फिर भी हम महाभारत ही परोस रहे हैं...तो कुछ तो बात होगी...* यह महाभारत हमारे भीतर की हलचल है...यह हमारे जीवन के हर कदम का जिक्र है...यह सिर्फ अतीत नहीं वर्तमान भी है...

मस्तिष्क और हृदय को खुला छोड़ दें...और..फिर चमत्कार देखें..

*आप धन कमाना चाहते हैं....हम  आपकी इस इच्छा से वाकिफ है...*

*आप खूब धन कमा लोगे..लेकिन पहले जरा सा महाभारत को समझ लें...क्योंकि यह आपके भीतर उस पात्रता को पैदा करेगी...जो अमीर होने के अनिवार्य है...*

गहराई में उतरे...आपका  व्यक्तित्व विराट होने लगेगा...

*जिसको जो चाहिए...उसे वो प्राप्त होगा...लेकिन पहले...अपने मस्तिष्क और हृदय को झाड़ पोंछ कर साफ कर लें...*

कहते हैं ," सिद्धों और ईश्वर को बच्चे बहुत प्रिय होते हैं "।

कारण साफ है...बच्चे सीखते हैं...बच्चे पढ़ते हैं...बच्चे समर्पित होते हैं...

*आजकल कुछ दिनों के लिए स्टूडेंस बन जांय...कॉलेज के दिनों में वापस जांय...तब आप तंदुरस्त भी थे और उत्साहित भी...*

भले ही कोई स्कूल में अच्छा स्टूडेंट न रहा हो...उसके पास आजकल अच्छा स्टूडेंट्स बनने का अवसर है...

*महाभारत आपको आपसे मिलवायेगी*

*इस ग्रन्थ में वह शक्ति है...जिस शक्ति को पाकर सबकुछ हासिल हो सकता है...*

*अध्यात्म का अर्थ सिर्फ सीखना है...*

*जिनके शरीर में दर्द होता है...जिन्हें सिर में दर्द होता है...पुरानी चोटों का दर्द...सबकुछ गायब न हुआ तो कहना..*

आपको सिर्फ एक काम करना है...

जब कुछ पढ़ो तो उससे हैरान जरूर हो जाना...बस...

तरह तरह की एलर्जी...अपराधबोध...सब कुछ नष्ट हो जाएगा..*

*आप जो सीख रहे हो...वह आपके  DNAतक जाएगा...आपके बच्चों को भी लाभ होगा...*

*यदि आपको महाभारत में दिलचस्पी पैदा न हो रही हो तो समझ लीजिए आपको ब्रह्मचर्य के पालन की जरूरत है...*

*आपके पितृ देव कितनी ऊंची अवस्था में पहुंच जाएंगे...आप सोच भी नहीं सकते...*

*आप सबके समक्ष महाभारत के उत्कीलन के उद्देश्य बहुत व्यापक हैं...और...आप जानते हैं... सदसंकल्प अवश्य पूर्ण होते हैं...*

जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल दीजिए...आपके जीवन का स्तर ऊपर उठने लगेगा...

हमारा उद्देश्य एकदम स्पष्ट है...अपनी चेतना उठाना और..जो अपनी चेतना ऊपर उठाना चाहते हैं...उनकी सहायता करना...

*हम चाहते हैं...आपके भीतर जबरदस्त हलचल हो...*

*सीखने की अद्भुत प्यास पैदा हो...*

*हम चाहते हैं आप अद्भुत जीवन जियें...*

हमारा उद्देश्य है...आपको उस वक़्त झकझोरना जब आप ऊंघ रहे हों...

तैयार हो जांय... कमर कसें...

कभी न कभी तो तैयार होना ही है...फिर अभी क्यों नहीं...

इतने वर्ष बीत गए...बचे वर्ष भी यूं ही निकल जाएंगे...यदि आप चाहते हैं...कि... आपका और हमारा साथ हमेशा बना रहे...तो शर्त एक 

ही है...आपको अपना भला...उसी तरह चाहना होगा

*जितना भला हम आपका चाहते हैं...*


शेष क्रमशः