किसने यहाँ रसपान किया (9 नवंबर, स्थापना दिवस पर विशेष)


बीस वसंत हैं बीत गए, 
पर यौवन अभी तक कहॉं खिला,  
कलियॉं सूखी बिखर रहीं, 
फूलों ने कहॉं ऋँगार किया । 
भौंरे मदमस्‍त घूम रहे, 
बगिया की कहॉं उनको चिंता,   
अधर तो सूखे रह गए फिर, किसने यहाँ रसपान किया ।।  


माली बदलते रहे यहॉं,  
भाग्‍य कोई ना बदल सका, 
ताज तिजोरी के चक्कर में, 
शायद सबकुछ भूल गया ।   
सपनों में ही सजा हो मन, 
मंजिल की फिर किसको चिंता,   
मंदिर तो बनाए अनगिनत, 
पर जला न सका कोई दिया ॥ 


अब चुप नहीं मैं बैठूँगा, 
खुद बहार बन दिखलाऊँगा,  
सजाने अपनी बगिया को,
महकाऊंगा सुंदर कलियाँ ।   
यौवन तो मेरा व्‍यर्थ गया, 
इसका मुझको मलाल नहीं,  
चमकाने को चमन अपना, 
मैंने है अब संकल्प लिया ॥   


शांत बैठा था अब तक मैं, 
सागर तट पर बैरागी सा,   
छोड़ साधना बनूँ साधक,
 गाँडीव मैंने भी उठा लिया ।   
खोलकर सब बंधनों को अब, 
मैं प्रलय बन ढा जाऊँगा,   
इस कर्मक्षेत्र के रण में, 
उतरूँगा खुद अब ठान लिया ।।



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